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आधी दुनिया: यौन हिंसा की हदें

पिछले दिनों जब किशोर अपराध कानूनों में बदलाव की मांग की जा रही थी तो इस बात पर काफी बहस हो रही थी कि इस कानून में बदलाव से सभी बच्चों की मुश्किलें बढ़ेंगी। क्योंकि इसमें बदलाव के बाद बच्चों को बड़ों की तरह अपराध करने पर बड़ों की तरह सजा देने का प्रावधान है।

Author Published on: March 11, 2018 3:04 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

क्षमा शर्मा

गुड़गांव के एक नामी स्कूल में जिस तरह दो अध्यापिकाओं को सातवीं-आठवीं में पढ़ने वाले दो बच्चों ने अश्लील धमकी दी, वह खौफनाक है। इस खबर को जिसने भी पढ़ा पहले वह चकित हुआ, फिर शर्म से भर उठा। इस बात पर भरोसा करना मुश्किल हो उठा कि क्या बच्चे भी ऐसा कर सकते हैं। आन लाइन दी गई इन धमकियों में सातवीं के एक बच्चे ने कहा कि वह स्कूल में पढ़ाने वाली एक अध्यापिका और उसकी वहीं पढ़ने वाली लड़की के साथ दुष्कर्म करेगा। दूसरे आठवीं के बच्चे ने दूसरी अध्यापिका को कैंडल लाइट डिनर का न्योता दिया और उसके बाद शारीरिक संबंध बनाने की बात कही। अपनी अध्यापिकाओं के लिए छोटे बच्चों के मुंह से ऐसी बातें निकलना और वह भी किसी से कहना नहीं, आन लाइन लिखना, जान कर बड़ी मुश्किल होती है। सहज विश्वास नहीं होता कि बच्चे ऐसा कर सकते हैं। अगर इसे बदलाव कहते हैं तो इसे अच्छा कतई नहीं माना जा सकता।

पिछले दिनों जब किशोर अपराध कानूनों में बदलाव की मांग की जा रही थी तो इस बात पर काफी बहस हो रही थी कि इस कानून में बदलाव से सभी बच्चों की मुश्किलें बढ़ेंगी। क्योंकि इसमें बदलाव के बाद बच्चों को बड़ों की तरह अपराध करने पर बड़ों की तरह सजा देने का प्रावधान है। बहुत से पश्चिमी देशों में ऐसे कानून हैं भी कि बच्चे ने अगर बड़ों की तरह अपराध किया है, तो सजा भी उसे बड़ों की तरह ही मिले। तब बच्चों के लिए काम करने वाले बहुत से विशेषज्ञ कह रहे थे कि कुछ बच्चों के किए की सजा सभी को क्यों मिले। लेकिन इस घटना से सोचना पड़ता है कि आखिर क्या किया जाए। अपने बच्चों को इस तरह की मुसीबत से कैसे निकाला जाए। जिस अध्यापिका और उसकी बेटी को दुष्कर्म की धमकी दी गई, उसने इ-मेल करके नौकरी से इस्तीफा दे दिया। अध्यापिका ने लिखा कि वह मानसिक रूप से बहुत परेशान है। वह न किसी पर आरोप लगाना चाहती है और न कोई बदले की कार्रवाई चाहती है। उसने यह भी कहा कि तकनीक के अत्यधिक प्रयोग ने बच्चों को बिगाड़ दिया है, उनके कोमल मन को भ्रष्ट कर दिया है। वे जैसे अच्छे और बुरे का फर्क भूल गए हैं। शायद उन्हें ऐसी बातें कोई सिखाता नहीं है। इसलिए स्कूलों और माता-पिता को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। हमारे बच्चों को सही मार्गदर्शन की जरूरत है, ताकि आगे ऐसी घटनाएं न हों। इस अध्यापिका की सातवीं में पढ़ने वाली बच्ची भी इतनी डरी हुई है कि वह स्कूल नहीं जा पा रही। हालांकि इस अध्यापिका के पति ने पुलिस में सारे प्रमाणों के साथ शिकायत की है। साइबर सेल और हरियाणा महिला आयोग भी इसकी जांच कर रहा है। स्कूल ने अभिभावकों की मीटिंग भी बुलाई थी, जिससे कि समस्या पर चर्चा की जा सके।

