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चंद्रकांता: एक सदाबहार शाहकार

हर भाषा में कुछ न कुछ ऐसी रचनाएं होती हैं, जिनकी प्रासंगिकता बनी रहती है। जमाना बदलता रहता है किसी रंगमंच की तरह, लेकिन किरदार भेष बदल कर आते रहते हैं। ऐसी ही एक कृति है देवकीनंदन खत्री की ‘चंद्रकांता संतति’। आखिर क्या है इस जादू के पिटारे में, जिसका आकर्षण कभी खत्म नहीं होता ? जायजा ले रही हैं मृणाल वल्लरी।

देवकीनंदन खत्री के इस उपन्यास को पढ़ने के लिए उस वक्त न जाने कितने लोगों ने हिंदी सीखी थी।

इंसान का मन यायावर होता है। वह भटकता रहता है इधर से उधर। इस कोने से उस कोने तक की खाक छानता रहेगा। उन चीजों को भी देखने की कोशिश करेगा जो वास्तव में हैं नहीं। याद कीजिए उस इंसान को जिसने बल्ब से रोशनी की कल्पना की होगी। वह इंसान भी कितना करिश्माई रहा होगा जिसने खुद से सांस न ले सकने वाले मरीज की तड़प अपने भीतर महसूस की होगी और आॅक्सीजन को किसी सिलिंडर में बंद कर सांस मुहैया कराने की सोची होगी। हर पल, हर पग पर ऐसे दसियों उदाहरण मिल जाएंगे, जिसे देखेंगे और सराहेंगे। ये कल्पनाएं शुरुआती दौर में जिस भी सामान्य इंसान ने सुनी होंगी, चकराया होगा। उसके लिए यह किसी तिलिस्म से अलग नहीं रहा होगा। इन उदाहरणों का मकसद सिर्फ यह ध्यान दिलाना है कि जंगल में रहने वाला आदिमानव रहा हो या आज कंक्रीट के जंगल में बसने वाला आधुनिक मानव; सभी का मनोविज्ञान खोजी होता है। सपनों में डूबने वाला होता है, कल्पनाएं रचने वाला होता है। देवकी नंदन खत्री भी इसके अपवाद नहीं थे।

अठारहवीं सदी के अंत में जब उन्होंने चंद्रकांता रची थी, उस वक्त राजा-रजवाड़ों के पास मनोरंजन के लिए खूब वक्त था। समाज में रोजगार की आज वाली आपाधापी नहीं थी। सब के पास पर्याप्त वक्त था। रोचक कथाएं थीं, रोचक चर्चाएं थीं। ऐसे में इस वक्त को देवकी नंदन खत्री ने पकड़ा। वक्त की सलवटें देखीं, करवट बदलती मनोवृत्तियां समझीं। सत्ता का असर देखा। राजाओं की लिप्सा देखी, सभासदों के बीच सत्तासुख पाने की होड़ देखी। इस उठापटक की खाद ले खत्रीजी ने ऐयारों के साथ तिलिस्म की नगरी हमारे बीच रच डाली। नाम दिया-चंद्रकांता। यह उपन्यास उन्होंने सिर्फ मनोरंजन के लिए लिखा, यह मान लेना सामान्यीकरण होगा। साथ ही इस रचना से समय के रिश्ते को नजरअंदाज कर पात्रों की बारीकी और आज के दौर में उसके परिमार्जित रूप को न पकड़ने की सायास आपराधिक कोशिश भी होगी।

व ह दौर गुलामी का था। भारतीय समाज टूटा हुआ था। हमारा असंगठित विद्रोह अंग्रेजों के नए हथियारों के सामने बौना पड़ रहा था। हम बुद्धि और धनबल में कमजोर पड़ रहे थे। ऐसे में जब चंद्रकांता के ऐयारों के जादुई कारनामे दिखे, न टूटने जैसा लगने वाला किला तिलिस्म के जोर पर टूटता दिखा। नायक अपने मकसद में कामयाब होता दिखा तो जाहिर तौर पर चंद्रकांता उपन्यास भी कामयाब हुआ। एक बात और कही जाती है चंद्रकांता को लेकर कि यह उर्दू के ‘दास्तान-ए-अमीर-हम्जा’ जैसी रचनाओं के जवाब में लिखी गई। तो याद करें कि हम्जा के नायक का मकसद धर्म का प्रचार था। यानी एक तरह के अमूर्त्त लक्ष्य पर चला था हम्जा का नायक, जबकि चंद्रकांता के नायकों का मकसद बिल्कुल साफ था। तिलिस्मों के भीतर दबी अकूत धन-दौलत-संपदा प्राप्त करना। यानी विशुद्ध भौतिक।

