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दस्तावेज-आचार्य द्विवेदी की धरोहर

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को हिंदी साहित्य में जिस पुस्तक ने प्रतिष्ठित किया था उसका नाम है ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’।
Author January 14, 2018 06:05 am
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।

अनिल राय

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को हिंदी साहित्य में जिस पुस्तक ने प्रतिष्ठित किया था उसका नाम है ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’। यह पुस्तक आचार्य द्विवेदी ने विश्वभारती के अहिंदीभाषी साहित्यिकों को हिंदी साहित्य का परिचय कराने के बहाने लिखी थी। वास्तव में यह पुस्तक हिंदी साहित्य का वैसा इतिहास नहीं प्रस्तुत करती, जैसा कि शुक्लजी का इतिहास। इस पुस्तक में भी न लेखक का ऐसा दावा है, न उसके प्रकाशक का। इसके पहले संस्करण के प्रकाशक नाथूराम प्रेमी ने भी लिखा था- ‘यह पुस्तक हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं है और न यह ऐसे किसी इतिहास का स्थान ही ले सकती है। यह तो एक तरह से उसकी भूमिका को स्पष्ट करने वाली भूमिका है। आधुनिक इतिहासों को यह अधिक स्पष्ट करती है और भविष्य में लिखे जाने वाले इतिहासों की मार्गदर्शिका है।’ अपनी सारी सीमाओं के बावजूद इस पुस्तक ने जो स्थान बनाया, वह आज भी बरकरार है- मध्यकालीन हिंदी साहित्य की एक मुकम्मल जानकारी इस किताब के बिना अधूरी ही रह जाती है। इस किताब की ही पूरक ‘हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास’ है।

आचार्य द्विवेदी की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ का पहला संस्करण सन 1940 में आया था। तबसे लेकर अब तक उसके अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यही नहीं, आचार्य द्विवेदी की ग्रंथावली के भी कई संस्करण आ चुके हैं। ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ के संदर्भ में ध्यान देने वाली महत्त्वपूर्ण बात यह है कि द्विवेदी जी ने इस पुस्तक के प्रथम संस्करण के आने के बाद ही उसमें कुछ संशोधन करना चाहा था और कर भी दिया था। जिस प्रति का उन्होंने संशोधन किया था वह पहला संस्करण यानी 1940 का ही था। इस संशोधित प्रति पर उन्होंने ‘संशोध्यमान प्रति’ लिख कर अपना नाम लिखा था (हस्ताक्षर के रूप में)। इस समय आचार्य द्विवेदी विश्वभारती, शांतिनिकेतन के संस्कृत-हिंदी साहित्य के अध्यापक थे। विचित्र बात यह कि जिस प्रति को उन्होंने संशोधित किया था, वह पता नहीं कैसे चीन पहुंच गई और आज तक ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ के अनेक संस्करण यों ही निकलते रहे।
शुक्र है, इस संशोधित पहले संस्करण की प्रति मेरे हाथ लग गई, जब मैं पेकिंग विश्वविद्यालय, बेजिंग के दक्षिण एशिया विभाग की लाइब्रेरी में कुछ किताबें देख रहा था। इस पूरी किताब की फोटोकॉपी मेरे पास सुरक्षित है।

आचार्य द्विवेदी की इस पुस्तक की अजीब अबूझ कहानी है। इस प्रति को उन्होंने संशोधित कर जहां ‘संशोध्यमान प्रति’ लिखा था, उसे काट दिया गया है और पंडित जी के नाम को काट कर उसके स्थान पर अंग्रेजी में लिख दिया गया है- कृष्ण किंकर सिन्हा, चीना भवन, पो०- शांतिनिकेतन (इंडिया)। बात यह है कि सन 1928 में चीनी विद्वान प्रो. थान युन शान गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के आमंत्रण पर विश्वभारती आए। 1937 में प्रो. थान के सहयोग से शांतिनिकेतन में ‘चीना भवन’ की स्थापना हुई। प्रो. थान युन यहां चीनी भाषा पढ़ाते थे और भारतीय संस्कृति के भी वे अच्छे विद्वान थे। वे 1967 तक शांतिनिकेतन में रहे। उनका परिवार आजीवन भारत में रहा। प्रोफेसर थान युन शान का निधन 1983 में बोध गया में हुआ।

कृष्ण किंकर सिन्हा 1942 में विश्वभारती में प्रोफेसर थान युन शान के शिष्य थे। उन्होंने प्रोफेसर थान से चीनी भाषा सीखी थी। प्रोफेसर थान युन शान आचार्य द्विवेदी के भी मित्र थे।
थान युन शान की सिफारिश पर कृष्ण किंकर सिन्हा को चीन की सरकार ने खुमिंग विश्वविद्यालय के ओरिएंटल कॉलेज में हिंदी भाषा और प्राच्य विद्या पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया था। बाद में ओरिएंटल कॉलेज को पेकिंग विश्वविद्यालय में समाविष्ट कर दिया गया। आचार्य द्विवेदी की पुस्तक किसी तरह कृष्ण किंकर जी के हाथ लग गई। हो सकता है पंडित जी ने यह पुस्तक उन्हें पढ़ने के लिए दी हो। यह भी हो सकता है कि पंडित जी ने यह पुस्तक थान युन शान को दी हो और उन्होंने उसे कृष्ण किंकर जी को दे दिया हो। अब न तो आचार्य द्विवेदी हैं, न थान युन शान और न कृष्ण किंकर सिन्हा, जो बता सकें कि पुस्तक चीन कैसे पहुंची! पर इतना तो अंदाज लगाया जा सकता है कि जब पुस्तक पर द्विवेदी जी का नाम वगैरह काट कर ‘कृष्ण किंकर सिन्हा’ लिख दिया गया है, तो पुस्तक सिन्हा जी ही अपने साथ चीन ले गए होंगे। यह भी हो सकता है कि लाइब्रेरी में उन्होंने पुस्तक दे दी हो। चीन के लोगों को क्या मालूम कि यह किताब संशोधित की गई है और यह प्रति उसके लेखक की निजी प्रति है, जो किसी कारण से कृष्ण किंकर जी के पास आ गई। एक संभावना यह भी हो सकती है कि आचार्य द्विवेदी किताब कृष्ण किंकर जी को देकर भूल गए हों और पुस्तक एक बार चीन पहुंची तो फिर लौट कर नहीं आई। बहरहाल, इस समय यह पुस्तक चीन में हमारी धरोहर है और पेकिंग विश्वविद्यालय, बेजिंग के दक्षिण एशिया अध्ययन विभाग की लाइब्रेरी में सुरक्षित है। ०

 

 

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