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बगरयो बसंत है

वैसे शास्त्रीय संगीत में बसंत तो पौष मास से ही शुरू हो जाता है, जब भारतीय गायक माघ, फाल्गुन तक तीन महीने बसंत गाते हैं, बहार गाते हैं, हिंडोल बहार, शहाना बहार, गांधारी बहार गाते हैं।

Author January 21, 2018 5:14 AM
Basant Panchami 2018, Kite Flying Festival: वसंत पंचमी पर पतंगबाजी।

मौसम में बसंत की आहट सुनाई देने लगी है। हवाओं में खुनकी, फिजा में रंग बिखरने लगे हैं। बसंत के प्रभाव में कवियों-कलाकारों, संगीतकारों-गुणवंतों का रसिक मन गुनगुना उठता है, थिरकने लगता है। यही वजह है कि संगीत में बसंत के नाम से रागों का सृजन हुआ। बैजू बावरा इसके आदि गायक माने जाते हैं। प्राचीन काल से लेकर आज तक कवि बसंत पर कविताएं रचते आ रहे हैं। बसंत के साथ संगीत, काव्य और दूसरी कलाओं के क्या संबंध रहे हैं, इसकी परंपरा और मिजाज का लालित्यपूर्ण विवेचन कर रहे हैं रघुवीर सिंह।

‘बसंत ऋतु आई, फूले सकल वन बागन में, फूलवा भंवरू गूंजे, गावन लागी नर-नारी धमार।’ यानी यह धमार का समय है, बसंत का समय है। प्रकृति नवयौवना बन अंगड़ाई ले रही है। कहीं फूल खिल उठे हैं, तो कहीं पीली सरसों नई दुल्हन की तरह प्रकृति का शृंगार कर रही है। नर्तकों का मन-मयूर नाच उठा है और गायक बसंत के राग गाने लगे हैं, राग बहार गाने लगे हैं। कवियों की रचना-भूमि तैयार हो गई है और उनकी कविता फूटने लगी है। चारों तरफ फूलों की महक है और भौंरों की गुनगुनाहट। ऐसी बसंती फिजा में तभी एक अनसुनी धुन सुनाई देती है- संगीत सम्राट बैजू बावरा के धमार की। धमार गायकी नायक बैजू के स्वर-ज्ञान के सागर से ही निकली और ब्रज के होरी गायन की यह नवीन पद्धति फागुनी रंग में मस्ती भरने लगी। बैजू के संगीत-ज्ञान की अग्नि में तप कर ही गुर्जरी तोड़ी और मंगल गूर्जरी जैसे नए राग निकले, तो धमार ताल मृदंग पर गूंजने लगा। बैजू ने ब्रज के होरी लोकगीत को प्राचीन चरचरी प्रबंध गान के सांचे में ढाला और होरी गायन की संगत में बजने वाली चाचर (चरचरी) ताल दीपचंदी बन गई। होरी की बंदिश पूर्ववर्ती रही और गायन शैली भी लोक संगीत की बुनियाद पर- पहले विलंबित और फिर द्रुत लय में कहरवा के साथ सम से सम मिलाते हुए चरम पर पहुंच कर विश्रांति। बैजू ने ‘कुंजन ने रचयो रास’ जैसे ध्रुपद रचे, जिनसे आज भी ध्रुपद गायक अपने गायन को सजाते हैं, तो छोटे-छोटे धमार की रचना भी की, जिसकी गायन शैली का आधार ध्रुपद अंग ही रखा। रचना केवल फाग पर आधारित और रस शृंगार, वह भी सिर्फ संयोग। वियोग को उसमें बहुत कम जगह दी गई। ध्रुपद की तरह आलाप, फिर बंदिश और उसके बाद डेढ़ गुन, सवा गुन, पौने दो गुन जैसी विभिन्न लयकारियों में पखावजी के साथ लय-बांट की लड़ंत और सम की लुकाछिपी का खेल।

