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अकल पर भारी नकल

देश के कई राज्य प्राथमिक और माध्यमिक परीक्षाओं में गहरे तक नकल के रोग से ग्रसित हैं। कहीं-कहीं तो यह विषाणु विश्वविद्यालयों और भर्ती परीक्षाओं तक को अपनी चपेट में ले चुका है। शिक्षा का निजीकरण और कोचिंग कारोबार शिक्षा की बदहाली के एक बड़े कारण के रूप में सामने आए हैं। आखिर कैसी हो परीक्षा और शिक्षा प्रणाली ? जायजा ले रहे हैं जगमोहन सिंह राजपूत।

Author April 9, 2017 5:21 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

विश्व में कोई भी विकसित या विकासशील देश ऐसा नहीं है जो अपनी शिक्षा पद्धति से पूरी तरह संतुष्ट हो! यह शिक्षा और ज्ञानार्जन के संबध में अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर इंगित करता है।गतिशीलता ही शिक्षा की मूल पहचान है। उचित गुणवत्ता वाली शिक्षा वही है जो आज तक के संचित ज्ञान को आधार मानकर उसमें वृद्धि, शोधन, परिशोधन के लिए व्यक्ति को तैयार करे तथा मानव मात्र की नैसर्गिक जिज्ञासा बढ़ाती रहे ताकि उसकी सर्जनात्मकता नए- नए ज्ञान और कौशल के क्षेत्र खोलती रहे। जीवन कौशल इसी प्रक्रिया में सीखे जाते हैं और यहीं से सामाजिकता, भाईचारा और एक सुसंस्कृत जीवन जीने की कला भी अंतर्निहित की जाती है। कोई भी समाज शिक्षा की अनदेखी नहीं कर सकता है और न ही वह इसमें कोई भेदभाव कर सकता है? इस परिदृश्य में देखने पर भारत की शिक्षा व्यवस्था लचर दिखाई पड़ती है। उसकी गुणवत्ता में कमी चिंता का विषय बनी है। इस गुणवत्ता की कमी में अन्य तत्त्वों के साथ साथ कदाचरण का बढ़ना भी सभी को दिखाई देता है। व्यवस्था में आई कमियों के कारण जो अस्वीकार्य प्रवृत्तियां उभर कर सामने आई हैं, उनमें नकल का भयावह स्तर तक बढ़ना शामिल है। आज यह लाखों बच्चों का भविष्य नष्ट कर रहा है। सामान्य जनमानस नकल को शिक्षा की बोर्ड परीक्षायों से ही जोड़ता है। वैसे स्कूल शिक्षा परीक्षाओं से उच्च शिक्षा तक इसका विस्तार हुआ है। शोध पत्र की पूरी या आंशिक चोरी तो अनेक बार पकड़ी जाती है, खबर भी बन जाती है, मगर अधिकांश प्रकरणों में मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।

