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जलवायु: मौत का कारक

वातावरण में हाइड्रोकार्बन की अधिकता कैंसर जैसे रोगों के लिए जिम्मेदार है।
Author October 9, 2016 00:22 am
प्रतिकात्मक चित्र।

हाल ही में विश्व बैंक द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वायु प्रदूषण सबसे घातक है। यह दुनिया भर में समय से पहले मौत का सबसे बड़ा कारक है। देश की अर्थव्यवस्था को वायु प्रदूषण से सालाना 56,049 करोड़ डालर से अधिक का नुकसान हो रहा है, साथ ही करीब 14 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। वायु प्रदूषण से सकल घरेलू उत्पाद को होने वाले नुकसान के मामले में चीन पहले नंबर पर, भारत दूसरे नंबर पर और अमेरिका तीसरे नंबर पर है। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में लगातार वाहनों की संख्या बढ़ने के कारण प्रदूषण और सांस से संबंधित विभिन्न बीमारियां पनप रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 91 देशों के 1100 शहरों से हवा की गुणवत्ता संबंधी आंकडेÞ एकत्रित कर इनका अध्ययन किया। संगठन का अनुमान है कि 2008 में श्वसन संबंधी बीमारियों और कैंसर से लगभग तेरह लाख चालीस हजार लोगों की असमय हुई मौत की वजह प्रदूषित हवा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अगर उसके दिशानिर्देशों का वैश्विक स्तर पर पालन किया गया होता तो 2008 में लगभग दस लाख नौ हजार लोगो की मौतों को टाला जा सकता था। विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन की ये खबरें न केवल वाहनों के माध्यम से होने वाले वायु प्रदूषण पर हमारी आंखें खोलती है बल्कि जरूरत से ज्यादा ऐशो-आराम की जिंदगी जीने की लालसा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। गौरतलब है कि पचहत्तर फीसद से भी अधिक वायु प्रदूषण वाहनों के माध्यम से होता है। वाहनों से निकलने वाले धुएं में कार्बनमोनोआॅक्साइड ,नाइट्रोजन के आॅक्साइड ,हाडड्रोकार्बन और सस्पेंडेड परटिकुलेट मैटर जैसे खतरनाक तत्त्व और गैसें होती हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। कार्बनमोनोआॅक्साइड जब सांस के माध्यम से शरीर के अंदर पहुंचता है तो वहां हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन नामक तत्त्व बनाता है। इस तत्त्व के कारण शरीर में आॅक्सीजन का परिवहन सुचारु रूप से नहीं हो पाता है। नाइट्रोजनमोनोआॅक्साइड और नाइट्रोजनडाईआॅक्साइड भी कम खतरनाक नहीं हैं। नाइट्रोजनमानो आॅक्साइड ,कार्बनमोनो आॅक्साइड की तरह ही हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर शरीर में आॅक्सीजन की मात्रा घटाता है। इसी तरह नाइट्रोजनडाईआॅक्साइड फेफड़ों के लिए बहुत ही खतरनाक है।

इसकी अधिकता से दमा और ब्रांकाइटिस जैसे रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। वातावरण में हाइड्रोकार्बन की अधिकता कैंसर जैसे रोगों के लिए जिम्मेदार है। वाहनों से निकलने वाला इथाईलीन जैसा हाडड्रोकार्बन थोड़ी मात्रा में भी पौधों के लिए हानिकारक है। सस्पेंडेड परटिकुलेट मैटर बहुत छोटे-छोटे कणों के रूप में विभिन्न स्वास्थ्यगत समस्याएं पैदा करते हैं। ऐसे तत्त्व हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचा कर सांस संबंधी रोग उत्पन्न करते हैं। दरअसल पुराने जमाने में लोग बैलगाड़ियों से सफर किया करते थे। इस दौर में न ही तो बैलगाड़ियों के सफर का अस्तित्व रहा और न बैलगाड़ियों के सफर का किस्सा सुनाने वाले बुजुर्ग ही रहे। तेज भागती जिंदगी में बैलगाड़ियों से सफर करना संभव भी नहीं है इसलिए यह किताबों और कहानियों का किस्सा बनकर रह गया है।

वह धीमा सफर न केवल पर्यावरण के अनुकूल था बल्कि हमें प्रकृति के साथ भी जोड़े रखता था। धीरे-धीरे सफर की रफ्तार बढ़ी तो हमारी समस्याओं की रफ्तार भी बढ़ने लगी। मध्यमवर्गीय परिवारों में स्कूटर खरीदने का स्वप्न पूरा होने पर खुशियां मनाई जाने लगी। धीरे-धीरे इन परिवारों में मोटर साइकिलों की संख्या में भी वृद्धि हुई। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण की आंधी ने भारत के मध्यमवर्गीय परिवारों को कार खरीदने का स्वप्न दिखाया। एक जमाना था जब किसी गांव में स्कूटर और मोटरसाइकिल पहुंचने पर लोग अचरज भरी नजरों से देखते थे। अगर किसी गांव में कोई कार पहुंच जाती थी तो गांव के बच्चे और बडेÞ धूल उड़ाती कार के पीछे भागते हुए अपने आपको धन्य समझते थे। आज समृद्ध गांवों की स्थिति यह है कि हर तीसरे-चौथे घर में एक कार मौजूद है। निश्चित रूप से यह विकास सुखद है लेकिन जब यह विकास विभिन्न रूपों में विनाश को दावत देता है तो यही दुखद हो जाता है। इस मुद्दे पर शहरों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। अकेले दिल्ली में ही प्रतिदिन लगभग चालीस लाख वाहन सड़कों पर दौड़ते हैं। एक अनुमान के मुताबिक अगर निजी वाहनों के बढ़ने की रफ्तार इसी तरह जारी रही तो दिल्ली में 2030 तक 1.5 करोड वाहन पंजीकृत हो जाएंगे। छोटे शहरों की स्थिति भी इससे जुदा नहीं है।

दरअसल इस दौर में हमने वाहनों को सुविधा से ज्यादा समस्या बना लिया है। यही कारण है कि तेजी से बढ़ते वाहन हमारे लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। भले ही हमारे घर में गाड़ी खड़ी करने की जगह न हो लेकिन पड़ोसी के पास गाड़ी है तो हमें भी गाड़ी चाहिए । झूठी प्रतिष्ठा आखिरकार हमारे स्वास्थ्य को भी झुठला रही है। हालांकि, सड़कों पर वाहनों का दबाव कम करने के लिए बार-बार कार-पूल की सलाह दी जाती है। यानी एक जगह से आने-जाने वाले दो या अधिक लोगों को एक ही गाड़ी का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन झूठी प्रतिष्ठा के लिए इस सलाह को भी दरकिनार कर दिया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट एक बार फिर हमें चेतने का संदेश देती है। अगर हम अब भी नहीं चेतते हैं तो यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

 

 

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