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आधी दुनिया- उद्यमशीलता से कामयाबी

हमारे एक मित्र राजेश कालिया कोट्टयम (केरल) में रहते हैं। कुछ साल पहले जब वे दिल्ली आए तो उनसे मिलने गई थी। पत्रकार मित्र कुछ चिंतित थे। उनका रिटायरमेंट नजदीक था। तीनों बच्चे अभी पढ़ रहे थे।

Author Published on: October 8, 2017 5:31 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

हमारे एक मित्र राजेश कालिया कोट्टयम (केरल) में रहते हैं। कुछ साल पहले जब वे दिल्ली आए तो उनसे मिलने गई थी। पत्रकार मित्र कुछ चिंतित थे। उनका रिटायरमेंट नजदीक था। तीनों बच्चे अभी पढ़ रहे थे। पत्नी उषा स्कूल में पढ़ाती थीं, लेकिन एक आदमी की आय से घर का खर्चा चलना मुश्किल था। सोचने लगे कि क्या हो सकता है। उनकी पत्नी बोलीं कि केरल में इन दिनों उत्तर भारतीय खाने का शौक बढ़ रहा है। ऐसा ही कुछ शुरू कर दें। मुझे उनकी बात अच्छी लगी। कहा- अच्छी बात है। इस काम को तो फौरन शुरू किया जा सकता है, क्योंकि इसमें लागत भी कोई ज्यादा नहीं। इस विषय पर देर तक बातचीत होती रही।  कुछ दिन पहले उनका फोन आया। वे बेहद खुश थे। कहने लगे कि आपने जो सुझाव दिया था, उसे पत्नी ने शुरू किया और आज हालत यह है कि कुछ ही दिन के भीतर हमारी किचन सर्विस इतनी लोकप्रिय हो गई है कि काम और मुनाफा बढ़ता ही जा रहा है। उनकी पत्नी उषा भी बातें करने लगीं। बताने लगीं कि वह, पति राजेश और बेटा मिल कर काम-काज देखते हैं। वह एक दिन पहले मेल करके अपने ग्राहकों को बता देती हैं कि कल क्या बनाने जा रही हैं और मेल पर ही आर्डर आ जाते हैं। उनके बने तरह-तरह के परांठे बहुत लोकप्रिय हैं। उनकी खुशी इस नए काम में मिली सफलता से मुझे भी बहुत खुशी हुई।
ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं, जहां महिलाओं ने अपने परिवार के साथ मिल कर या अकेले ही छोटे स्तर पर किसी काम को शुरू किया और देखते-देखते वह काम किसी बड़े व्यवसाय में बदल गया। जब अपने प्रयासों से साधारण औरतें ऐसे किसी काम में सफल होती हैं, तो खुशी और बढ़ जाती है।

कुछ साल पहले दिल्ली में एक परिचित लड़की ने सिर्फ रोटी सप्लाई करने की सर्विस शुरू की थी। इसे भी भारी सफलता मिली थी। देखा जाए तो देश के हर भाग में बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं मिल सकती हैं, जो पढ़ी-लिखी हैं, कुछ करना चाहती हैं। अपने पांवों पर खड़ी होना चाहती हैं। इसके अलावा खाना बनाने में तो महिलाएं प्रवीण होती ही हैं। आज अपने इस ज्ञान को भी उन्होंने अपनी आय का जरिया बना लिया है। बहुत-सी महिलाओं ने मध्यवर्ग के घरों में खाना बनाने का काम शुरू किया है, तो बहुतों ने इसे व्यवसाय के स्तर पर उतारा है।
सालों पहले की बात है। गांव में रिश्ते की चचेरी भतीजी ने बारहवीं पास की थी। कॉलेज बहुत दूर था। माता-पिता ने कहा कि कॉलेज से लौटते रात हो जाया करेगी। रास्ता भी बहुत सुनसान और अंधेरा भरा है। आने-जाने के लिए बस की सुविधा नहीं है, क्या करें। वे लड़की को आगे पढ़ाना चाहते थे, मगर उन्हें उसकी सुरक्षा की चिंता थी। माता-पिता की चिंता जान लड़की ने आगे की पढ़ाई प्राइवेट छात्रा की तरह जारी रखी। लेकिन घर में रहते हुए घरेलू कामों में मां का हाथ बंटाते और पढ़ाई करते हुए भी उसके पास इतना समय बच जाता था कि कुछ कर सके। मगर क्या। गांव में ज्यादा सुविधाएं भी नहीं थीं। तब उसने छोटे बच्चों को गणित और अंग्रेजी की ट्यूशन पढ़ाने की सोची। इस काम में उसका भाई भी मदद करने लगा। फीस भी पचास रुपए रखी गई थी। शुरू में दो ही बच्चे आए। फिर तीन, उसके बाद संख्या बढ़ती गई। जैसे-जैसे बच्चे बढ़े, लड़की और उसके भाई की आय बढ़ी। पिता ने यह देखा तो अपने सड़क से लगते खेत में दो कमरे बनवा दिए। लड़की ने धीरे-धीरे बीए कर लिया था। पिता ने उसे टीचर्स ट्रेनिंग के लिए बाहर भेज दिया। लौट कर लड़की ने अपना प्राइमरी स्कूल खोला। कई अध्यापिकाओं को रखा। आज यह एक मशहूर स्कूल है। दूसरे गांवों के बच्चे भी इसमें पढ़ने आते हैं। बच्चों के खेलने और उनके सर्वांगीण विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। लड़की की शादी हो गई है, मगर अब भी वह इस स्कूल में पढ़ाती है।

