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मुद्दा- दुनिया में पहली बार नदी बनी जीवित व्यक्ति

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा, यमुना और उनकी सभी सहायक नदियों को जीवित व्यक्ति’ या ‘कानूनी व्यक्ति’ का अधिकार देकर एक अच्छी शुरुआत की है। इ

Author April 9, 2017 5:11 AM
गंगा किनारे स्थित वाराणसी के घाट। (Source: PTI)

मनोज त्यागी

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा, यमुना और उनकी सभी सहायक नदियों को जीवित व्यक्ति’ या ‘कानूनी व्यक्ति’ का अधिकार देकर एक अच्छी शुरुआत की है। इस निर्णय से पांच दिन एक हफ्ते पहले न्यूजीलैंड की सरकार ने भी संसद में एक प्रस्ताव के जरिए वहां की प्रसिद्ध नदी गांगनुई को कानूनी मानव का ओहदा प्रदान किया था। दुनिया में यह पहला दृष्टांत बना, जब किसी नदी को जीवित कानूनी व्यक्ति माना गया। जड़ चीजों को जीवित वस्तु मानने की परंपरा पुरानी है। अमेरिका में तो कारपोरेशनों को एक व्यक्ति के कानूनी अधिकार बहुत पहले से मिले हुए हैं। चार वर्ष पहले उरुग्वे ने बाकायदा संविधान संशोधन करके अपने जल पर सभी जीवों का बराबर का हक और इसके व्यवसाय को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। तमाम सरकारी प्रयासों तथा जनता के हो हल्ले के बावजूद गंगा, यमुना और दूसरी सदानीरा नदियों की स्थिति को सुधारा नही जा सका।  अधिकांश नदियां तो गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं और उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न-चिह्न लग गया है। प्राकृतिक रूप से अविरल बहने वाली नदियों को बचाने के लिए उन पर बन रहे बांधों पर भी दुनिया भर में सवाल उठे। अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों में तो कुछ बांधों को तोड़ा भी गया। भारत में तो नदियों को बांधने के खिलाफ बड़े जनान्दोलन चले। नदियों में फैल रहे विषाक्त प्रदूषण को रोकने के लिए न जाने कितने सरकारी आदेश और न्यायपालिका के आदेश रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए। शहरों के गंदे जल के उपचार पर अरबों-खरबों रुपए खर्च हो जाने के बावजूद यह जल अब और भी गंदा होकर नदियों को लील रहा है।
अब इन नदियों के खिलाफ कोई भी काम करना, इन्हें प्रदूषित करना, इन्हें बांधना, रोकना, मोड़ना, अपराध माना जाएगा और दोषी को वही सजा मिलेगी जो किसी व्यक्ति को कोई अपराध करने पर मिलती है। नदियों को ‘जीवित व्यक्ति’ की श्रेणी में रखने का क्या तात्पर्य है और इसके राजनीतिक, सांस्कृतिक परिणाम क्या होंगे, यह विचारणीय है। कानूनी रूप से एक नागरिक को संविधान ने बुनियादी अधिकारों के साथ-साथ राजनीतिक आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार दे रखे है। इन अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। इनका हनन करने वाले को सजा मिलती है। अगर नदियां भी जीवित व्यक्ति हैं और उनके भी वही अधिकार हैं तो उनको गंदा करने, विषैला करने, बांधने वाले को भी सजा मिलेगी।

नदियों में जीवन है, वे जड़ नहीं है, इस बात को तो भारतीय दर्शन हजारों वर्षों से कहता आया है। ये नदियां हिंदुओं की आस्था स्थली रही हैं। हिंदुओं का कोई भी क्रिया-कर्म नदियों के बिना पूरा नहीं होता। तीज-त्योहार, मेले, उत्सव नदियों के ही किनारे होते है। गंगा को तो मोक्षदायिनी माना गया है। केवल वस्तु स्थिति पर विचार करें तो आज गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक गंगा के किनारे बसे शहरों-कस्बों और गांवो में रहने वाले करोड़ों लोग अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह गंगा पर निर्भर हैं। ऐसी ही स्थिति अन्य नदियों की भी है। मनुष्यों के अलावा अन्य जीव-जंतु और पेड़ पौधों की संख्या जो नदियों के सहारे जीवन पाते है, उनकी संख्या तो गिनी ही नहीं जा सकती। नदियां जड़ नहीं हैं जीवित हैं, इसीलिए वे अनंत जीवनदायिनी हैं। न्यायालय ने नदियों को जीवित मानकर उचित ही किया है और एक बहुत जरूरी तथा दीर्घकाल से लटके मसले को हल करने की कोशिश की है। सवाल यह है कि यह फैसला ठीक से लागू हो पाएगा या तमाम दूसरे जनसरोकारों वाले फैसलों की जो गति हुई है, वही होगी। फैसले को लागू करने का काम कार्यपालिका का है, जिसका आज जो चरित्र बना हुआ है, वह बहुत विश्वास नहीं जगाता। कार्यपालिका गंगा यमुना के जीवित व्यक्ति होने के फैसले को कहां तक ले जाएगी, यह देखना बाकी है।
दश में नदियों को बचाने के लिए जूझ रहे बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों की अच्छी खासी तादाद है। सभी प्रदेशों में नदियां है और उन पर संकट मौजूद है। अच्छी बात यह है कि वर्तमान केंद्र सरकार का रुख भी इस संबंध में सकारात्मक हैं। वह स्वयं भी नदियों को बचाने का प्रयास कर रही है। गंगा को लेकर तो वह विशेष रूप से जागरूक दिख रही है। हो सकता है कि वह संविधान में संशोधन करके नदियों को जीवित व्यक्ति की मान्यता देने का काम भी करे। अगर ऐसा हो सका तो नदियों के अस्तित्व को संजीवनी मिलेगी। भारतीय संस्कृति की रक्षा का यह सबसे बड़ा उपक्रम होगा। नदियों का मरना भारतीय सभ्यता और संस्कृति का मरना है, उन्हें जीवित रखना हमारी सभ्यता और संस्कृति के लिए जरूरी है। ०

 

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