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आधी दुनिया- आधुनिकता की चकाचौंध में भटकाव

एक लेखिका ने लिखा कि अगर कहीं पुरुष और महिला दोनों नहाते हैं तो वहां महिलाओं को भी कपड़े उतार कर नहाने की आजादी होनी चाहिए और जैसे लड़के किसी कारण देर रात घर आते हैं, तो लड़कियों को भी ऐसी ही आजादी होनी चाहिए। हंसी आती है ऐसी महिलाओं की सोच पर।

Summer Fashion Tips for Women in Hindi: प्रतीकात्मक फोटो (Source: Dreamstime)

वन में हम कई बार नामसझी का आवरण ओढ़े रहते हैं और हमें इस बात का ज्ञान ही नहीं होता कि सच्चाई अलग है और जो तर्क हम दे रहे होते हैं, वे संकीर्णता और दूसरे का दर्द समझे बिना स्वार्थ पर आधारित हैं। पूर्वाग्रहों में जीने का अभ्यस्त होने के कारण कभी-कभी हम गलत और सही का अंतर भी नहीं कर पाते। आज सामाजिक बुराइयों में महिलाओं के साथ हो रही ज्यादती की चर्चा एक ज्वलंत समस्या है। जब भी कोई घटना घटती है, तो आंख बंद करके पुरुषों को दोषी मान लिया जाता है। कोई भी महिला यह मानने को तैयार नहीं होती कि किसी भी घटना के घटित होने के पीछे खुद उनका भी हाथ हो सकता है। किसी भी घटना के घटने पर समाज भी मान लेता है कि महिलाएं तो बेचारी होती हैं।  अगर हमें हकीकत के साथ जीना है तो किसी भी समस्या की जड़ में दोनों पहलुओं को देखा जाए। आज महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं और महिला सशक्तीकरण का भी जोर-शोर से प्रचार है। ऐसे में उनके साथ कोई भेदभाव न हो, यह जरूरी है। एक लेखिका ने लिखा कि अगर कहीं पुरुष और महिला दोनों नहाते हैं तो वहां महिलाओं को भी कपड़े उतार कर नहाने की आजादी होनी चाहिए और जैसे लड़के किसी कारण देर रात घर आते हैं, तो लड़कियों को भी ऐसी ही आजादी होनी चाहिए। हंसी आती है ऐसी महिलाओं की सोच पर। बेशक वह आजादी का आनंद लेने की बात करती हैं, पर जो नजारा मिलेगा उन नग्न महिलाओं को देख कर, अगर पुरुष ताका-झांकी करेंगे तो महिलाएं आग बबूला होकर पुरुषों को कठघरे में खड़ा कर देंगी।

ऐसी महिलाएं यह नहीं सोचतीं कि पुरुष और महिलाओं की शारीरिक स्थिति के साथ उनके अस्तित्व में भी अंतर प्रकृति ने किया है? अंधाधुंध बराबरी करने की होड़ में महिलाएं यह नहीं सोचतीं कि पुरुषों और महिलाओं में अंतर प्राकृतिक है और उसको बनाए रखना भी जरूरी है। आप संरचना से तो छेड़छाड़ नहीं कर सकते। जैसे बच्चा जनने का प्राकृतिक अधिकार सिर्फ महिलाओं के पास है। ऐसे में वह कहने लगे कि पुरुष भी जने तो हास्यास्पद होगा। इस प्रकार हर मामले में पुरुष और महिला को बराबरी के पैमाने पर नहीं तोला जा सकता। महिलाओं की कुछ सीमाएं हैं, जिनके पार तो वे चाह कर भी नहीं जा सकतीं। कुछ महिलाएं मानती हैं कि जब कोई महिला सार्वजनिक जगहों पर आधुनिक ढंग के कपड़े पहनती है, तो लोग उसे घूरने-निहारने से लेकर छींटाकशी तक करते हैं। मसलन, वे जो भी कपड़े पहने, उन्हें छूट होनी चाहिए। अब कोई उन महिलाओं से पूछे कि क्या भड़काऊ कपड़े पहनना, अंग प्रदर्शन करना आधुनिकता की कसौटी है? कपड़े स्वयं के लिए पहने जाते हैं या शारीरिक प्रदर्शन से विकास का मापदंड तय है? असली बात यह है कि ज्यादातर पुरुष हमेशा शरीर को ढके रहते हैं, जबकि कुछ महिलाएं ऐसे कम कपड़े पहनती हैं, जिनसे शरीर ज्यादा से ज्यादा खुला रहे फैशन या आजादी के नाम पर। यह भी सच है कि इसमें पुरुषों को आकर्षित करने की भावना छिपी रहती है। पुरुषों की नैसर्गिक कमजोरी महिला, और वे सुंदरता या अंग-प्रदर्शन के कारण नियंत्रण नहीं रख पाते। सुंदरता पर पुरुष ही क्यों, महिलाएं भी आकर्षित होती हैं। दुर्भाग्य से ऐसे में छेड़खानी से लेकर कुछ ऐसा कर गुजरते हैं, जो नैतिकता और मानवता पर कलंक होता है। उन्हें भी अपने को काबू में रखना चाहिए।
एक बात और अहम है कि महिलाओं की आजादी का पैमाना क्या है? क्या कपड़ों के स्तर से आजादी का निर्धारण होता है? क्या यह ठीक है, कम से कम कपड़े पहनो, आजादी पाओ। कुछ स्त्रियों का मानना है कि अपने रिश्ते, अपने जीने का ढंग, अपने रास्ते, अपने कपड़े चुनने का अधिकार केवल महिलाओं का होना चाहिए। लेकिन यह सोचना भी उनकी जिम्मेदारी है कि क्या ऐसी आजादी उनके जीवन के लिए घातक तो सिद्ध नहीं होगी? क्या ऐसा सोच कर वे अपने लिए एक ऐसा जाल तो नहीं बुन रहीं जिसमें वे उलझ कर रह जाएंगी?

