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साहित्य: बाजारवाद और बाल साहित्य

बाल साहित्य को लिखने वाले वयस्त होते हैं और उसे बाजार से खरीद कर बच्चों के हाथों तक पहुंचाने वाले भी वयस्त होते हैं।

Author January 29, 2017 1:49 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

उमेश चंद्र सिरसवारी

किसी भी देश या समाज के भविष्य का अनुमान वर्तमान को देख कर लगाया जा सकता है। बचपन के निर्माण में जिन तत्त्वों की प्रमुख भूमिका होती है, वे हैं- परिवार, वातावरण, विद्यालय और बच्चों को पढ़ने के लिए मिलने वाला साहित्य। जहां तक बाल साहित्य का प्रश्न है तो सामान्यतौर पर चार से बारह साल तक की आयु वाले बालक-बालिकाओं के लिए लिखे जाने वाले साहित्य को बालसाहित्य की श्रेणी में रखा जाता है। जिस प्रकार कोई बच्चा या बच्ची समाज के निर्माण का बीज रूप होती है, उसी प्रकार बाल साहित्य भी बालकों को संस्कार और विचार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह बालकों की प्रारंभिक अवस्था से ही उनके मन, विचार और कल्पना को परिमार्जित करते हुए समाज और राष्ट्र के भावी स्वरूप की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

आज बच्चों का जीवन इंटरनेट, मोबाइल आदि से ग्रस्त है। वे किताबों से दूर होते जा रहे हैं। उनकी रुचि पुस्तकों के प्रति घट रही है, वहीं टीवी धारावाहिक, गेम, इंटरनेट उनके ज्यादा करीब हो गए हैं। यह इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में बाल साहित्यकारों का दायित्व बन जाता है कि वे बच्चों के लिए कुछ हट कर सोचें, ऐसी रचना करें, जिससे बच्चे पत्र-पत्रिकाओं की ओर आकर्षित हों। बच्चे देश का भविष्य हैं। बच्चे हैं तो कल है, बिना बच्चों के घर सूना-सूना लगता है। भावी पीढ़ी के चरित्र-निर्माण में बाल साहित्य की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।समाज के नैतिक-मूल्यों में गिरावट आने के कारण इससे सीधे तौर पर बच्चे प्रभावित होते हैं, जिससे कभी-कभी उनके व्यवहार में असामान्यता दिखाई देती है। जैसे बड़ों की आज्ञा न मानना, बात-बात पर गुस्सा करना आदि। बच्चों का पालन-पोषण ऐसे माहौल में हो रहा हैं, जो उनके अनुकूल नहीं है। वे अत्याधुनिक साधनों के आने से तेजी के साथ असामान्य रूप से परिपक्व होते जा रहे हैं। आज के बच्चे पढ़ते नहीं हैं तो कहीं न कहीं हम नहीं पढ़ते। नए और पुराने के बीच सोच का अंतर होता ही है। लगातार अध्ययन-अध्यापन की आदत में कमी आती जा रही है।

बाल साहित्य को लिखने वाले वयस्त होते हैं और उसे बाजार से खरीद कर बच्चों के हाथों तक पहुंचाने वाले भी वयस्त होते हैं। बच्चे साहित्य सृजन की क्षमता में अक्षम होते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनमें साहित्य की कोई ऐसी समझ और रुचि नहीं होती जिससे वे बाजार से स्वयं पुस्तक खरीद सकें। ऐसे में बहुत अभिभावक बच्चों के कोमल मन में अपनी पसंद थोपने का काम करते हैं। यह वास्तव में अपराध जैसा है। जार्ज बर्नाड शॉ का कथन है कि किसी बच्चे के दिमाग में जबरदस्ती कुछ ठूंसना, निकृष्तम गर्भपात है। आज के परिदृश्य में साहित्यिक सेमिनारों और संगोष्ठियों में बाल साहित्य और समस्याओं चर्चा नहीं हो रही है। आॅडियो-वीडियो, इंटरनेट, डिजिटल और इ-पुस्तकों के माध्यम से भी बच्चों तक काफी रचनात्मक समाग्री पहुंचाई जा सकती है। आजकल ऐसे विज्ञापन और दूसरी चीजें ऐसी दिखाई जाती हैं, जिनमें बच्चा कार खरीदने से लेकर, घर, कपड़ों, मोबाइल, जूतों का ब्रांड तय करने में माता-पिता को सलाह देता है। लेकिन, किताब खरीदने के बारे में शायद ही कोई विज्ञापन बनाता है। कुछ देशों में तो बच्चे कम उम्र से ही डाइटिंग कर रहे हैं। रियलिटी शो की तरह बात करना सीख रही हैं। मगर साहित्य पढ़ने की कोई समझ उनके भीतर विकसित नहीं की जा रही है। इन चीजों से बच्चों की मासूमियत खत्म हो रही है। कॉरपोरेट मीडिया इसे ‘ग्रोथ’ बता रहा है। वह बच्चे की जिद को एक पॉाजिटिव वैल्यू में बदल रहा है। क्या सचमुच इसे ही कहते हैं ग्रोथ ?