वैसे शास्त्रीय संगीत में बसंत तो पौष मास से ही शुरू हो जाता है, जब भारतीय गायक माघ, फाल्गुन तक तीन महीने बसंत गाते हैं, बहार गाते हैं, हिंडोल बहार, शहाना बहार, गांधारी बहार गाते हैं। जो भी गाते हैं, बहार और बसंत को लेकर। भैरव थाट के राग बसंत के पूर्वांग में भैरव और उत्तरांग में भैरवी के स्वर लगते हैं, यानी भैरव और भैरवी के बीच रागों का पूरा एक ‘इंद्रधनुष’ चलता है। चाल में भी परज और ललित जैसे रागों से मिलता-जुलता यह राग आरोह-अवरोह की वक्र सीढ़ियां बनाता है, जिससे जाहिर है कि यह राग बेहद जटिल है। कलाकार मंच पर भले इस राग को कभी-कभार ही सुनाते हों, मगर सुनाते जरूर हैं। गिरिजा देवी बसंत में ही यह खयाल गाती थीं- ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री’। उस्ताद अली अकबर खान की सरोद से भी निकल कर बसंत फागुनी मस्ती में खो जाता था। पं. जसराज तो आज भी बसंत के दिनों में बसंत गाकर फिजा में बसंती रंग घोल देते हैं। राग बहार में ‘सघन घन बेली फूल रही’ गाने वाले खयाल गायक भी आपको आसानी से मिल जाएंगे। ऐतिहासिक पुस्तकें बताती हैं कि बैजू बावरा जब राग बहार गाते थे, तो फूल खिल उठते थे और मेघ, मेघ मल्हार या गौड़ मल्हार से आसमान में बादल छा जाते और बारिश होने लगती थी।

मध्यकाल के कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज और ग्वालियर के जयविलास महल के साक्ष्य बताते हैं कि बैजू बावरा का जन्म सन 1542 में शरद पूर्णिमा की रात को हुआ था। कुछ विद्वान उनके मध्यप्रदेश के चंदेरी में जन्मे होने की बात कहते हैं, लेकिन साक्ष्य बोलते हैं कि चंदेरी उनकी क्रीड़ा-कर्मस्थली रही। वृंदावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यासों ‘मृगनयनी’ और ‘दुर्गावती’ में भी इसी बात का उल्लेख मिलता है। दस्तावेजों में उनका नाम कहीं बैजनाथ प्रसाद तो कहीं बैजनाथ मिश्र मिलता है, लेकिन उनके बचपन का नाम बैजू ही बताया जाता है। कहते हैं कि युवावस्था में ही उनके मन की तरंगों के तार नगर की कलावती नामक नर्तकी से जुड़ गए, लेकिन कलावती और बैजू का प्रेम जितना निश्छल और सुखद था, उसका अंत उतनी ही दुखद घटना से हुआ। कहा जाता है कि बैजू को अपने पिता के साथ तीर्थों के दर्शन के लिए चंदेरी से बाहर जाना पड़ा और उनका कलावती से विछोह हो गया। दोनों बाद में भी कभी नहीं मिल पाए। इस घटना ने नायक बैजू को ‘बावरा’ बना दिया। वृंदावन के स्वामी हरिदास ने उन्हें संगीत की सरगम सिखा दी और बावरे बैजू प्रेम को संगीत का आठवां स्वर मानने लगे। उनके इसी आठवें स्वर ने ‘तार सप्तक’ में पहुंच कर ‘सुर के संग्राम’ में अपने ही गुरु भाई संगीत सम्राट तानसेन को पराजित किया।

उन दिनों संगीत और कला प्रेमी बादशाह अकबर के दरबार में छत्तीस संगीतकार और साहित्यकार थे, जिनमें तानसेन नवरत्नों में शुमार थे। अकबर ने अपने दरबार में एक संगीत प्रतियोगिता का आयोजन रखा, जिसकी शर्त यह थी कि तानसेन से जो भी मुकाबला कर जीतेगा, वह दरबारी संगीतकार बनेगा, जबकि हारे हुए प्रतियोगी को मृत्युदंड दिया जाएगा। इस शर्त के कारण कोई भी संगीतज्ञ सामने नहीं आया, मगर बैजू बावरा ने यह चुनौती स्वीकार की। तानसेन से उनका यह ‘स्वर संग्राम’ आगरा के वन में हुआ, जहां तानसेन ने राग तोड़ी के स्वर छेड़े और बैजू ने राग मृगरंजनी तोड़ी के। कहा तो यहां तक जाता है कि संगीत की धुनों और रागों से आग निकली और पानी बरसा। इतिहासकार अबुल फजल और फकीरुल्लाह के अनुसार प्रतियोगिता में बैजू ने तानसेन को हरा दिया और फिर तानसेन को माफ कर ग्वालियर चले गए।

