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ललित प्रसंग: जो तमाशा नहीं है

दौलत की भूख, शोहरत की भूख, शान की भूख, सत्ता की भूख, आश्चर्यजनक भूख है।

गली-गली ढोल-नगाड़े बजा-बजा कर लोगों को जुटाया गया था।

गली-गली ढोल-नगाड़े बजा-बजा कर लोगों को जुटाया गया था। लोग इकट्ठे हो गए थे। एक खुली जगह में भारी भीड़ समाई हुई थी। वहां आदमी नहीं थे अब, केवल भीड़ थी। उत्सुकता थी। तमाशा शुरू हो चुका था। तमाशा शुरू करने से पहले मदारी ने भीड़ को भलीभांति समझा दिया था कि तमाशा आपके लिए पेश किया जा रहा है। इस खेल का मकसद आपका स्वास्थ्य है। आपकी सुभीता है। आपकी सुरक्षा है। आपका विकास है। भीड़ तमाशा देख रही थी। भीड़ तन्मय थी। भीड़ अवाक थी। भीड़ स्तब्ध थी। भीड़ ताली बजा रही थी। भीड़ जय बोल रही थी। तरह-तरह के करतब देख-सुन कर भीड़ चकित थी। भीड़ जब भी होती है, सबसे पहले चकित होती है। भीड़ हमेशा चकित होते-होते थकित हो जाती है। मुझे लग रहा था तमाशा भीड़ के लिए नहीं है। भीड़ तमाशा के लिए है।  मैं देख रहा था पेट की आग, आग के घेरे में कूद रही थी। कूद कर घेरा फांद रही थी। भूख बड़ी गजब की चीज है। वह न जाने कैसे-कैसे करतब सिखा देती है। आदमी कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। कुछ भी कर लेता है। कुछ भी कर दिखाता है। खैर, पेट की भूख तो मामूली होती है। मुट्ठी भर अन्न के दानों से, चुल्लू भर पानी से शांत हो जाती है।

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मगर यह तो मामूली भूख है। दौलत की भूख, शोहरत की भूख, शान की भूख, सत्ता की भूख, आश्चर्यजनक भूख है। वह सात समुंदर का सारा पानी पीकर भी नहीं बुझती। वह बुझती नहीं कभी भी, केवल जलती है। वह तरह-तरह के तमाशे रचती है। बड़े-बड़े तमाशे। ऊंचे-ऊंचे तमाशे। लंबे-लंबे तमाशे। गहरे-गहरे तमाशे। वह तमाशे के लिए भीड़ जुटाती रहती है। तमाशा होता रहता है, भीड़ देखती रहती है। भीड़ तालियां बजाती है, चिल्लाती है। भीड़ जिंदाबाद बोलती है। मुर्दाबाद बोलती है। भीड़ हंसती है। भीड़ रोती है। मगर भीड़ तमाशा देखती है। मेरे मन में कुछ सवाल उठते हैं। तमाशा देखना भीड़ की नियति है क्या? तमाशा देखना भीड़ की नियति क्यों है? क्या केवल किसी तमाशे के लिए भीड़ होती है? बिना तमाशे के भीड़ होना संभव नहीं क्या?  हमारे लोकतंत्र में जनता भीड़ क्यों बन गई है? जनता भीड़ कैसे बन गई है? मैं नहीं जानता ये सवाल वाजिब हैं या गैरवाजिब। मगर मैं क्या करूं। ये सवाल तो खड़े हो गए हैं। ये तमाशे के आगे खड़े हो गए हैं। तमाशे का मजा बिगाड़ने पर ये एकदम आमादा हैं। पूरी तरह उतारू हैं। मैं सवालों को पूरी ताकत से बैठाने की कोशिश करता हूं।
मैं तमाशा देख रहा हूं। मेरी आंखों के आगे मेरा देश खड़ा हो जाता है। मैं देख रहा हूं, हमारे पूरे देश में तमाशा हो रहा है। जगह-जगह, हर जगह तमाशा हो रहा है। तमाशा दिखाने की संविधान सम्मत कंपनियां हैं। कंपनियां अपने तरह से अपनी पसंद के तमाशे दिखा रही हैं। दिल्ली में किसी कंपनी का तमाशा चल रहा है। लखनऊ में किसी दूसरी कंपनी का। पटना में किसी दूसरी का। मगर चल रहा है हर कहीं।

राजा का सेवक बन जाना कभी-कभी मध्यकालीन या पुराकालीन आदर्श कथाओं में सुनने में आ जाया करता था। मगर सेवक का राजा बन जाना मौजूदा लोकतंत्र का ऐसा वैचारिक ‘लीजेंड’ है, जिसका केवल अचरज से मुंह ताकते रहा जा सकता है। समूचा हिंदुस्तान अपनी पीड़ा में तड़फड़ा रहा है और हिंदुस्तान की सेवा के लिए सेवकों में धक्का-मुक्की मची है। अधिनायक के अधिकार से भरे हुए सेवकों का हुजूम, राजसी वैभव से लदा-फंदा सेवकों का समूह; अपने रोब-दाब से दिलों को दहलाता सेवकों का जत्था, अपनी मनमानी पर उतारू सेवकों का दल। नहीं, दल ही नहीं, दल का दल हिंदुस्तान को अपनी सेवा समर्पित करने के लिए रौंद रहा है। यह सेवा का तमाशा सबसे दिलचस्प तमाशा है। यह सेवा का मिथक, मिथकों के इतिहास का सबसे नया, सबसे जटिल और सबसे दुर्बोध मिथक है, जिसका हमें सबसे अधिक बोध है। कोई कंपनी हिंदुस्तान का चेहरा बदलने का तमाशा खेल रही है। उसका कहना है कि विश्व बाजार में हिंदुस्तान का चेहरा ठीक नहीं है। वह ग्राहकों को लुभाने लायक नहीं है। उसका कहना है कि हिंदुस्तान का चेहरा खिला होना चाहिए। हम खिला कर दिखाएंगे दुनिया को। मगर कैसे? हिंदुस्तान पूछना चाहता है। हमारे चेहरे पर तो बदहाली की हवाइयां उड़ रही हैं, बेरोजगारी के थप्पड़ों के लाल निशान हैं, असुरक्षा का आतंक है, अशिक्षा का कीचड़ है।