नकल के अपने नवाचार भी चलते रहते हैं। शोध-पत्र कोई और लिख दे, कई लोग पूरी की पूरी ‘थीसिस’ ही दूसरों से से लिखा कर ‘डॉक्टर’ बन जाते हैं। स्कूलों में नकल के प्रचलित विकल्प अनेक हैं- खुद नकल करना, किताब या पुर्जी लाना, किसी द्वारा परीक्षा के दौरान आकर उत्तर बताना, अपनी जगह किसी अन्य को बैठा देना या कॉपी बदल कर अन्य से लिखी-लिखाई कॉपी जमा कर देना। आधुनिक संचार तकनीकी ने नकल के क्षेत्र पर भी अपना प्रभाव डाला है।परीक्षा में नकल से बच्चों का पहला परिचय कब होता है? वैसे बच्चे तो बड़ों का अनुकरण करते हुए ही बड़े होते हैं। माता-पिता तथा संबंधियों को देख कर प्रारंभ में सारा कुछ सीखते हंै। धीरे-धीरे उनका अपना व्यक्तित्व विकसित होता है मगर स्वयं निर्णय लेने की समझ आने में समय तो लगता ही है। यही वह अवसर होता है जब वे पारिवारिक, सामाजिक तथा मानवीय मूल्यों के प्रति अपना दृष्टिकोण बनाते हैं, अपने ढंग से जीने के लिए तैयार होते हैं। औपचारिक रूप में नकल शब्द मैंने गांधी जी के बारे में मोटे अक्षरों में लिखी प्राथमिक शाला की एक पुस्तक में वर्णित एक घटना को पढ़ कर जाना था। मोहनदास के स्कूल में इंस्पेक्टर साहब आए थे। उन्होंने अंग्रेजी में शब्द ‘केटल’ लिखने को कहा। मोहनदास को इस शब्द की वर्तनी नहीं आती थी। उन्होंनें गलत लिखा था, अध्यापक ने इशारा किया कि बगलवाले से देखकर ‘नकल’ कर लें। मगर मोहनदास को घर में दी गई सीखें याद आर्इं और उन्होंने नकल नहीं की। इसे पढ़ कर पूरी कक्षा नें नकल क्या होती है उसी दिन जाना था। मोहनदास नें क्यों नकल नहीं की, यह तब समझ पाना जरूरी नहीं था। यह तो बाद में तब समझ आया जब स्वयं परीक्षाएं दीं, परीक्षाएं लीं और प्राचार्य के पद पर रहते हुए ग्यारह वर्ष तक नकलविहीन परीक्षा पद्धति लागू करने के प्रयास में अपने अनुभवों को परिपक्व किया। जब अपवादस्वरूप अपने पढ़ाए किसी विद्यार्थी को साठ-सत्तर के दशक में नकल करते देखा तो कई बार लगा कि क्या मैंने केवल पाठ्यक्रम ही पढ़ाया। इनके संपूर्ण विकास के तत्त्वों को क्या भुला दिया? उस समय आक्रोश, अवसाद, निराशा, ग्लानि के भाव हर उस अध्यापक के मन में स्वत: ही उभरते थे। आज नकल करने की प्रवृत्ति चिंताजनक स्थिति तक बढ़ गई है। कुछ प्रांतों या क्षेत्रों में सारी सरकारी व्यवस्था ही ऐसी लगती है की शिक्षा माफिया के हाथों में आ गई है। बिहार इसमें अग्रणी रहा है और उत्तर प्रदेश भी अभी तक तो पीछे नहीं कहा जा सकता है। फिर भी इस बड़े देश में अधिकांश स्कूल, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आज भी नकल से दूर हैं। कभी-कभार एक-दो अपवाद सामने आ ही जाते हैं मगर चिंता की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब राज्य-स्तर पर नकल कराई जाती हो और उसे अध्यापकों, अधिकारियों और समाज का संरक्षण मिला हो। ऐसे कामों में राजनेता भला कैसे पीछे रह सकते हैं? उनकी संलिप्ता से लोग लगातार परिचित रहे हैं। यहां भी जब अपवाद स्वरूप इनमें से किसी ने नैतिक साहस दिखाया तो नियंत्रण संभव हुआ। उत्तर प्रदेश में 1991 में नकल विरोधी अध्यादेश पारित हुआ था। उस समय के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री इसके चुनावी परिणामों से भलीभांति परिचित थे मगर वे उसके लिए तैयार थे। उस वर्ष बोर्ड परीक्षा के परिणाम बीस प्रतिशत के आसपास सिमट गए। विपक्ष ने इस अध्यादेश को निरस्त करने के वादे पर चुनाव जीता, वादा पूरा किया और परीक्षा परिणाम 95 प्रतिशत के ऊपर पहुंच गया। इसे याद करना जरूरी है क्योंकि आज नकल के फैलाव को समझाने के लिए उन सभी ‘कर्णधारों’ को पहचानना आवश्यक है जो अपने बच्चों को विदेश भेज देते हैं और बाकी के लिए ऐसी स्थितियां पैदा करते हैं जो लाखों का भविष्य बर्बाद कर देती हैं। ग्यारह से सोलह साल के आयु वर्ग से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि अगर नकल की सुविधा उसे मिल रही हो तो वह गांधीजी की तरह उसका लाभ उठाने से मना कर दे।
अब माता-पिताओं का दृष्टिकोण भी बदला है। जो लोग संपन्नन हैं, सत्ता में हैं या सत्ता के करीब हैं, वे परीक्षा के अंको में हेर-फेर करा लेते हैं, नकल की सुविधा खरीद लेते हैं और अन्य को पीछे छोड़ कर अपने बच्चों को आगे बढ़ाते रहें हैं। फिर समाज के बाकी लोग भी अपने बच्चों के लिए जो कर सकते हैं, क्यों न करें? कई बार प्राचार्य के पद पर मैंने यह सुना है कि ‘इसके’ भविष्य को तो बोर्ड परीक्षा के अंक ही निर्धारित करेंगे, इसकी नैतिकता या इमानदारी नहीं! इसी सोच का परिणाम है कि बोर्ड परीक्षा के दौरान सारा गांव, शहर या कस्बा परीक्षा केंद्र के चारों तरफ देखा जा सकता है। वैसे अब नकल केवल स्कूल बोर्ड परीक्षा तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालयों में भी इसका बड़े स्तर पर प्रवेश हो चुका है। यह समझ आते-आते बहुत देर हो जाती है कि इस प्रकार से प्राप्त प्रमाणपत्र या उपाधियों की कीमत महज एक कागज के तुकड़े की ही रह जाती है! कुछ दिन पहले एक राज्य के कानून मंत्री को फर्जी डिग्री के कारण पद छोड़ना पड़ा। एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति को फर्जी डिग्री के कारण हटाया गया। कई वर्ष पहले जब मैंने पढ़ा कि एक राज्य के शिक्षा मंत्री ने कक्षा दस की परीक्षा एक पड़ोसी राज्य में जाकर दी तो मैंने उन्हें बधाई का पत्र लिखा। बाद में पता चला कि उन्होंने किसी ‘ऐवजी’ यानी मुन्नाभाई को अपनी जगह भेज दिया था! मैं अब इस प्रकार के पत्र नहीं लिखता हूं।

