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विमर्श- विक्षोभ और रचनाशीलता

पूंजीवादी युग के साहित्यकार तगड़े तंत्र की जकड़बंदी में विक्षुब्ध। परिवर्तनेच्छा, क्रोध और अवशता की त्रयी क्षोभ का निर्माण करती है। इस त्रयी को आकार देने में विचार की केंद्रीय भूमिका होती है।

प्रतीकात्मक चित्र।

समय, समाज और परिस्थिति की गतिशील पारस्परिकता में क्षोभ ही विक्षोभ में परिवर्तित होता है। सामंती युग के परिवर्तनकामी रचनाकार जड़ीभूत व्यवस्था से टकराते हुए क्षुब्ध होते हैं, तो पूंजीवादी युग के साहित्यकार तगड़े तंत्र की जकड़बंदी में विक्षुब्ध। परिवर्तनेच्छा, क्रोध और अवशता की त्रयी क्षोभ का निर्माण करती है। इस त्रयी को आकार देने में विचार की केंद्रीय भूमिका होती है। विक्षोभ के उद्भव की प्रक्रिया भी कुछ ऐसी है, बस उसमें अवशता के साथ सामर्थ्य का बोध चिपक जाता है और विचार की जगह विचारधारा आ जाती है। क्षोभ का रूपाकार निश्चित नहीं होता, जबकि विक्षोभ की संरचना का अनुमान किया जा सकता है। अपने बहुलांश में क्षोभ व्याख्या-सापेक्ष और अंतमुर्खी होता है, जबकि विक्षोभ स्वत: स्पष्ट और बहिर्मुखी। क्षोभ और विक्षोभ दोनों ही संक्रामक होते हैं। अपने प्रसार के लिए क्षोभ को किसी संगठन की दरकार नहीं होती है, पर विचारधारा से संवलित विक्षोभ संगठन-शक्ति से सहज ही संपृक्त रहता है। अपनी अभिव्यक्ति में क्षोभ संकोची होता है। दूसरी ओर, विक्षोभ निर्भ्रांत मुखरता का पैरोकार। क्षोभ सांस्कृतिक आंदोलन को जन्म देता है। विक्षोभ राजनीतिक आंदोलन से जुड़ कर आता है। सांस्कृतिक आंदोलन उसकी पृष्ठभूमि में रहा करता है। व्यवस्था का विकल्प देने की अनिवार्यता क्षोभजनित साहित्य या आंदोलन में नहीं होती, जबकि विक्षोभ वैकल्पिक व्यवस्था का प्रस्तोता हुआ करता है। क्षोभ से उपजी कविता अपने पाठकों से कोई मांग नहीं करती, पर विक्षोभजन्य साहित्य में कुछ पूर्व शर्तें अंतर्निहित रहती हैं। ऐसा पाठक, जिसे विक्षोभ-काव्य के सरोकारों से न्यूनतम वास्ता भी न हो, उससे असंपृक्त ही रहता है।

