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संस्कृतिज-बादल बाउल बजाए रे इकतारा

बाउल गीति ने बंगाल के सांस्कृतिक जगत में बहुत कुछ जोड़ा है। पिछले कई दशकों से बाउल बंगाल के बाहर भी गूंजता आया है।

Author Published on: December 3, 2017 6:02 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने एक गीत में लिखा है: ‘बादल बाउल बजाए रे इकतारा/ झर झर झरती है बस जलधारा’। हां, सच ही तो है, जैसे बादल विचरते रहे हैं आकाश में, वैसे ही बाउल विचरते रहे हैं बंगाल की भूमि पर अपनी रस धार के साथ। बादल और बाउल के समानार्थी होने के और भी कई प्रमाण दिए जा सकते हैं। कहते हैं बाउल, ‘व्याकुल’ शब्द से निकला है। तो यह ‘व्याकुल बाउल’ न जाने कब से, कितनी सदियों से, कम से कम छह-सात सदियों से तो निश्चय ही गूंजता रहा है। वह व्याकुल करता रहा है स्वयं बाउल गाने वालों को, उन्हें सुनने वालों को भी और उस परिवेश को भी, जहां बाउल सुर गूंजते रहे हैं। वे गूंजते रहे हैं अविभाजित बंगाल के गांवों-कस्बों में, खेतों-खलिहानों में, वनांचलों में, नदी तीर, किसी पेड़ की छांव में, किसी धूसर मैदान में। और अब भी गूंजते हैं विभाजित बंगाल की धरती पर- ‘इस पार बांग्ला उस पार बांग्ला’ में, यानी भारत के बंगाल में और स्वतंत्र बांग्लादेश में।  बांग्लादेश में बाउल, ‘लालनगीति’ के नाम से प्रचलित है। यह नाम लालन शाह फकीर के नाम से आया है, क्योंकि लालन के लिखे हुए बाउल या उनके नाम से प्रचारित बाउल गीति ही तो बाउलों की जुबान में, उनके हृदय में, उनके कंठ में बसते हैं। इधर भी और उधर भी।

बाउल गीति ने बंगाल के सांस्कृतिक जगत में बहुत कुछ जोड़ा है। पिछले कई दशकों से बाउल बंगाल के बाहर भी गूंजता आया है। बाउल बोल अब कभी दिल्ली में भी सुनाई पड़ सकते हैं, मुंबई में भी, भोपाल-पटना में भी, लखनऊ में, पुणे और हैदराबाद जैसे शहरों में भी। बाउल गायक वहां गली-गली भले न विचरते हों, पर वे बुलाए जाते हैं, सभा-सम्मेलनों में, सांस्कृतिक उत्सवों-अनुष्ठानों-समारोहों में, कारपोरेट जगत में भी। वे यात्राएं करते हैं विदेश की भूमि पर भी अब। पर, भला इसमें क्या शक कि बाउल को बंगाल की भूमि ही अधिक भाती रही है। वही जननी रही है बाउल की। वहीं बसते रहे हैं बाउलों के कुनबे के कुनबे, सैकड़ों में। बाउल सिर्फ खेत-खलिहानों में नहीं, समय के साथ बसों-ट्रेनों में भी सुनाई पड़ने लगा था। यह जानना दिलचस्प है कि ‘बाउल’ गाने वाले/ वाली को भी बाउल कहते हैं और बाउल गान को भी बाउल ही कहते हैं।

हां, बाउल अब सिर्फ बाउलपंथी ही नहीं गाते हैं। ऐसे कलाकार भी निकल रहे हैं जो बाउलपंथ से नहीं हैं, पर बाउल गाते हैं। बाउल गायक बाउल गीति गाते हैं, हाथ में इकतारा लिए हुए। कुछ बंशी बजाते हैं या ढोलक भी। वे पैरों में घुंघरू भी बांधते हैं। सिर पर एक पगड़ी-सी बंधी होती है। वे सधुक्कड़ी कुर्ते में होते हैं। उनकी अपनी ही सज-धज है, अपनी वेशभूषा है। वे अपने सुरों के साथ दूर से पहचाने जाते हैं। उनके नूपुर मधुर-मधुर झंकार करते हैं, यह बताते हुए कि आ रहा है या आ रही है बाउल गायक! बाउल गाते हुए नाचते भी हैं। पूरी देह ही उनकी बाउल लय में डूब जाती है। बाउल सुर छा लेते हैं। बाउल गान की अपनी ही एक शैली भी विकसित होती गई है। आप शब्द समझें या नहीं, बाउल सुर, उसके नूपुर और इकतारा या बंशी, बाउल को आपके भीतर उतार देने की क्षमता रखते हैं। उनकी आकुल पुकार ही बहुत कुछ कह देती है। यह पुकार या गुहार है, सृष्टिकर्ता के लिए, अज्ञात के लिए, अपने ही आत्म के लिए। संभवत: वह आत्म जो बंदी है पिंजड़े में, उड़ना चाह रहा है। पिंजड़े में उसका मन लग नहीं रहा है, बाउल उसे ही मुक्त करना चाहता है।

