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फिल्मी नायक की बदलती पहचान

घंटों जिम में पसीना बहा कर निखारे गए बदन को दिखाने की आतुरता फिल्मी नायकों के लिए लगता है अभिनय का पर्याय बन गई है। तभी तो ‘फोर्स’ में मोटर साइकिल उठाने वाले जॉन अब्राह्म ने ‘फोर्स-2’ में कार उठा ली। अभिनय के बुनियादी गुण हालांकि आज के फिल्मी नायकों के भीतर से पूरी तरह खत्म तो नहीं हुए हैं लेकिन परदे पर बलिष्ठ और कसरती दिखने के मोह में यह गुण पीछे छूटता जा रहा है। जायजा ले रहे हैं श्रीशचंद्र मिश्र।

Author December 18, 2016 12:45 AM
फिटनेस के शौकीन जॉन अब्राहम को जब भी बॉडी दिखाने का मौका मिलता है वह चूकते नहीं हैं। फिल्म फोर्स 2 में भी हमें उनके शानदार फाइट सीन देखने को मिलेंगे। शो के दौरान जॉन ने जब अपने बाइसेप्स दिखाए तो सबकी आंखें उन्हीं पर थीं। (Photo: Instagram)

 श्रीशचंद्र मिश्र

अपवाद पहले भी थे। आज भी हैं। बस मान्यता बदल गई है। अब तो शरीर बनाने और उसे दिखाने की होड़ से बमुश्किल कोई बच पा रहा है। अपने प्रयोगवादी अभिनय के बजाय मासपेशियां फुला कर जिस्म दिखाने वाले आमिर खान या रोमांटिक हीरो बन कर दौलत और शोहरत बटोर चुकने के बाद कमीज फाड़ कर अपने देह दिखाने को लालायित शाहरुख खान हों, सभी की प्राथमिकता बदल गई है। रणवीर सिंह गुच्छेदार केश और भारी भरकम मूछों के साथ हर कोण से शरीर दिखा कर तालियां पिटवा रहे हैं। ‘बाजीराव मस्तानी’ के गैटअप से वे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। सालों पहले ‘प्यार किया तो डरना क्या’ की शूटिंग के दौरान कमीज के बटन टूट जाने और तत्काल वैकल्पिक कमीज की व्यवस्था न हो पाने की वजह से सलमान खान को मजबूरन अधनंगे बदन को क्या दिखाना पड़ गया कि हिंदी फिल्मों के नायक की पारंपरिक पहचान की बदल गई है। सलमान खान तो खैर शर्ट उतार कर गठीला बदन दिखाने को फिल्म की सफलता की गारंटी मानने के अंधविश्वास में उलझ गए। बाकियों को भी देर सवेर उन्हीं की राह अपनानी पड़ी। अजय देवगन इस प्रपंच से बचे हुए थे। वे तो एक समय यही मानते थे कि किसी उत्पाद की पब्लिसिटी करना फिल्मी सितारों को शोभा नहीं देता। लेकिन अब न उन्हें विज्ञापनों में अपना चेहरा दिखाने से परहेज है और न बदन उघाड़ कर मांसपेशियां दिखाने में कोई संकोच बाकी रह गया है।
हिंदी फिल्मों में नायक की पहचान शुरू से ही शालीन और कोमल व्यक्ति की रही है। उसका सुंदर होना अनिवार्य माना गया। इस मानसिकता का फायदा उठा कर महिलाओं जैसी पतली आवाज में बोलने वाले करन दीवान से लेकर गऊ जैसे मासूम चेहरे वाले भारत भूषण और फिल्म में स्त्री बन कर ज्यादा फबने वाले विश्वजीत तक स्टार बन गए। कसरती बदन वाले नायक की उन दिनों उपेक्षा की यह हालत थी कि जयराज ऐतिहासिक फिल्मों तक सीमित रह गए और अजित व जयंत को चरित्र भूमिकाओं या खलनायकी की तरफ धकेल दिया गया। ‘मेरे लाल’ में मार्मिक अभिनय करने वाले देव कुमार नायक के रूप में स्वीकार्य नहीं हुए तो इसलिए कि उनकी कदकाठी कोमलता का आभास नहीं कराती थी। एक अरसे तक फिल्मी नायक के लिए मूंछ या दाढ़ी रखना तक वर्जित माना गया। फिल्म की कहानी में भेष बदलने के प्रसंग को फिल्माते समय जरूर इस संकोच को ताक पर रख दिया गया लेकिन सामान्य स्थिति में नायक के चेहरे पर बाल दिखना किसी को नहीं भाया, न निर्माता और न खुद नायक को। 