उर्दू दास्तानों में तिलिस्म का स्वरूप और उसका इस्तेमाल हमेशा अतार्किक रहा है। मंत्र पढ़ा या हाथ नचाया और आंधी-पानी-बादल-आग पैदा हो गए, खूंखार जानवर सामने आ गए। मिट्टी फेंकी और महल-किले तैयार। इसके उलट खत्रीजी के उपन्यास का तिलिस्म अपने स्वरूप और इस्तेमाल में भी तार्किक नजर आते हैं। मसलन, किसी पत्थर को हिलाया और कोई दरवाजा खुला। कहीं की कील निकाली और दूसरी तरफ आग की लपट निकली। इस उपन्यास के शुरू के हिस्से में ही शिवदत्त के ऐयार शेरों का रूप धर कर कुंवर इंद्रजीत सिंह को धोखा देते हैं। यहां पाठकों को क्षण भर को लग सकता है कि यह तो उर्दू दास्तान में दिखने वाला अतार्किक तिलिस्म है। भला कोई कैसे अपनी शक्ल बदल सकता है। बाबू देवकीनंदन खत्री अपनी इस कल्पना को तकनीक का जामा पहनाते हुए नजर आते हैं, जब वह रूप बदलने के लिए चेहरे पर झिल्ली चढ़ाने की बात करते हैं।

इस उपन्यास में यह देख कर अच्छा लगता है कि यहां महिलाएं तार्किक हैं, मुख्य केंद्र में हैं। और इससे भी बेहतर यह कि महिला चरित्र सिर्फ देह नहीं है। पूरे उपन्यास में किसी भी महिला चरित्र पर यौन हमला नहीं है। ये महिलाएं जंगल-पहाड़, नदी-नाले, निर्जन वन-प्रांतर में निर्भीक घूमती नजर आती हैं। इन जगहों पर कभी उन्हें बेहोश किया जाता है तो कभी गिरफ्तार। राज उगलवाने के लिए उन्हें कैद भी किया जाता है। पर इस दौरान न तो कोई ऐयार या राजा उनके साथ बलात्कार करता है न कोई यौन हमला। बदला लेने या रहस्य उगलवाने के लिए उन्हें तरह-तरह की यातनाएं तो दी गर्इं, पर कोई यौन हमला नहीं।
फिर आते हैं उसी मूल सवाल पर कि अठारहवीं सदी के अंत में लिखा गया उपन्यास आज भी क्यों फड़फड़ाते हुए हमारे सामने आ जाता है? बेशक उसमें कुछ तो ऐसा है जो कभी पाठकों को लुभाता है तो कभी बड़े और छोटे परदे को। दरअसल, यह उपन्यास मनुष्य के उस अचेतन को छूता है, उसे तृप्त करता है जहां उसके निर्वासित सपने सोते हैं। धन-दौलत आज की आपाधापी वाले दौर में बहुत मायने रखते हैं। हम सब अकूत संपत्ति चाहते हैं। उसे न पा सकने की निराशा इस तरह घर कर जाती है कि जब हम अपने सामने किसी उपन्यास के चरित्र को लड़ते देखते हैं तो वहां हमारी हताशा शांत होती है। ऐयारों का रूप बदलना, साजिशें करना, नायक का परेशान होना और अंतत: बुद्धि-बल से मुकाम पा लेना, ये सारे ऐसे तथ्य हैं जो हमें तृप्त करते हैं। इस उपन्यास के ऐयार अपना चेहरा जब चाहें, बदल लेते हैं। चेहरा बदल कर धोखा देते हैं, धोखा खाते हैं। जाहिर है आज वक्त बदला है, आज के पात्र बदले हैं मगर ऐयारों की वह प्रवृत्ति हमें अपने आसपास नजर आती है। साजिशें रचती हुई, धोखा देती हुई। गुण और बातों के तिलिस्म से किला फतह करती हुर्इं प्रवृतियां। इन प्रवृतियों से जीतने की होड़ में हमें चंद्रकांता के धैर्यवान नायक याद आते हैं।