उसकी देखादेखी अन्य कई लड़कियों के माता-पिता भी उन्हें इसी इरादे से उच्च शिक्षा दिलवा रहे हैं कि वे भी आगे जाकर अपने पांवों पर खड़ी हो सकें। इनमें से कई लोग वे हैं जो, इस लड़की ने जब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था तो माता-पिता को आकर ताने देते थे कि वे अपनी लड़की के हाथ पीले करने की जगह, उसकी कमाई खाना चाहते हैं। मगर आज उन्होंने भी इस लड़की की मेहनत और कुछ करने की लगन को स्वीकार कर लिया है। इसी तरह की दो घटनाएं और हुर्इं। गांव में ही एक पड़ोसी महिला के पति की मृत्यु हो गई थी। छोटे-छोटे तीन बच्चे थे। आय का कोई साधन नहीं। घर में बस एक भैंस थी। महिला ने बैंक से कर्ज लेकर एक और भैंस खरीदी और दूध का व्यवसाय शुरू किया। साथ में घर के बाहर एक टीन शेड डाल कर छोटी-सी दुकान भी खोल ली। इसमें चाय, बिस्कुट, नमकीन, बच्चों की कापी-किताबें-पेंसिल, दूध, दही तथा अन्य खाने-पीने का सामान बेचने लगी। उसके बच्चे भी स्कूल से लौट कर उसका हाथ बंटाने लगे। आज उस महिला पर कोई कर्ज नहीं है। दो की जगह चार भैंसें और तीन गाए हैं। अब न उसे पैसे की कमी है और न बच्चों के भविष्य की चिंता कि पति के अभाव में उन्हें कैसे पढ़ाए-लिखाए। कैसे पालन-पोषण करे।

दूसरी एक स्त्री ने एक अखबार में पढ़ा था कि घर में अगर मधुमक्खियां पाली जाएं तो शहद का अच्छा व्यवसाय चल सकता है। उसने एक एनजीओ की मदद से मधुमक्खी पालन करना सीखा और धीरे-धीरे शहद बनाने का उसका कारोबार चल निकला। हमारे मोहल्ले में रहने वाली एक महिला ने कपड़ों की कतरनों से थैले और कथरी बनाने का काम शुरू किया। पहले-पहल लोगों ने उसके काम का बहुत मजाक उड़ाया। मगर जब सदर बाजार से लाई रंग-बिरंगी कतरनों से थैले और कथरियां तैयार हुर्इं, तो देखने वाले देखते रह गए। शुरू में महिला को ग्राहक ढूंढ़ने में दिक्कत जरूर हुई। वह जगह-जगह लगने वाले मेलों, हाटों में सामान बेचने लगी। धीरे-धीरे सस्ते कच्चे माल से जो सामान तैयार हुआ, उसे ग्राहक हाथों हाथ खरीदने लगे। अब यह महिला अपना बुटीक चलाती है और कई अन्य महिलाओं को रोजगार देती है। इसका बनाया समान आॅनलाइन भी बिकता है।  अक्सर जब भी सफल महिलाओं की बातें होती हैं, तो वे कोई बड़ी उद्योगपति या बालीवुड के ग्लैमर की दुनिया से ताल्लुक रखती हैं। मगर साधारण औरतें भी अपनी शिक्षा, मेहनत और नया कुछ करने की लगन से अपनी तकदीर बदल सकती हैं। आत्मनिर्भर हो सकती हैं। बस उन्हें थोड़ी राह मिलने की जरूरत है। आज स्टार्टअप के जरिए बहुत-सी महिलाएं कामयाबी हासिल कर रही हैं। वे कहावतों में नहीं, वास्तव में मिट्टी को सोना बना रही हैं। इनमें काम करने का जो जज्बा है, उसमें उम्र या साधनहीनता भी कोई बाधा नहीं बन रही है। ये साधनहीन महिलाएं अपने बल पर अपनी दुनिया को बदलती हैं। ल्ल

 

 

 

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