1970 के दशक में हुए समांतर सिनेमा ने नायक की इमेज को लेकर बने कई मिथक तोड़ दिए। लेकिन व्यावसायिक फिल्मों में यह चलन टूटने में समय लग गया। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में 1979 में बनी ‘गोलमाल’ में एक दिलचस्प फलसफा था। क्या मूंछ किसी व्यक्ति की सज्जन होने की निशानी है? फिल्म वालों की मानें तो सालों तक उनमें यही धारणा बनी रही कि मूंछ उनकी रोमांटिक छवि को बिगाड़ती है। राजकपूर अपनी छोटी मूंछों के साथ बड़े अपवाद बने रहे, नहीं तो सवाक फिल्मों का दौर शुरू होने के बाद पिछली पूरी शताब्दी तक व्यावसायिक फिल्मों में ऐसे गिने चुने सितारे ही नजर आए जिन्होंने कभी कभार मूंछ भले ही लगा ली हो लेकिन कुल मिला कर मूंछ उगाना उन्हें कभी रास नहीं आया। ऐतिहासिक या पौराणिक फिल्मों में मूंछ रखने की अनिवार्यता रही तो उस तरह की फिल्मों में किसी बड़े सितारे ने भूले भटके ही काम किया। प्रदीप कुमार ऐतिहासिक फिल्मों वाली मूंछों के साथ सामाजिक-पारिवारिक फिल्मों में ज्यादा नहीं चल पाए। राजकुमार मूंछों को अपने व्यक्तित्व की विशेषता मानते रहे तो उन्हें मान्यता चरित्र अभिनेता के रूप में ही ज्यादा मिली। कुल मिलाकर मूंछें लगा कर कलाकारों ने या तो चरित्र अभिनेता की भूमिका की या खलनायकी की। हालांकि, खलनायकों में भी प्राण व अजित आदि ने ही इस परंपरा को निभाया।
नायकों के लिए तो मूंछ हमेशा वर्जित रही। देव आनंद को मूंछों से इतनी वितृष्णा थी कि एसएस वासन की जिद पर उन्होंने ‘इंसानियत’ में मन मार कर नकली मूंछ लगाई। बाद में खैर अपनी होम प्रोडक्शन ‘हम दोनों’ में दोहरी भूमिका में फर्क लाने के लिए उन्होंने मूंछ लगाई। ‘गैंबलर’ में तो वे गुच्छेदार मूंछ में नजर आए। यश चोपड़ा ने जब निर्माता के तौर पर पहली फिल्म ‘दाग’ बनाई तो उन्हें राजेश खन्ना को यह समझाने में काफी दिक्कत हुई कि फिल्म के दूसरे भाग में उनके बदले हुए रूप में विश्वसनीयता लाने के लिए मूंछों का सहारा लेना जरूरी है। उन्हीं यश चोपड़ा को ‘लम्हे’ के पहले भाग में अनिल कपूर को श्रीदेवी से छोटा दिखाने के लिए उनकी प्रिय मूंछें हटानी पड़ीं। अनिल कपूर बड़ी अनिच्छा से इसके लिए राजी हुए। दिलीप कुमार के माथे पर लटकती लट सालों उनकी विशेष पहचान बनी रही। 1960 के दशक तक देव आनंद के माथे पर बना बालों का फुग्गा फैशन स्टाइल बन गया। बालों का मोह ऐसा रहा कि भूमिका कैसी भी क्यों न रही हो, हीरो के बाल का नक्शा कभी नहीं बदला। राजकुमार व राकेश रोशन गंजे होने की वजह से विग लगाते थे लेकिन आम तौर पर सितारे विग लगाने से परहेज करते रहे।