ऐ सा नहीं कि चंद्रकांता के बाद ऐयार और तिलिस्म की दुनिया किस्सों से गायब हो गई। वह तो उससे पहले भी थी और उसके बाद भी रही। सीता के सामने मारीच का हरिण बन कर आना या बीच समुद्र में सुरसा से महावीर हनुमान का सामना, ये ऐसे प्रसंग हैं जो ऐयारी की ओर ध्यान खींचते हैं। फिल्मों की दुनिया में दूसरे ग्रह से आया एलियन ऐसे ही ऐयारी किस्सों का अगला भाग लगते हैं। लुगदी कहे जाने वाले साहित्य में ऐयारी और तिलिस्म का एक दूसरा रूप ही सामने आता है। लुगदी उपन्यासों के चरित्रों की ऐयारी को प्रामाणिकता देने के लिए लेखकों के तर्क तकनीक के बेहद करीब पहुंचते हैं। अलादीन के चिराग का जिन्न हो या चाचा चौधरी का साबू, इंद्रजाल कॉमिक्स का मैंड्रेक हो या फैंटम, ये सारी किस्सागोई एक तरह का तिलिस्म रचती हैं। मनुष्य का मनोविज्ञान ऐसा है कि उसे कल्पनाओं का यह रूप मनोहारी लगता है, उसे लुभाता है और वह उसमें रमता जाता है। हर इंसान की अपनी एक काल्पनिक दुनिया होती है, उसके भीतर एक गोपन संसार होता है। इस गोपन संसार में कभी नफरत होती है तो कहीं खोया हुआ प्यार। चंद्रकांता के पात्र हमारी गोपन दुनिया के पात्र हैं। गद्दी पाने की चाह और दौलत का लालच वहां भी है। इसी लालच की पूर्ति में तमाम छल हुए, साजिशें रची गर्इं। रात-रात की दौड़-भाग हुई, बेहद क्रूर तरीके से हत्याएं हुर्इं। इन सारी घटनाओं में स्वामिभक्ति भी दिखी, विद्रोह भी दिखा। इन सब के बीच वह प्यार भी दिखा जो महज तस्वीर देख कर या आवाज सुन कर हो जाता है। इस उपन्यास के पात्र राजा बीरेंद्र सिंह और कुंअर इंद्रजीत सिंह ऐसे ही गैरहाजिर परंपरागत प्रेम में पड़ते हैं। वे इस प्रेम में मरने-मारने को उतारू होते हैं। बीरेंद्र सिंह या कुंअर इंद्रजीत सिंह के इस प्रेम को देख कर पाठकों के भीतर दबा-कुचला वह प्रेम तृप्त होता है जो उनके निजी जीवन में नाकाम हुआ था। प्रेम को पाने की कोशिश में रची गई साजिशें या दिखाया गया शौर्य उन्हें अपना लगता है और वह इन नायकों के साथ अपनापा महसूस करने लगते हैं।
इस उपन्यास में दृश्य इतने जादुई हैं कि वे सिनेमा वालों को खूब आकर्षित करते हैं अपनी पुनर्रचना के लिए। ठीक ऐसा ही मामला हैरी पॉटर के साथ भी है। बच्चे दीवाने हो जाते हैं उस काल्पनिक दुनिया के। और तो और, खोजी पत्रकारिता के नाम पर आज के कई चैनलों की टीआरपी बढ़ाने का काम करते हैं रहस्य रोमांच पर आधारित कथानक।

इस उन्यास की तारीफ में एक बात अक्सर कही जाती है कि देवकीनंदन खत्री के इस उपन्यास को पढ़ने के लिए उस वक्त न जाने कितने लोगों ने हिंदी सीखी थी। यह बात सच हो तो भी, लगता है कि यह वाक्य उस वक्त के साहित्यकारों ने इस उपन्यास की ऊंचाई को कमतर करने के लिहाज से प्रचारित किया। और पूरी की पूरी उन्नीसवीं शताब्दी खत्री बाबू की उपलब्धियों के रास्ते को मोड़ने के इस षडयंत्र में फंसी रह गई। हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने के क्रम में रामचंद्र शुक्ल रासो साहित्य को आदिकाल या वीरगाथा काल के साहित्य के रूप में देखना चाहते हैं। उनका मानना है कि अपभ्रंश से मुक्त होकर हिंदी एक नया रूप ले रही थी। तो हिंदी साहित्य के इतिहास की शुरुआत हिंदी के इस नए रूप की रचनाओं से मानी जा सकती है। दूसरी तरफ वह देवकीनंदन खत्री की इस रचना को उपन्यास मानना नहीं चाहते। पर यह स्वीकार करते हैं कि चंद्रकांता को पढ़ने के लिए उस वक्त लोगों ने हिंदी सीखी। दरअसल, यह मनुष्य का स्वभाव है कि अपने इर्द-गिर्द वह अपनी मान्यताओं की एक ऐसी दीवार रच लेता है जिसके बाहर सारी चीजें उसे गलत और बेमानी नजर आती हैं। मुमकिन है रामचंद्र शुक्ल की समस्या भी ऐसी ही मनोवैज्ञानिक रही हो। वर्ना अपने ऐयारी किस्से और तिलिस्मी रूप में चंद्रकांता के पात्र घूम-फिरकर हमारे इर्द-गिर्द बार-बार न आ रहे होते। १

जो मनुष्य बनने की  प्रेरणा दे वही साहित्य  

’ ‘चंद्रकांता’ जैसे उपन्यासों की भूमिका को साहित्य में कैसे देखते हैं?