शिक्षा की वह संकल्पना कि इसका व्यापार नहीं किया जा सकता है, भारत में ही पनपी थी। आज भारत में ही उसे बिना कहे जमींदोज कर दिया गया है। आज हम कोचिंग उद्योग की चर्चा करते हैं, वहां होनेवाली हर दर्दनाक आत्महत्या की खबर पढ़ते हैं और सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है! अब तो केवल प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं के लिए ही नहीं, इन कोचिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए भी अच्छे अंक आने ही चाहिए! माता-पिता इनके लिए ‘पेट काट कर भी’ धन लगाने को तैयार होते हैं और तेजी से बढ़ता नकल उद्योग इस सब का फायदा उठाता है, अच्छे अंकों का अर्थ है सामजिक प्रतिष्ठा तथा अच्छे पद प्राप्त करने की पूरी संभावना! अन्य के लिए धनार्जन का एक अतिरिक्त जरिया है। कुछ के लिए यह चर्चा और परिहास को आगे बढ़ाने में सहायक हो रहा है। नकल की स्वीकार्यता समाज में लगातार बढ़ रही है। देश के लिए हर प्रबुद्ध नागरिक के लिए यह घोर चिंता का विषय है। देश के अधिकांश अध्यापकों के लिए यह अत्यंत अपमानजनक स्थिति है, शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की यह एक अत्यंत मलिन तस्वीर लोगों के सामने रखती है। इधर तीन घटनाओं का मीडिया के द्वारा पिछले तीन वर्षों में लोगों तक पहुंचाया जाना इस समय की चर्चा में संदर्भित है। बिहार के वैशाली के चित्र, बिहार का साल भर पहले का टॉपर घोटाला तथा अब उत्तर प्रदेश के मथुरा और अन्य स्थानों से नकल की वहुमुखी विधा के विभिन्न स्वरूपों से लोगों का परिचय शिक्षा व्यवस्था की वस्तुस्थिति को दर्शाती है यानी उसकी कलई खोलती है। तब यह उभर कर सामने आता है कि अब नकल का मॉडल स्थानीय नहीं रह गया है। अब यह व्यापम की तर्ज पर व्यापक हो गया है। जिस प्रकार व्यापम कई वर्ष तक लगातार चलता रहा, सब कुछ जानते हुए और उसमें भागीदारी करते हुए उसके नियंता निश्चिंत बने रहे, वही स्थिति नकल के फलने-फूलने के संबंध में भी अनेक राज्यों में बनी रही। आज वह नासूर बन गई है।

बिहार से परीक्ष पास पर प्रवेश या नौकरी के लिए साक्षात्कार देनेवाले हर अभ्यर्थी को शक की निगाह से देखा जाता है। ऐसा कई दशकों से हो रहा है मगर सरकारें आती हैं, घोषणाएं करती हैं मगर वैशाली, टॉपर घोटाला या मथुरा प्रकरण रुकते नहीं हैं या यों कहें कि रोकने में किसी की रुचि नहीं है। संविधान ने तो चौदह साल तक के हर बच्चे को अनिवार्य निशुल्क शिक्षा प्रदान करने का दायित्व राज्य के जिम्मे किया था। उस समय सरकारी स्कूलों की साख शिखर पर थी। अध्यापकों को समाज में वही स्थान प्राप्त था जिसको आज के बच्चे किताबों में पढ़ते हैं। ट्यूशन करनेवालों को और पढ़नेवालों को अधिक सम्मान से नहीं देखा जाता था। 1970 के पहले तक यह कल्पनातीत था कि महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का आचार्य ट्यूशन करेगा! जैसे-जैसे यह सब बदला, शिक्षा की गुणवत्ता गिरी, सरकारी संस्थानों की साख ध्वस्त होती गई और ट्यूशन, कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में स्कूलों की पढ़ाई का स्तर गिरता गया और अस्वीकार्य प्रवृत्तियां सिर उठाने लगीं। नकल इनमें से एक है। वह उजागर हो गई है। होता बहुत कुछ और भी है। उत्तर प्रदेश में कई प्राचार्य और केंद्राध्यक्ष इस बार पकडेÞ गए हैं। मुझे याद है कि उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के आसपास एक विद्यार्थी का परिवार प्राचार्य द्वारा नकल कराने के लिए निर्धारित राशि पूरी नहीं दे पाया। तीन परीक्षपत्रों के बाद बच्चे से बकाया कल लाने को कहा गया। उसने कहा कि वह अब बिना नकल के ही परीक्षा देगा क्योंकि और पैसे देना उसके परिवार की सामर्थ्य में नहीं है। उत्तर मिला-पैसे तो अब पूरे ही देने होंगे नकल करो या न करो! अगले दिन जब उसकी मां अपने गहने गिरवी रखने गई तो उस सोलह साल के बच्चे ने आत्महत्या कर ली! ऐसे प्रकरणों में क्या अपराधी को इतना कठोर दंड नहीं मिलना चाहिए की वह अन्य के लिए नजीर बन सके?