ऋषि कपूर, संजय दत्त, सलमान खान, शाहरुख खान, सुनील शेट्टी, सनी देओल, अनिल कपूर, बाबी देओल आदि ने तो करिअ‍ॅर के एक दौर में लंबे बाल रखने का फैशन चलाया। इसमें दिलचस्प मोड़ यह रहा कि करिअ‍ॅर के आखिरी पड़ाव में जब जैकी श्राफ, गोविंदा व सनी देओल के बाल दगा देने लगे तो उन्होंने बाल ट्रांसप्लांट तक करा लिए लेकिन करिअ‍ॅर नहीं संभला। कास्मेटिक्स सर्जरी बोटोक्स व हेयर ग्राफ्टिंग की कोई तकनीक उनके काम नहीं आई। काफी समय तक कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि कोई हीरो गंजा हो सकता है। गंजा सिर लिए मोतीलाल, डेविड, राज मेहरा और करिअ‍ॅर की दूसरी पारी में प्रेमनाथ ने काम किया लेकिन वे चरित्र भूमिकाओं में ही सक्रिय रहे। गंजा सिर पहचान बना तो आज के सफल निर्देशक रोहित शेट्टी के स्टंट मास्टर पिता शेट्टी की वजह से और उन्होंने भी खूंखार दिखने के लिए यह रूप धरा। कुछ कलाकारों ने इन मान्यताओं को तोड़ने की हिम्मत दिखाई। संजीव कुमार ने बाल सफेद करवाए। असल में अपनी उम्र से ज्यादा की भूमिकाओं में वे ज्यादा सराहे भी गए। और किसी नायक ने इस तरह का साहस नहीं दिखाया। सफाचट खोपड़ी के साथ फिल्मों में कोई नजर आया तो खल भूमिका करने वाले कुल भूषण खरबंदा, अमरीश पुरी। अनुपम खेर जब ‘सारांश’ में पहली बार आए, तो आधे गंजे थे। चरित्र की मांग के मुताबिक कई फिल्मों में उन्होंने विग लगाई लेकिन अपने असली रूप में दिखना उन्हें हमेशा सहज लगा। विनोद खन्ना के बेटे अक्षय खन्ना के सिर पर बहुत कम बाल हैं लेकिन इसे लेकर कभी उन्होंने हीनभावना नहीं पाली। निर्देशक के कहने पर कुछ फिल्मों में उन्होंने नकली बालों का सहारा लिया लेकिन जहां जरूरत नहीं पड़ी उन्होंने अपने सामान्य रूप में दिखने से परहेज नहीं किया। लेकिन बालों का मोह फिल्म वालों को कितना ज्यादा है इसकी एक मिसाल है मूल रूप से संगीतकार, बाद में गायक और नायक और अब गीतकार व निर्माता बन गए हिमेश रेशमिया। जब तक उनके बाल कम रहे वे टोपी पहनते रहे और जैसे ही नकली बाल उगे उन्होंने टोपी उतार फेंकी। अभिनय पर कम और बालों की सजावट पर ज्यादा ध्यान देने की मानसिकता सालों से पाले रखने वाले फिल्मी नायकों का अचानक मूंछों से अनुराग हो जाना चौंकाता है। इसकी एक वजह फिल्मों का बदला मिजाज भी रहा और चिकनी चुपड़ी रोमांटिक भूमिकाएं करने वाले नायकों की खुरदुरी भूमिकाएं करने की लालसा का भी इसमें योगदान रहा।

