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आधी आबादी-कुरीति और कुचक्र

मार्च को महिलाओं के लिए खास माना जाता है, क्योंकि इसी में ‘महिला दिवस’ पड़ता है।

Author March 19, 2017 5:24 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मार्च को महिलाओं के लिए खास माना जाता है, क्योंकि इसी में ‘महिला दिवस’ पड़ता है। और इसी के साथ महिलाओं की स्थितियां और उनसे जुड़ी बातें बढ़-चढकर की जाती हैं। इसके मनाने के पीछे कई कारण हैं, मगर संदेश यह जाता है कि महिलाओं के हिस्से में साल में एक ही दिन आता है। प्रश्न यह है कि महिला दिवस ही क्यों? पुरुष दिवस तो नहीं मनाया जाता। महिलाओं के बारे में यह दया भाव क्यों कि दिवस मनाने की जरूरत पड़े। अगर यह मनाया भी जाता है तो क्या साल में एक दिन महिला दिवस मनाने से महिला सशक्तीकरण संभव है? ऐसे सवाल महिला दिवस आने के साथ ही उभरने लगते हैं। तर्क तो यह भी कि है साल में एक बार महिला दिवस मना कर या गिनी-चुनी सफल महिलाओं का उदाहरण देकर कहीं आधी आबादी को भरमाने की कोशिश तो नहीं की जा रही! इन सबकी पड़ताल जरूरी है।

सच तो यह है कि भारत में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है। अगर बात जन्म से शुरू करें तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कन्या भ्रूण हत्या आज भी जारी है। भारत में लिंगानुपात बिगड़ा हुआ है यानी एक हजार लड़कों पर मात्र 945 लड़कियां है। बच्चे के लालन-पालन में भी भेदभाव जारी है। खान-पान, पहनावा और स्कूली शिक्षा तक में भेदभाव होता है। समानता के सोच व प्रेम बांटने के तरीके तक में भी भेद होता है। यह सब इसी तरह से वर्षों से चला आ रहा है कि जैसे यह सामान्य सी बात हो। लड़की और बड़ी होती है..शादी लायक तो दहेज का अभिशाप उसके हिस्से में आता है। हम कितनी भी डींग मार लें, मगर सही मायने में आज भी स्वेच्छा से वर चुनने का अधिकार तमाम लड़कियों को नहीं है। बड़े-बुजूर्गों द्वारा थोपी गई शादी निभाने की जिम्मेवारी उसी के सिर पर अधिक होती है। अपनी कोख पर भी उसका हक कहां होता है। बच्चे पैदा करने से लेकर लालन-पालन में भूमिका मां की अधिक होती है मगर अधिकतर जगह सिक्का पिता का चलता है। प्रेम पर भी उसका वश नहीं। शादीशुदा पुरुष तक किसी अन्य से प्रेम होने पर ‘लिव इन’ के नाम पर दूसरी महिला के साथ रह लेता है, ऐसा अगर कोई महिला करे तो लोग उसका जीना हराम कर देंगे। ऐसे कितने ही भेदभाव जारी है समाज में महिलाओं के लिए।

महिला सुरक्षा शायद सबसे बड़ा मुद्दा अब भी है। महिला सुरक्षा पर अजीब-सी धारणा सामाजिक-धार्मिक ठेकेदारों की देखी जाती है। उनका कहना होता है कि महिला को पाक रखना है तो पुरुषों से दूर रखो। यह बंदिशें लड़कियों को बरगलाने में मुख्य भूमिका निभाती हैं। दरअसल स्त्री-पुरुष बनाए ही गए हैं एक-दूसरे के लिए। स्त्री और पुरुष का साहचर्य उन्हें एक दूसरे के प्रति सम्मान करने के लिए प्रेरित कर सकता है, न कि उनमें दूरी पैदा कर। चारदीवारी में कैद महिलाएं जीवन की व्यावहारिकता नहीं समझ पातीं और किसी भी पुरुष के झांसे में जल्दी आ जाती हैं। महिलाओं की आजादी को भी सवालों के कठघरे में रखा जाता है। जैसे कुछ विशेष काम के लिए ही उसे छूट मिले। आखिर महिलाओं को आजादी क्यों नहीं होनी चाहिए। कई बार गलतियां करके भी इंसान सीखता है। लेकिन, महिलाओं के हंसने-बोलने पर ही पहरा बैठा दिया जाता है।
ऐसे ही कितनी अवैज्ञानिक चीजों ने महिलाओं को गुलाम बनाने के लिए गढ़ी गई हैं। रीति-रिवाज, व्रत-त्योहार में महिलाओं की असमानता दिखाई पड़ती है। विडंबना यह है कि अधिकतर महिलाएं कुरीतियों को लेकर सजग नहीं है। वे खुद भी पुरुषवादी सत्ता संरचनाओं के चंगुल में आ जाती हैं। महिलाओं के लिए के लिए कोई अच्छी बात अगर हो सकती है तो यही कि उन्हें दकियानूसी सोच से बाहर निकाला जाए। १

 

 

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