सुधार की संभावनाएं क्या हैं? अपेक्षा तो मुख्या रूप से सरकार- विशेषकर राज्य सरकारों- से ही की जा सकती है। अगर स्कूल में प्रशिक्षितअध्यापक निर्धारित संख्या में पदस्थ हों, वे प्रतिदिन समय पर स्कूल में आकर अपना कार्य करें, सामान्य सुविधाएं उपलब्ध हों और राजनीति अध्यापकों को प्रताड़ित न करती हो तो निश्चित ही विद्यार्थियों की उपलब्धियां बढेंगी, उनका आत्म विश्वास भी अधिक होगा और नकल जैसी प्रवृत्तियों पर काफी हद तक खुद ही रोक लग जाएगी। पांचवे वेतन आयोग के लागू होने के बाद सरकारों नें अर्द्धशिक्षक, शिक्षा कर्मी, नियत मानदेय पर अध्यापकों की नियुक्तियां कीं और उसके दुष्परिणाम अब अनेक रूपों में सामने आ रहे हैं। एक ही स्कूल में एक सा काम करने के लिए नियुक्त नियमित तथा अनियमित के मध्य वेतन का भरी अंतर होता है। इस स्थिति में ऐसा वातावरण बन ही नहीं पाता है जिससे विद्यार्थियों के साथ उत्साहपूर्ण संवाद बना कर उन्हें सही रास्ता दिखाया जाए। किसी भी सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल का केंद्र बिंदु उसके प्राचार्य के इर्दगिर्द घूमता है। सरकारें प्राचार्यों की नियमित नियुक्तियां ही नहीं करती हैं। उत्तर प्रदेश में एक अन्य पक्ष भी बहु-प्रचलित है: अब विज्ञान के विषयों में प्रयोग लगभग होते ही नहीं हैं। सारे बच्चे अच्छे अंकों से प्रायोगिक परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं। क्या यह संभव है कि दशकों से चली आ रही इस व्यवस्था से सरकारें परिचित नहीं हैं? जो बच्चे नकल नहीं करते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर अधिक ध्यान देते हैं उन्हें यह समझाना कठिन नहीं है कि प्रयोगशाला में समय नष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है। स्कूल सारी व्यवस्था कर लेगास वे अपना समय मुख्या विषयों में लगाएं!

प्रशासनिक उपाय और कड़ाई आवश्यक है मगर इतना ही समस्या का समाधान नहीं है। अन्य शैक्षिक उपाय भी करने होंगे। सरकारी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान अत्यंत दयनीय स्थिति में हैं, ऐसे गैर-सरकारी संस्थान पैसे उगाहने के केंद्र के रूप में ही जाने पहचाने जाते हैं। अगर शिक्षक पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं होगा तो वह व्यक्तित्व विकास में सहायक हो ही नहीं सकेगा। अध्यापकों की नियुक्तियों में पारदर्शिता की भारी कमी है, इसके लिए नए नियम बनाने होंगे और तकनीकी की सहायता लेनी होगी। यह नहीं भूलना चाहिए की शिक्षा के निजीकरण में राजनेताओं ने भारी संख्या में भाग लिया है। वे स्वयं ही नियम बनाते हैं इसलिए उन्हें नियम तोड़ने से कौन रोक सकता है! जो सरकारें नकल रोकना चाहती हैं, उन्हें खजाने खोलने होंगे, स्कूलों को वह सब देना होगा, जो बच्चों का अधिकार है। नेतागीरी पर भी रोक लगानी होगी। परीक्षा केंद्रों की नीलामी करनेवाले अधिकारिओं को मुअत्तल नहीं, बर्खास्त करना होगा और जनता में यह विश्वास स्थापित करना होगा कि शिक्षा क्षेत्र बेईमानों के लिए वर्जित है! ०

 

 

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