महिलाएं ऐसा मानती हैं कि उनके सशक्त ताने-बाने को पुरुष स्वीकार नहीं कर पा रहा है और इससे पुरुषों के अहं को ठेस पहुंच रही है। परिवर्तन रातों-रात नहीं होते, उसमें समय लगता है। ज्यादातर दुराचार के मामलों में महिला पहले नजदीकी बना चुकी होती है और फिर अपने अनुकूल न लगे तो आरोप लगाती है कि उसका शारीरिक शोषण हुआ है। शादी से पहले अवैध संबंध में धोखे या शादी का झांसा देने का इल्जाम लगाती हैं, जबकि वे खुद उसमें पहले भागीदार रही हैं। यह महिलाओं की नासमझी नहीं है, जिसके लिए वे खुद भागीदार होते हुए दूसरे को दोषी ठहराती हैं। चाल-चलन मर्यादित रखना भी तो हमारी जिम्मेदारी है। उसको क्या और कोई निभाएगा!  असल में हम सिर्फ समस्या की बात करते हैं। उसके निराकरण के लिए जिम्मेदारी किसी और पर डालने के आदी हो गए हैं। हमारे सोचने-विचारने का ढंग अजीब है कि समस्या पर सही तरीके से चिंतन तो करते नहीं और न ही यह सोचते हैं कि ऐसी स्थिति पैदा करने में अपना भी कुछ दोष संभव है। बस आंख मींच कर किसी भी बात को गलत ठहरा कर पल्ला झाड़ लेते हैं, जो जिम्मेदारी से परे होता है। आज तेजी से सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन हो रहे हैं। जरूरी नहीं है कि बदलाव के इस दौर में भविष्य के लिए सब कुछ ठीक होगा। निश्चित रूप से गलतियां और कुरीतियां हमारा सब जगह पीछा करेंगी। ऐसे में हम महिलाओं को समझदारी से आगे कदम बढ़ाने होंगे। केवल पूर्वाग्रहों और रटे-रटाए आरोप लगा कर अपना जीवन चलाना ठीक नहीं है। जो भी बात करें जिम्मेदारी के साथ करें और ध्यान रखें कि हम समाज का अंग हैं और उसका सच्चाई के विपरीत कुछ प्रतिकूल असर हमारी कार्रवाइयों से दूसरे पर तो नहीं पड़ रहा। हरेक मामले में आंख मींच कर सभी पुरुषों को अपराधी न मानते हुए यह सोचना होगा कि कुछ आपराधिक प्रवत्तियों के हावी होने पर पुरुष भी अनेक बार ऐसा अपराध कर बैठता है, जो कि अनुचित है। ऐसी अधर्मी प्रवृत्ति से तो पुरुषों को बचना होगा। समाज को स्वस्थ बनाए रखने के लिए हम महिलाओं को भी आजादी का सही अर्थ समझना होगा और लक्ष्मण रेखा का पालन करना होगा।

दरअसल, अतीत में महिलाओं के साथ हुए अत्याचार के कारण महिलाओं में कुंठा रही है, लेकिन उस कुंठा को प्रतिशोध में नहीं बदलना चाहिए। बदलाव की बयार पुरुष और स्त्री दोनों पर लागू हैं। आज महिलाएं कंधे से कंधा मिला कर चलने के लिए संघर्षरत हैं तो उसमें क्या हमारे पिता या भाई ने साथ नहीं दिया, क्या उनके बगैर हम आगे बढ़ सकते हैं? यह सर्वविदित तथ्य है कि आज की महिलाएं पुरुषों से कम नहीं हैं। वह चाहें तो अपनी काबिलियत से छलांग लगा सकती हैं, लेकिन हमें मर्यादित आचरण, शील, जो कि महिलाओं का परंपरागत विशेष गुण है, उन्हें समाहित करते हुए विकास की राह चुननी है। इसी प्रकार पुरुषों को भी गैर-बराबरी की मानसिकता बदलनी है, तभी तराजू के दोनों पलड़े बराबर हो सकेंगे। ल्ल

 

 

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