बाउल गीतों के ज्यादातर उपादान प्रकृति से ही लिए गए हैं। पर, उनमें सांसारिक चीजों का, सामान्य जीवन-निर्वाह करने वाले गृहस्थों के भी प्रसंग हैं। घर-बार भी आते ही आते हैं। पर, सबकी खिड़की खुलती है प्रकृति की ही ओर। कह सकते हैं कि बंगाल के धान के खेतों, ताल-सरोवरों, मेघाच्छन्न आकाश, वनांचलों, फूल पौधों-वृक्षों- वनस्पतियों से अपनी गुंजार ग्रहण करने वाले बाउल गीतों का संसार अत्यंत रसभरा भी है। उसमें सांगीतिक रस तो है ही, कई ऐसी ध्वनियां-प्रतिध्वनियां भी हैं, जो सहज ही लुभाती हैं। बाउल की अटूट परंपरा में बहुत से मर्म आज भी निर्बाध चले आए हैं, भले आज का सामाजिक-जीवन बहुत बदल गया हो, चारों ओर नगर-संस्कृति का ही बोलबाला हो गया हो। बाउल मंच की चीज नहीं रही। विचरते-विचरते बाउल जहां खड़ा होकर गाने लगता है, वहीं उसका मंच हो जाता है। लोग उसे घेर लेते हैं। बाउल अब उत्सवों-समारोहों के मंच पर भी गाया जाता है। लेकिन जाहिर है कि उसे राह चलते या किसी स्थान पर खड़े होकर गाते हुए देखने-सुनने का अनुभव कुछ और रहा है।

बाउल की अपनी मिठास है, उसका दर्द गहरा है, उसकी उड़ान ऊंची है और उसकी गहराई का माप नहीं मिलता। उसके अर्थ और आशय भी गहरे ही हैं। लालन के गीतों की तुलना कबीर से की गई है। भावों-विचारों के स्तर पर भी। कबीर पंथियों की तरह, बाउल पंथी भी हैं ही। कबीर-लालन की इस तुलना के साथ यह बात भी ध्यान में रखने वाली है कि लालन भले बंगभूमि के थे, पर शेष भारत के संतों-भक्त कवियों और सूफी मत वालों से इनकी कई स्वाभाविक समानताएं हैं। बाउल गोतों में एक उड़ान होती है। वे उच्च स्तर वाले हैं और शब्द एक-दूसरे से जिस तरह गुंथे हुए गायन के वक्त आते हैं कि एकाध को आप ठीक से सुन भी नहीं पाते। पर, जिन शब्दों को कुछ जोर देकर गाया जा रहा होता है, वे अपना एक बिंब बनाते हैं और वह बिंब भी आपको डोलता हुआ दिखाई पड़ता है। सचमुच खांचा (पिंजड़ा) और ‘पाखी’ आपको अपने चित्र रूप के साथ दिखाई-सुनाई पड़ते हैं। अच्छे बाउल गायकों को अब अलग से भी पहचाना जाता है।

लालन शाह के बाउल गीतों से रवींद्रनाथ ठाकुर काफी प्रभावित हुए थे, लगभग उसी तरह जैसे वह कबीर की रचनाओं से हुए थे। कहते हैं सिलाइदइ (अब बांगलादेश में) जहां ठाकुर परिवार की जमींदारी थी, वहीं लालन की कुछ जमीन और झोपड़ी थी। लालन द्वारा एक गुहार लगाने पर उन्हें कुछ सुविधाएं ठाकुर परिवार-रवींद्रनाथ के बड़े भाई- से मिली थीं। रवींद्र के बड़े भाई ज्योतिरींद्रनाथ का बनाया लालन का एक रेखाचित्र भी है। लालन की भेंट रवींद्रनाथ से हुई थी या नहीं इसमें संदेह है। पर, लालन गीति के बारे में उनकी प्रीति को लेकर कोई संदेह नहीं है। हाल की एक और घटना अपने ‘साहित्यिक महत्त्व’ के कारण याद करने लायक है। जब बॉब डिलन को वर्ष 2016 का नोबेल पुरस्कार मिला, तो हमारे यहां-पत्र-पत्रिकाओं द्वारा विशेष रूप से, इस बात की सुधि ली गई कि बॉब डिलन उन्नीस सौ नब्बे के दशक में एक बार कोलकाता आए थे: बाउल पूर्णचंद्र दास के बेटे के विवाह के अवसर पर। वे पूर्णचंद्र दास के बड़े प्रशंसक रहे हैं, और उन्हें अमेरिका बुला कर उनके साथ कार्यक्रम भी कर चुके हैं। इस तरह से देखें तो बाउल का जादू आज भी बरकरार है।

बाउल गीतों की विशेषता का जिक्र करते हुए रवींद्रनाथ ने अपनी पुस्तक ‘रिलीजन आॅफ मैन’ में लिखा है: ‘यह लोककवि उपनिषद के हमारे संतों के साथ सहमत है कि अज्ञात के स्पर्श के प्रयास में हमारा मन विचलित और आश्चर्यचकित हो उठता है, पर फिर भी यह कवि उन प्राचीन संतों की तरह ही अज्ञात की अपनी साहसिक तलाश का त्याग नहीं करता- उसमें यह सत्य निहित है कि हमें अज्ञात तक पहुंचने के मार्ग उपलब्ध है।’ जैसा कि हम पहले भी उल्लेख कर चुके हैं, दरअसल बाउल गीतों में अज्ञात के प्रति, सृष्टिकर्ता के प्रति, जीवन रहस्यों और मर्मों के प्रति ‘मोनेर मानुष’ को लेकर एक आकुल-व्याकुल-विह्वल गुहार है। यह विह्वलता ही गाने और सुनने वाले को एक संगीत रस में डुबोने के साथ-साथ उसे एक आध्यात्मिक प्रतीति की ओर ले जाती है। बाउल गीतों में यह विह्वलता मानो स्वयं रची-बसी है, शब्दों में सुरों में।

 

 

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