1952 में बनी फिल्म ‘बैजू बावरा’ में कलावती से बैजू के प्रेम को तो रुपहले पर्दे पर उकेरा गया, लेकिन ध्रुपद नायकों बैजू बावरा और तानसेन की संगीत प्रतिस्पर्धा खयाल गायन में दिखाई गई। वैसे संगीतकार नौशाद ने बहुत शोध के बाद तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खान और बैजू बावरा के लिए पं. दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर का चुनाव किया था, लेकिन चूंकि दोनों खयाल गायक थे, लिहाजा तानसेन और बैजू बावरा की संगीत प्रतिस्पर्धा भी खयाल अंग में ही फिल्माई गई। देसी में द्रुत खयाल ‘आज गावत मन मेरो झूम के’ में तानों की लड़ंत-भिड़ंत संगीत प्रेमियों के दिलों में आज भी रची-बसी है, जिसमें बैजू बावरा की विजय दिखाई गई, लेकिन सुर के शास्त्रियों को तानसेन और बैजू बावरा से खयाल गवाना बिल्कुल नहीं सुहाता। ध्रुपद गायक उमाकांत और रमाकांत गुंदेचा से जब एक बार पूछा तो उन्होंने कहा, ‘हमें ताज्जुब होता है कि ध्रुपद के नायक बैजू बावरा और तानसेन से फिल्मों और नाटकों में खयाल गवाया जाता है, जोकि सरासर गलत है। खयाल में शृंगारिक भाव आता है और ध्रुपद में आध्यात्मिक भाव।’ हालांकि 706 वर्ष पुराने डागर घराने की बीसवीं पीढ़ी की शबाना डागर कहती हैं, ‘विशुद्ध ध्रुपद आम आदमी के जहन से बाहर है। ऐसे में संभव है कि फिल्म में शास्त्रीय संगीत को प्रमोट किया गया, न कि ध्रुपद को, ताकि लोग शास्त्रीय संगीत को जान सकें, लेकिन यह बताना चाहिए था कि बैजू बावरा और तानसेन की पृष्ठभूमि क्या है।’

खैर, बैजू ग्वालियर के राजा मान सिंह के दरबारी संगीतज्ञ भी रहे, जहां उन्होंने मान सिंह की रानी मृगनयनी को संगीत में प्रवीण किया। जीवन संध्या में बैजू चंदेरी वापस आ गए। मालवा और बुंदेलखंड की सीमा पर बसे ग्वालियर रियासत के छोटे-से शहर चंदेरी में सन 1613 में खास वाग्देवी की आराधना के दिन यानी बसंत पंचमी पर इकहत्तर वर्ष की आयु में इस अलबेले गायक के स्वर सदा के लिए शांत हो गए। नौखंडा महल के पास उनकी समाधि बनाई गई, जहां अब स्मारक बन चुका है और वहां आने वाले हर शख्स को एक अनसुनी धुन सुनाई पड़ती है। वेत्रवती और उर्वशी युगल सरिताओं के मध्य विंध्याचल पर्वत की गगनचुंबी श्रेणियों के बीच बसे चंदेरी नगर की हवा में आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत के स्वर बहते हैं। मध्यप्रदेश का छोटा-सा शहर चंदेरी महाभारत काल से आज तक किसी न किसी कारण विख्यात रहा है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण और शिशुपाल, तो मध्यकाल में मुगल बादशाह बाबर, बुंदेला सम्राट मेदिनी राय, मणिमाला और संगीत सूर्य बैजू बावरा के कारण यह इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए है। इतिहास के इन्हीं सुरीले पृष्ठों पर संगीत दीवाने आज भी बसंत पंचमी, ध्रुपद, बैजू और चंदेरी का अद्भुत समन्वय गुनते हैं। चंदेरी में बैजू बावरा समारोह और पुरस्कार शुरू होने से ध्रुपद कलाकार उत्साहित हैं, लेकिन इस बात से मायूस भी कि बैजू बावरा या उनके इतिहास के बारे में बहुत प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। इन कलाकारों का कहना है कि चंदेरी में बैजू बावरा ध्रुपद या शोध केंद्र की स्थापना हो, ताकि उनके इतिहास और संगीत में योगदान पर शोध हो सके।