‘तो क्या हुआ। कीचड़ में ही तो कमल खिलता है।’
‘कैसे खिलेगा?’  ‘यह ‘पे-टियम’ है न, यह खिला देगा। यह सबके चेहरे को खिला देगा। यह समूचे हिंदुस्तान के चेहरे को खिला देगा। ताजे फूल की तरह प्रफुल्ल बना देगा।’‘अपने हाथों से हल छोड़िए, कुदाल छोड़िए, खुरपी छोड़िए, कलम छोड़िए, करघा छोड़िए। सब कुछ छोड़ कर ‘पे-टियम’ गहिए।’ ‘पे-टियम’ आपको सब कुछ देगा। चावल देगा, आटा देगा, आलू देगा। सब कुछ तो देगा ही, पेट भरने के बाद की डकार भी देगा। फिर नींद में सपने भी।किसानों का अनाज खलिहान में पड़ा रहे, कोई बात नहीं। किसानों को खाद पर सब्सिडी न मिले कोई बात नहीं। आपदा-राहत का चेक बीच रास्ते से गायब हो जाए कोई चिंता नहीं। हम गांव-गांव में ‘मेगा मार्ट’ बनाएंगे। ‘फास्ट फूड के प्रोडक्ट हैं न! कोई फिक्र नहीं।’ कोई कंपनी कहती है कि हम हिंदुस्तान का कलेजा हाथी जैसा बनाएंगे। कलेजा मजबूत रहेगा तो देश सब कुछ सह लेगा। भ्रष्टाचार का ओला पड़ता रहे, सह लेगा। बेईमानी की आंधी चलती रहे कोई बात नहीं। मजदूरों के हाथों को काम न मिले, कोई बात नहीं। जब देश हाथी जैसा होगा तो चलता रहेगा अपने रास्ते। कुत्ते भौंकते हैं तो भौंकते रहें, उनकी कोई परवाह नहीं।
एक तमाशा कंपनी मंच पर पारिवारिक कलह के उत्तेजक खेल पूरे कौशल से दिखा कर बता रही है कि हमारे परिवार में कोई विवाद नहीं है। हम सब एक हैं। अब परिवार में कोई दिक्कत नहीं है, यानी अब देश में कोई दिक्कत नहीं है। उनके लिए अपना परिवार ही अपना देश है। यह समूचा देश उनके परिवार का है। पूरे देश को अपने परिवार का बनाने खातिर कुछ भी करने में उनको कोई हिचक न होगी। यह देश हमारा कैसे हो जाए इसके लिए सारी कंपनियां खून-पसीना बहा कर दिन-रात एक किए हैं। किसिम-किसिम के करतब इजाद कर रही है। लगातार अभ्यास में लीन है। प्रदर्शन में मशगूल हैं।

सारा देश तमाशा देख रहा है। नए-नए तमाशे। शेर की तरह गरजने वाले तमाशे। घड़ियाल के आंसू रोने वाले तमाशे। गीदड़ की तरह मांद में घुस जाने वाले तमाशे। सांप और नेवले की लड़ाई वाले तमाशे। जीती-जागती शहादत वाले तमाशे। झूठ के अनगिनत तमाशे। रोज-रोज। हर रोज। हर कहीं।
अब तमाशे की मुनादी के लिए ढोल-नगाड़े का इस्तेमाल नहीं है। उसका युग बीत गया। उसका उपयोग भारत में होता था। अब हम इंडिया में हैं। हम तकनीकी क्रांति के युग में चरण जमा चुके हैं। हम उत्थान की सीढ़ियां चढ़ कर ‘डिजिटल’ के सोपान पर खड़े हैं। अब तमाशे की मुनादी के लिए हमारे पास इंटरनेट है, स्मार्टफोन है, टीवी में समाचार के स्वतंत्र चैनल हैं, बकायदा। अब तमाशा देखने के लिए बड़ा सुभीता है। अब घर बैठे सारे तमाशे का सजीव प्रसारण पूरे दृश्यबोध के साथ आपके लिए सुलभ है। अब आदमी के लिए आंख-कान की जरूरत नहीं है। अब हमारे आंख-कान समाचार चैनल हैं। जो दिखा-सुना दें, उनकी मर्जी। हमें वही देखना है, जो वे दिखाना चाहें। वही सुनना है, जो वे सुनाना चाहें। हम सब भीड़ हैं। हम सब देख रहे हैं। हम वह सब कुछ देख रहे हैं जो तमाशा नहीं है। ०.

 

 

उमेश प्रसाद सिंह

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