विक्षोभ का संदर्भ वैश्विक होता है और क्षोभ का स्थानीय। लेकिन, यह भी सच है कि क्षोभजन्य काव्य में समस्त मानव समुदाय को संवेदित करने, अपील करने की क्षमता रहती है। विक्षोभ चयनधर्मी होता है। इसमें आकर्षण और अनाकर्षण दोनों ही तीव्रतम रूप में रहते हैं। ज्ञानानुशासनों से विक्षोभ का जुड़ाव प्रकट-प्रत्यक्ष होता है। क्षोभ अपनी अंत:प्रकृति में ऐसी संबद्धता का मुखापेक्षी प्रतीत नहीं होता। विक्षोभ तार्किकता, संगति और वैज्ञानिकता की सतत परवाह करता चलता है। क्षोभ में ऐसी परवाह कोई मायने नहीं रखती। क्षोभ का कवि विचार, जीवन और लेखन में एकरूप होता है, विक्षोभ के कवि को इनके मध्य संगति खोजनी-बिठानी पड़ती है। यहां प्रतिबद्धता का प्रश्न इसीलिए अपरिहार्य हो जाता है।  भारत के इतिहास में 1857 जनता के क्षोभ का सीमांत समय है। यहां आकर क्षोभ का विस्फोट होता है। इसके बाद क्षोभ का रंग-ढंग बदल जाता है। यह बदलाव साहित्य में दिखता है। क्षोभ की सांस्कृतिक भावधारा में राजनीतिक चेतना का अंश बढ़ जाता है। इसी में विक्षोभ के तत्त्व बनते हैं। ‘स्वाधीनता चाहिए’- यह पुकार क्षोभ की काया को अधिकाधिक राजनीतिक बनाती जाती है। स्वाधीनता का क्या करेंगे, वह किसके लिए होगी- जैसे प्रश्नों पर चिंतन क्षोभ के कवियों को विक्षोभ की ओर ठेलता जाता है। देशभक्ति और राजभक्ति के द्वंद्व से निकल कर पूर्ण स्वाधीनता की ओर जाता कवि-समुदाय स्वाधीनता के दायरे का भी विस्तार कर रहा है। जाति की दासता से छुटकारा इसी का एक आयाम है। संधिकाल के कवि श्रीधर पाठक की प्रश्नाकुल पीड़ा है- ‘और अधिक क्या कहें बापजी, कहते दुखता हिया/ जटिल जाति का अटल पताका, जाल है किसका लिया?/ मनूजी तुमने यह क्या किया?’

छायावाद में क्षोभ फिर राजनीति से दूरी बनाता हुआ सांस्कृतिक सांद्रता अर्जित करता है। स्वर्णकाल की खोज, अतीत का गौरवगान इसी का प्रतिफल है। क्षोभ के विपथन की आशंका इसमें मौजूद है। युग की मांग, जनता की चाहत और साहित्य के ढर्रे में तारतम्य बनाने के लिए कुछ तोड़फोड़ जरूरी हो गई थी। इस सामयिक दायित्व-निर्वाह के लिए निराला आगे आते हैं। 1920 में रचित ‘बादल राग’ क्षोभ के चरमोत्कर्ष की कविता है। विक्षोभ-काव्य का आरंभ इसके बाद होता है। ‘अट्टालिका नहीं है रे आतंक भवन’ और ‘विप्लव रव से छोटे ही हैं शोभा पाते’ जैसी पंक्तियां मानो आगत विक्षोभ को आकार दे रही हैं! एक अवधारणा के रूप में विक्षोभ को प्रस्तावित करने वाले रचनाकार हैं नागार्जुन। अपनी काव्य-चेतना को स्पष्ट करने के क्रम में लिखे निबंध ‘विषकीट’ में उन्होंने विक्षोभ को एक रस माना है। नौ रसों की सूची में अगला रस। यह विक्षोभ वक्रोक्ति या मार्मिक कथन नहीं है। नागार्जुन ने विक्षोभ-काव्य की परंपरा का निर्देश करते हुए कबीर, तुलसी, भारतेंदु, मैथिलीशरण और निराला का जिक्र किया है। यह क्षोभ से विक्षोभ की यात्रा है। मैनेजर पांडेय ने विक्षोभ रस की मीमांसा करते हुए उसमें तीन भावों का योग माना है- करुणा, क्रोध और घृणा। नागार्जुन का कहना है कि विक्षोभ-कविता अभावग्रस्त लेकिन संघर्षशील जनता से जुड़ कर ही बनती है। ऐसी कविता अभीष्ट पाठक-समुदाय से कुछ अपेक्षा भी रखती है- ‘बहुजन समाज की व्यापक विपन्नता से आपका प्रत्यक्ष परिचय है, तब आपको विक्षोभ रस का अनुभव होगा।’
निराला के बरक्स सुमित्रानंदन पंत विक्षोभ काव्यांदोलन के असर में आए और वैसी कविताएं भी रचीं। विक्षोभ साहित्य के दो मोर्चे थे। पहले मोर्चे पर वह साम्राज्यवाद से जूझ रहा था, तो दूसरे मोर्चे पर सामंतवाद से। दोनों मिल कर जनता को बाहर-भीतर से ‘दलिद्दर’ बना रहे थे। ‘साम्राज्यवाद’ नामक कविता में पंत ने लिखा- ‘विश्व क्षितिज में घिरे पराभव के हैं मेघ भयंकर/ नवयुग का सूचक है निश्चय यह तांडव प्रलंकर।’ दिनकर भी विक्षोभ से संक्रमित हुए और ‘लाल भवानी’ का स्वागत किया- ‘जगज्योति, जय-जय भविष्य की राह दिखाने वाली/ जय समत्व की शिखा, मनुज की प्रथम विजय की लाली।’

