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कला- एक तबला साधक

अजराड़ा घराने के उस्ताद हसमत खां का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर के तबला वादकों में लिया जाता है। उन्हें संगीत नाटक अकादेमी सम्मान और ‘सम’ संस्था की ओर से तबला शिरोमणि की उपाधि भी मिल चुकी है।

Author Published on: March 19, 2017 5:28 AM
उस्ताद हसमत खां।

विजयशंकर मिश्र
अजराड़ा घराने के उस्ताद हसमत खां का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर के तबला वादकों में लिया जाता है। उन्हें संगीत नाटक अकादेमी सम्मान और ‘सम’ संस्था की ओर से तबला शिरोमणि की उपाधि भी मिल चुकी है। वे ऐसे विरले तबला वादकों में से है,जिन्हें भारत सरकार ने चार बार दूसरे देशों में संगीत प्रशिक्षण के लिए भेजा है। उनके घर में तबला वादन की कला कई पीढ़ियों से चली आ रही है। उनके दादा के दादा उस्ताद मुन्ने खां अपने समय के ख्यातिनाम कलाकार थे। उन्होंने बताया, ‘मुझे तालीम मेरे दादा ने दी। वे महाराज बड़ौदा के राजकीय कलाकार थे। मेरी परवरिश भी मेरे दादा ने की।’ शुरुआत में मुन्ने खां ने ही उन्हें तबला वादन में हाथ आजमाने को कहा। एकै साधे सब सधे सब साधे सब जाए, को उन्होंने अपना गुरुमंत्र बनाया। मुन्ने खां ने उस्ताद हसमत को कड़ा अभ्यास कराया। इस तरह से छोटी उम्र में ही चार-पांच घंटे रोज का रियाल वे करने लगे थे।  बातचीत में हसमत खां ने बताया, ‘हम लोगों का बचपन राजा बड़ौदा और राजा ग्वालियर के संरक्षण में बीता वहां खाने-पीने की कोई फिक्र नहीं होती थी। बस, जब महफिल सजती थी तो अपनी अपनी कला का जौहर दिखाना होता था। संगीतकारों की कला उस जमाने में राज्य की प्रतिष्ठा मानी जाती थी। उस जमाने में जब कोई राजा या नवाब दूसरे राजा या नवाब के यहां जाता था तो अपने साथ अपने संगीतकारों को भी ले जाता था। फिर दोनों ओर के संगीतकार अपनी-अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। अंदर से होड़ की भावना जरूर होती थी, लेकिन व्यवहार में एक दूसरे के प्रति प्रेम और आदर का भाव ही होता था। युवा कलाकार जब प्रदर्शन करने बैठते थे तो बुजुर्ग कलाकारों से आज्ञा मांगते थे और वे उन्हें आशीर्वाद देते थे।’

लेकिन, राजाओं- नवाबों के यहां सबको तो नौकरी मिलती नहीं थी। इसलिए कुछ पंडित संगीतकारों ने मंदिरों में रहकर संगीत की रक्षा की और उसका प्रचार-प्रसार किया। संगीत को बचाए रखने में जिस वर्ग ने सर्वाधिक योगदान दिया, उसे तो इसका श्रेय मिला ही नहीं। हसमत खां बताते हैं कि उनका संगीत अगर आज जिंदा है तो इसे जिंदा रखने में तवायफों की कुर्बानी को भला कैसे अनदेखा किया जा सकता है। जमाने भर की लानतें सहकर, उपेक्षा, तिरस्कार और अपमान के कडुÞवे घूंट पीकर उन लोगों ने संगीत को बचाया है। उनके काम को सिर्फ देह व्यापार से जोड़कर देखना अपनी कमजोर आंखों का परिचय देना है। विद्याधरी देवी, जद्दन बाई, गौहर जान, सिद्धेश्वरी देवी, बेगम अख्तर, बड़ी मोती, छोटी मोती और रसूलन बाई आदि अनेक ऐसे नाम इस कड़ी में लिए जा सकते हैं, जिनको सुन -सुन कर बड़े बड़े पंडितों, उस्तादों ने अपनी कला को निखारा है। इन्हीं तवायफों की संगत कर-करके कितने ही तबला, सारंगी और हारमोनियम वादकों के घर में दोनों समय चूल्हे जलते थे। बिस्मिल्लाह खां और पंडित भीमसेन जोशी जैसे दो महान कलाकारों ने भी इस तथ्य को स्वीकारा है कि इस वर्ग की कलानेत्रियों- संगीत पुजारिनों से उन्हें काफी प्रेरणा मिली है।

उस्ताद हसमत अली खां ने पढ़ाई सिर्फ हाईस्कूल तक की। उन्होंने बताया कि जब यह पूरी तरह तय हो गया कि तबला ही बजाना है, तब यह जानना बहुत जरूरी भी नहीं लगा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर सूरज की परिक्रमा करती है या सूरज, पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमता है।’ लेकिन, खां साहब ने समय और समाज से बहुत कुछ सीखा है। वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी, पंजाबी, हरियाणवी, भोजपुरी, कश्मीरी, रसियन और स्पेनिश भाषाएं धड़ल्ले से बोल और समझ लेते हैं। कहते हैं, ‘जहां-जहां नौकरी की, वहां-वहां की जुबान सीख ली। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। किसी भी उम्र में सीखना शुरू किया जा सकता है- मैं आज भी सीख रहा हूं।’हसमत अली खां ने लंबे समय तक आकाशवाणी में कलाकार के रूप में भी काम किया है। आकाशवाणी के अनुभवों के विषय में उन्होंने बताया, ‘मुझे तो आकाशवाणी की नौकरी बहुत ही रास आई। आकाशवाणी की नौकरी के दौरान मुझे उच्चकोटि के अनेक संगीतकारों के साथ तबला संगत करने का मौका मिला, जिससे मेरी कला में इजाफा हुआ। काम भी कोई मेहनत का नहीं था। दिन भर में एक दो कलाकारों के साथ घंटे आधा घंटे बजाना पड़ता था बस। तबला बजाना मुझे पसंद है और यही काम वहां करना पड़ता था।’ जीवन के अस्सीवें बसंत में प्रवेश कर चुके उस्ताद हसमत की सक्रियता कई युवाओं के लिए आज भी प्रेरणास्रोत है। वे आज भी हर सप्ताह देश-विदेश के किसी न किसी मंच पर दिख ही जाते हैं। स्पष्टवक्ता और सकारात्मक सोच के धनी खां साहब के शिष्यों की लंबी फेहरिस्त है। १

 

 

 

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