पिछले कुछ सालों में कई सितारे मूंछों में नजर आए हैं। शाहरुख खान ने ‘पहेली‘ व ‘रब ने बना दी जोड़ी’ में मूंछें लगाई। अजय देवगन तो ‘सन आफ सरदार’ में पूरे सिख ही बन गए लेकिन इससे पहले भी उन्होंने ‘ओंकारा’, ‘गोलमाल’ व ‘बोल बच्चन’ में जम कर मूंछों का इस्तेमाल किया। सलमान खान ‘दबंग’ में, और आमिर खान ‘तलाश’ में मूंछ लगा कर खासे जमे। आमिर खान ने तो ‘मंगल पांडे’ के लिए बाल भी लंबे किए। मूंछों को लेकर दक्षिण और मुंबइया फिल्म जगत में काफी अलग धारणा रही। मुंबइया हीरो का जहां मूंछों से कम लगाव रहा वहीं दक्षिण में चाहें छोटी ही सही पर मूंछ लगभग हर सितारे के होठों पर चिपकी नजर आई। चाहें एनटी रामराव हों, एमजी रामचंद्रन, शिवाजी गणेशन हों या उनके बाद के चिरंजीवी, नागार्जुन, प्रभु देवा, मम्मूटी, मोहन लाल, रजनीकांत, कमल हासन। इनमें से जो भी सितारे हिंदी फिल्मों में आए उन्होंने अपनी मूंछ नहीं कटने दीं। कमोबेश यही परंपरा वहां अब भी है।

फिल्मी सितारों में फिट रहने की ललक ने एक बड़ा बदलाव यह ला दिया है कि पहले की तरह अब वे हादसों का उतना शिकार नहीं होते। एक्शन दृश्य खुद करने को वे आतुर रहते है। ‘सुपरमैन’ की छवि बनाए रखने के लिए यह जरूरी भी है। फिर भी उनकी शख्सियत का नाजुक पहलू भी कभी-कभी दिख जाता है। माना जाता है कि 1983 में फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान घायल होने के बाद इलाज के दौरान अमिताभ बच्चन को जो खून चढ़ाया गया था उसमें संक्रमण की वजह से उन्हें आज भी पेट की तकलीफ समय-समय पर अस्पताल ले जाती है। ‘कुली’ का वह दृश्य किसी भी औसत फिल्म के स्टंट दृश्य की तरह ही फिल्माया जा रहा था। उस दौरान अमिताभ घायल हो गए थे। अमिताभ की अस्वस्थता राष्ट्रीय चिंता का इतना बड़ा विषय बन गई कि जगह जगह प्रार्थना और यज्ञ तो हुए ही, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपनी विदेश यात्रा बीच में ही रद्द कर सीधे अमिताभ को देखने मुंबई पहुंच गर्इं। खैर, अमिताभ स्वस्थ्य हुए। लेकिन ‘जंजीर’ से फिल्मी परते पर उनकी महानायक की जो छवि बनी थी, वह कमजोर हो गई और पता चला गया कि परदे पर हैरतअंगेज स्टंट दृश्यकर दर्शकों की तालियां व सीटियां बटोरने वाले तथाकथित सुपरमैन सितारे कितने कागजी हैं। आज के बलिष्ठ दिखने वाले नायक भी इसका अपवाद नहीं हैं। परदे पर उनके जो हैरतअंगेज कारनामे दिखते हैं उसमें उनकी मजबूत कदकाठी का बेहद कम और उनके डबल्स के रूप में अपनी जान जोखिम में डालने वाले स्टंटमैन का बहुत ज्यादा योगदान रहता है। फिर काहे को मोह? इतनी ऊर्जा अभिनय में खपाएं तो क्या ज्यादा बेहतर नहीं होगा? ०

 

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