साम्राज्यवाद और सामंतवाद की दुरभिसंधि ने अपनी रक्षा के लिए जिस प्रहरी को जन्म दिया उसे हिंदुत्व कहा जाता है। रूमानी तबीयत के कवि भगवतीचरण वर्मा जब विक्षोभ-काव्य से जुड़े तो उन्होंने जनमुक्ति के नए बाधक-तत्त्व को ‘विस्मृति के फूल’ संग्रह में इस तरह संबोधित किया- ‘तुम विनाश के लक्ष्य, पतन के कलुषित जीवन/ तुम कलंक के अंक, अवनि के पाप पुरातन/… भेदभाव के दास, धर्म के अविकल साधक/ विधवाओं के काल, और गायों के पालक/ पशुओं पर है दया, मनुष्य पर है अत्याचार/ व्यंग्यमात्र है अरे पतित, यह सब तेरा आचार!’ विक्षोभ-कविता की परिभाषा और लक्षण-उदाहरण के आदर्श कवि मुक्तिबोध हैं। ‘कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं’ शीर्षक कविता में उन्होंने ‘सेफ-जोन’ के ‘घुग्घू’ बुद्धिजीवियों/ रचनाकारों के डर का खुलासा किया- ‘हम भी जब हुए भूत/ घुग्घू या सियार बने/ तो अभी तक यही व्यक्ति/ जिंदा क्यों?/ उसकी वह विक्षोभी संपीड़ित आत्मा फिर/ जीवित क्यों रहती है?’ डरने वालों की जुबानी मुक्तिबोध बताते हैं कि विक्षोभ की ‘वे किरणें/ उनके लेखे ही आज/ कम्युनिज्म है…’। विक्षोभ का रिश्ता अगर ‘बादल-राग’ से है, तो वहां रंगों की अर्थपूर्ण प्रतीक-व्यवस्था भी होगी। मुक्तिबोध लाल और नीले में अकारण ही मैत्रीभाव नहीं देखते हैं- ‘अंधेरे में,/ अकेली एक छायामूर्ति/ कोई लेख टाइप कर रही तड़-तड़-तड़ातड़-तड़/ व उसमें से उछलते हैं/ घने नीले-अरुण चिनगारियों के दल…’। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ के अंतिम हिस्से में जब ‘धरती का नीला पल्ला कांपता है’ तो ‘विचारों की विक्षोभी तड़ित कराहती है’।
विक्षोभी-कवि जनशक्ति में भरोसा रखे। अपने विवेक को उसके सहज-विवेक से जोड़े रखे। ‘अपने लोग’ कविता में मुक्तिबोध कहते हैं कि जिस सत्य को सुशिक्षित पहचान नहीं पाते उसे ‘गिरस्तिन मौन मां-बहनें’ चीन्ह लेती हैं; इसलिए कि ‘भोले भाव की करुणा बहुत ही क्रांतिकारी सिद्ध होती है’। ‘अंधेरे में’ आत्मसंभवा ‘परम अभिव्यक्ति’ को महान ‘विवेक-विक्षोभ’ संपन्न बताने के साथ मुक्तिबोध अपने कवि की कमजोरी या कायरता नहीं छिपाते- ‘आश्चर्य!! अद्भुत!!/ लोगों की मुट्ठियां बंधी हैं/ उंगली संधि से फूट रही किरणें/ लाल-लाल/ यह क्या!!/ मेरे ही विक्षोभ मणियों को लिए वे,/ मेरे ही विवेक-रत्नों को लेकर,/ बढ़ रहे लोग अंधेरे में सोत्साह/ किंतु मैं अकेला/ बौद्धिक जुगालों में अपने से दुकेला।’ ०

 

 

 

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