१चंद्रकांता जिस काल की रचना है, उस समय साहित्य का दायरा बहुत ही सिमटा हुआ था। रामायण या उस जैसे पौराणिक ग्रंथ ही आम लोगों के लिए पढ़ने का पर्याय हुआ करते थे। उस समय विपुल मात्रा में साहित्य की किताबें नहीं थीं। तभी लोगों के सामने एक ऐसी किताब आती है जो पौराणिक दायरों से अलग सामान्य मानवीय पहलुओं की बात करती है। इस उपन्यास ने घर-परिवारों को ग्रंथों-पुराणों के दायरे से बाहर निकाला, लोगों की रुचि साहित्य की तरफ बढ़ा दी। ‘भूतनाथ’ जैसे उपन्यासों ने पाठकों के पूरे स्वाद को बदल दिया। साहित्य में मनोरंजन नामक तत्त्व जुड़ा जिससे पाठक निजी तौर पर जुड़ कर आनंदित हो सकते थे। ऐसी किताबों ने पढ़ने की भूख बढ़ाई और पाठक तैयार किए।

’ जिस विधा ने हिंदी साहित्य में प्राथमिक पाठक तैयार किए मुख्यधारा के गंभीर साहित्य ने उसे खारिज ही किया है।
१आलोचना की दुनिया का अपना ढांचा होता है। पहले भी घर बनते थे और आज भी बनते हैं। आज जिस वैज्ञानिक ढांचागत तरीके से मकानों का निर्माण होता है, पहले नहीं होता था। उस समय में मनोरंजन के साधन सीमित थे। टेलीविजन, प्रचार, सोशल मीडिया नहीं था। जो आया, पाठकों ने उसे सिर-माथे पर लिया। लेकिन धीरे-धीरे साहित्य का परिष्कार हुआ, और गुणवत्ता को सबसे ज्यादा अहमियत दी गई। तिलिस्मी दुनिया के मानक साहित्य के मानकों पर खरे नहीं उतर सकते थे। जब से दुनिया रही है अपने तरह का संवाद और साहित्य रहा है। गुलशन नंदा से लेकर राजवंश और हाल के दिनों तक वेद शर्मा ने लाखों की संख्या में पाठक जुटाए। लेकिन इनके साहित्य को कभी आम साहित्य में नहीं रखा गया। विश्वविद्यालयों और अकादमिक दुनिया का अपना एक अनुशासन होता है।

’ तिलिस्म और जादू-टोना अब साहित्य में लोकप्रिय नहीं रहा। इसके उलट सिनेमा और टीवी धारावाहिकों में इनकी लोकप्रियता चरम पर है। चंद्रकांता की कहानी एक बार फिर से छोटे परदे पर है। सिनेमा और साहित्य के इस फर्क को आप कैसे देखते हैं?

१सिनेमा और टीवी धारावाहिक आम जन भी देखता है। इन माध्यमों का लक्ष्य भी सिर्फ मनोरंजन है। ये समाज को कोई ठोस और परिपक्व संदेश नहीं देते हैं। इससे साहित्य को तो कतई नहीं जोड़ा जा सकता है। जब तक यह मनुष्य को मनुष्य बनने की प्रेरणा नहीं दे, तब तक यह साहित्य कहां? इंसान का परिमार्जन होता है, जिसमें साहित्य की अहम भूमिका है। धारावाहिकों और सिनेमा की तुलना में साहित्य का फलक बहुत बड़ा होता है। साहित्यकार समाज का संदेशवाहक होता है। लोग साहित्य से सीख कर जीवन में उतारते हैं। एक डमरू बजानेवाला भी कुछ बेचता है। जब तक डमरू बजता है, लोग उसे देखते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं, उससे कुछ ग्रहण नहीं करते हैं। लेकिन एक बार ग्रहण करने के बाद साहित्य हमारे साथ चलता है, हमें प्रभावित करता है। १

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