आज बसंत की रात, गमन की बात न करना
बसंत और फाग भारतीय कवियों की रचना-भूमि रहे हैं। मध्यकाल के मलिक मुहम्मद जायसी से लेकर छायावाद के सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और नजीर अकबराबादी, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर हमारे समय के गोपाल दास ‘नीरज’ तक सबने बसंत पर अपनी कलम चलाई है। प्रेम के महाकाव्य ‘पद्मावत’ में जायसी कहते हैं- ‘पदमावति सब सखी हंकारी, जावत सिंघलदीप कै बारी/ आजु बसंत नवल ऋतुराजा, पंचमि होइ जगत सब साजा।’ निराला जब कहते हैं- ‘सखि, बसंत आया/ भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया…’, तो उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा को उनकी यह रचना इतनी भाती है कि वे इसे राग बसंत के सुरों में पिरोकर गाने लगते हैं। रघुवीर सहाय बसंत ही नहीं, पूरे माघ मास को अपनी रचना में समेट लेते हैं, ‘पतझर के बिखरे पत्तों पर चल आया मधुमास/ बहुत दूर से आया साजन दौड़ा-दौड़ा…’। और फिर आगे की बात नीरज पूरी करते हैं, ‘धूप बिछाए फूल-बिछौना, बगिया पहने चांदी-सोना, कलियां फेंकें जादू-टोना, महक उठे सब पात, हवन की बात न करना!’ दूसरी तरफ नजीर अपनी ही मस्ती में डूबे हैं, ‘महबूब दिलबरों से निगह की लड़ंत हो, इशरत हो सुख हो ऐश हो और जी निश्चिंत हो, जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो।’ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी बसंत की ऐसी रंगत में भी बच्चों के शिक्षक बने हुए हैं, ‘गुन-गुन-गुन भौंरे गूंज रहे, सुमनों-सुमनों पर घूम रहे, अपने मधु गुंजन से कहते, छाया बसंत का राज री, मां! यह बसंत ऋतुराज री’। लेकिन सुभद्रा कुमारी चौहान बसंत को वीरों की निगाह से देखती हैं और बसंत में भी वीर रस भर देती हैं- ‘भर रही कोकिला इधर तान, मारू बाजे पर उधर तान, है रंग और रण का विधान; मिलने को आए आदि अंत, वीरों का कैसा हो बसंत’।

ओ बसंती पवन पागल…

सौ वर्ष से ऊपर के हिंदी सिनेमा में भी बसंती फुहारों ने सिने प्रेमियों को खूब लुभाया है। बसंत की बंदिश को राग बसंत में संगीतबद्ध करने का संभवत: सबसे पहला प्रयोग संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने 1956 में किया। फिल्म थी ‘बसंत बहार’ और गीत था ‘केतकी गुलाब जूही चंपक वन फूले’, लेकिन शैलेंद्र की इस रचना को गाने के लिए मैदान में पं. भीमसेन जोशी को उतरना पड़ा, जिनका साथ मन्ना डे ने दिया। शास्त्रीय संगीत में तो फिर भी राग बसंत को गाने-बजाने का चलन है, लेकिन फिल्मी संगीत में इसको इससे पहले शायद ही किसी संगीतकार ने छुआ हो।  इस बेमिसाल जोड़ी ने 1960 में राग बसंत में फिर एक मनमोहक धुन बनाई- ‘ओ बसंती पवन पागल, ना जा रे ना जा, रोको कोई’। राज कपूर की फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के लिए शैलेंद्र के लिखे और लता मंगेशकर के गाए इस गीत ने धूम मचा दी। वैसे भी इस कठिन राग ने हिंदी सिनेमा को कुछ बेहद मीठे गाने दिए हैं। मसलन, 1965 में आई ‘राजा और रंक’ फिल्म का गीत ‘संग बसंती अंग बसंती रंग बसंती छा गया, मस्ताना मौसम आ गया’। इस बार इसको अल्फाज दिए आनंद बख्शी ने, जिन्हें बसंत के सुरों में पिरोया लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने और आवाज दी लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी ने। फिल्मी संगीत में कुछ अन्य गीत भी मिलते हैं, जो बसंत को ही आधार बना कर संगीतबद्ध किए गए।

दिलचस्प बात यह है कि जटिल होने के बाद भी इस राग में संगीतबद्ध किए गए सारे ही गीत बेहद लोकप्रिय हुए। मसलन, ‘बसंत है आया, बसंत है आया रंगीला’, जिसकी धुन 1961 में बनी फिल्म ‘स्त्री’ के लिए तैयार की सी. रामचंद्र ने, शब्द थे भरत व्यास के और स्वर दिया आशा भोंसले और मन्ना डे ने। इसी तरह फिल्म ‘अंगुलिमाल’ में अनिल बिश्वास की बनाई धुन ‘आई आई बसंती बेला’ ने भी खूब धूम मचाई। भरत व्यास की ही बंदिश को इस बार मन्ना डे के साथ लता मंगेशकर और मीना कपूर ने गाया। राग बसंत में निबद्ध चर्चित गीतों की शृंखला छोटी नहीं है। 1962 में आई फिल्म ‘फिर वही दिल लाया हूं’ का गाना ‘देखो बिजली डोले’ भी खासा लोकप्रिय हुआ, जिसकी धुन बनाई थी ओपी नैयर ने। इसी शृंखला में ‘वादा कर ले साजना’ गीत भी है, जिसको 1974 में बनी फिल्म ‘हाथ की सफाई’ के लिए राग बसंत के सांचे में ढाला था कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी ने।

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