अगर आप मीडिया में छपने वाली कहानियों पर नजर डालें तो पाएंगे कि जो सफल है बस वही जीने लायक है, वही दिखाने लायक है। उसी की खबर बन सकती है, अगर आप इनके खिलाफ लिखते हैं, इन पर सवाल उठाते है, तो पिछड़े और रूढ़िवादी कहलाते हैं। अगर आप नहीं लिखते तो निश्चय ही आपकी कहानी-कविताओं को कोई नहीं पढ़ने वाला। हम लेखक इस भ्रम में जरूर रह सकते हैं कि हमने तो बच्चों की दुनिया बदल दी और हमारी किताबों के तो कई-कई संस्करण निकल चुके हैं, कई भाषाओं में अनुवाद हो गए। ये पुरस्कार और वो पुरस्कार, सारे मिल गए ? अक्सर जब हम हिंदी बाल साहित्य की बात करते हैं तो हमारे जेहन में प्रिंट मीडिया रहता है। किताबों के बिकने और छपने की बातें रहती हैं। मगर चुनौतियां सिर्फ प्रिंट मीडिया तक ही सीमित नहीं हैं। आज बच्चों में सबसे अधिक लोकप्रिय कार्टून चैनल हैं। बच्चे इन्हें देखना बहुत पसंद करते हैं।

आखिर वे ऐसा क्यों करते है ? वे कार्टून तक की हर सीमा तक से परे और रियलिटी और फैंटेसी के अनोखे मिश्रण होते हैं, जबकि हमारे यहां अब भी बहुत से लोग फैंटेसी से नाक-भौं सिकोड़ते हैं। वे वैज्ञानिक विकास की छड़ी लिए फिरते हैं। कार्टून एनीमेशन से बनते हैं। टीवी, कंप्यूटर, सीडी, डीवीडी, पेनड्राइव या सिनेमा हाल में देखे जाते हैं। ये सब उच्च तकनीक का परिणाम हंै। तकनीक वैज्ञानिक विकास का ही हिस्सा है। दूसरी तरफ एक बात यह भी सुनाई देती है कि हिंदी में कोई किताब हैरी पॉटर की तरह लोकप्रिय क्यों नहीं होती?
सचाई यह है कि हैरी पॉटर का धुआंधार प्रचार हुआ है, तमाम माध्यमों ने उसे घर-घर तक पहुंचाया, क्या आज तक भारत में बच्चों की तो क्या बड़ों की भी किसी किताब के साथ ऐसा हुआ है? बच्चों की किताबों के प्रति तो वैसे ही उदासीनता बिखरी पड़ी है। हर रोज चुनौतियां बढ़ रही हैं।

सवाल तो यही है कि उनसे कैसे निपटा जाए ? तो सवाल शायद यही है कि क्या हमारा बाल साहित्य इन चुनौतियों से निपटने को तैयार है ? क्या लेखक इसे बच्चे को संबोधित कर रहे हैं ? वह बच्चा और उसके माता-पिता आज की चुनौतियों को बच्चे की खूबी की तरह देख रहे हैं ? एक तरफ उन कविता-कहानियों से बचना है जो बच्चे को मार-मार कर उपदेश की घुट्टी पिलाते हों, तो दूसरी तरफ उस बच्चे को देखना है जिसकी हर इच्छा पूरी हो रही है, मगर वह खुश नहीं है। बाल साहित्यकारों के सामने यह चुनौती है कि बाल साहित्य के प्रति रुचि कैसे पैदा करें? उसका सामना एक खतरनाक वैश्विक बाजारवाद से है, जिसके पास अकूत पैसे की ताकत है जो बच्चों से बचपन छीनना व अपनी विचारधारा थोपना अच्छी तरह से जानता है ओर इसमें वह सफल भी हो रहा है। यह सारा परिदृश्य बेहद निराशाजनक है, मगर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने से स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं।

जो लोग साहित्य से जुड़े हैं उनको इसकी चिंता करनी होगी क्योंकि ऐसे ही लोग साहित्य को बचा सकते हैं। अगर हमने बच्चों के विकास और खुशहाली के प्रति तत्काल कदम न उठाए तो इसका सिला हमें भुगतना पड़ेगा क्योंकि आने वाला समय चुनौतियों से भरपूर है। इन चुनौतियों का मुकाबला हम बच्चों के लिए अच्छा बाल-मनोवैज्ञानिक साहित्य रच कर, उनकी मानसिक दुविधाओं का हल ढूंढ़ कर ही कर सकते हैं। जब बच्चों की मानसिक भूख के अनुसार उन्हें भोजन मिले और उनकी संवेदनशीलता के अनुसार पठन-सामग्री हो तो यह बच्चों के हित में होगा और ऐसा करके हम भावी पीढ़ी के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहे होंगे। बाल साहित्य के विशेषज्ञ हरिकृष्ण देवसरे के शब्दों में ,‘‘यह तभी संभव है जब परिवार में मुक्त वातावरण हो और बच्चों की बात सुनी जाए। भविष्य का समाज जैसा होगा, उसके अनुरूप बच्चों को तैयार करना ही हमारा दायित्व है और यह दायित्व बच्चों की दुनिया से जुड़े लोगों और बाल साहित्य लेखकों को पूरा करना है, क्योंकि उन्हें इस विचार को जगाना है, जो नई पीढ़ी को, नई शताब्दी के लिए तैयार कर सकेंगे।’’ ०

 

 

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