अभी तक ऐसी खबरें आती थीं कि स्कूलों में छोटे-छोटे बच्चे एक-दूसरे से प्रेम निवेदन कर रहे हैं। कई बच्चे घर से भाग भी चुके हैं। कई बार पता चलने पर स्कूलों में ऐसे बच्चों की काउंसलिंग की जाती है। लेकिन अध्यापिकाओं के साथ ऐसी घटना दिल दहला देने वाली है। आखिर महिलाएं अगर नौकरी करें तो कैसे करें। वे घर, दफ्तर, स्कूल में खुद को किस तरह सुरक्षित महसूस करें। जिन बच्चों को वे पढ़ाती हैं उनके दिल में ऐसी बातें कैसे बैठ गर्इं। फिर दुष्कर्म की बात छोटे बच्चों के दिमाग में ऐसे किस तरह आ गई कि वे इसे बदला लेने या आनंद का औजार समझने लगे। और यह भी कि किसी महिला और लड़की को इस तरह से डराया-धमकाया जा सकता है। और दूसरा बच्चा, जिसने अध्यापिका से शारीरिक सम्बंध बनाने की बातें कही, उसे इन बातों का खयाल कैसे आया। ये छोटे बच्चे, जिन्होंने दुनिया में अभी आंखें ही खोली हैं, पढ़ने-लिखने और जीवन के सारे सुख साधन मौजूद हैं, वे अपराध की राह क्यों पकड़ने लगे। अरसे से विशेषज्ञ इस ओर इशारा कर रहे हैं कि हमारे बच्चे अपनी उम्र से अधिक बड़े हो गए हैं। वे बड़ी संख्या में फेसबुक उपभोक्ता हैं। अकसर बच्चों के हाथ में महंगे मोबाइल और कम्प्यूटर मौजूद हैं। वे कम्प्यूटर और मोबाइल पर भारी मात्रा में पोर्न साइटस देखते हैं। अफसोस इस बात पर होता है कि टीवी पर आने वाली कई बहसों में बहुत से जाने-माने लोग बच्चों के पोर्न देखने का समर्थन करते पाए जाते हैं। वे इसे बच्चे की आजादी से जोड़ते हैं। आजादी के नाम पर बच्चों के बचपन को छीन कर उन्हें उस तरफ धकेलना कि वे अपराधों को भी अपनी आजादी समझने लगें, कहां तक जायज है। अरसे तक तकनीक को किसी ईश्वर की तरह से पेश किया जाता रहा है, लेकिन तकनीक गलत राह पर भी ले जा सकती है इस पर अकसर कोई बहस नहीं होती। अधिक सूचना भी घातक हो सकती है, और हर सूचना हर एक के लिए नहीं होती, साथ ही बहुत सी सूचनाओं और ज्ञान की एक उम्र भी होती है। अगर बड़ों का ज्ञान बच्चों को कच्ची उम्र में ही मिल जाए तो वे क्या कर सकते हैं, गुड़गांव के स्कूल में हुई घटना इस बात का प्रमाण है। बच्चे पढ़ने के मुकाबले पढ़ाने वाली अध्यापिकाओं को किसी यौन-वस्तु की तरह देख रहे हैं, इस बात पर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया। इस तरह का शायद ही कोई सर्वे या अध्ययन देखने में आया है।

यह बात सच है कि इस दौर में आप बच्चों को तकनीक से दूर नहीं रख सकते, मगर उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान कैसे कराई जाए, वे क्या देखें और क्या उनके देखने लायक नहीं है, उन्हें समझाया जाए, लेकिन समझाया तो तभी जा सकता है जब माता-पिता और अध्यापकों को इसकी खबर हो। जिन परिवारों में माता-पिता दोनों काम करते हैं उनके पास इतना समय भी नहीं कि वे बच्चे की हर गतिविधि पर नजर रख सकें। न ही अध्यापकों को दैनंदिन कामों से इतनी फुरसत है कि वे हर बच्चे से बातचीत कर सकें। वह क्या कर रहा है, किससे मिल रहा है, क्या देख रहा है, इसे जान सकें। अकसर होता तो यह है कि बच्चों की ऐसी किसी भी हरकत पर माता-पिता स्कूल के सिर दोष मढ़ते हैं और स्कूल माता-पिता के ध्यान न देने की शिकायत करते हैं। अध्यापक यह भी कहते हैं कि इन दिनों बच्चों को किसी बात का डर भी नहीं रहा। क्योंकि उन्हें मालूम है कि उन्हें किसी भी बात पर स्कूल में सजा नहीं दी जा सकती। अगर मामूली सजा दी भी जाती है, तो मां-बाप लड़ने लग जाते हैं, स्कूल की शिकायत करने की धमकी देते हैं। फिर जहां मलयालम फिल्म में स्कूल में पढ़ने वाली प्रिया प्रकाश सिर्फ आंख मारने और फ्लाइंग किस करने पर रातों रात सुपरहिट हो जाती है, ऐसे में बच्चे और सीख भी क्या सकते हैं। उनके लिए तो आंख मारना और चुंबन उछालना ही दुनिया की सबसे बड़ी घटना है। क्योंकि मीडिया रात-दिन इस घटना के बधाए गाने लगता है और प्रिया को आज की बदली हुई लड़की और शक्तिशाली स्त्री बताया जाता है। फिर अगर बच्चे अध्यापिकाओं से अश्लील मांग करने लगे तो उनका भी क्या कुसूर। समाज में बच्चे भी रहते हैं और उनके कोमल मन किसी घटना और दृश्य को सच समझ कर वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं, तो असली अपराधी वे लोग हैं जो बच्चों को अपने उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए सहज शिकार बनाते हैं। स्कूल भी इससे अछूते कैसे रह सकते हैं। गुड़गांव की घटना के कारण एक अध्यापिका ने नौकरी छोड़ दी, लेकिन वे अध्यापिकाएं कहां जाएंगी, जिनके पास नौकरी छोड़ने का कोई विकल्प नहीं है। अपनी आर्थिक जरूरत पूरी करने के लिए वे नौकरी नहीं छोड़ पाएंगी। फिर मुश्किल से मिली नौकरी छोड़े भी क्यों। इसके अलावा अब तक तो औरतें बड़े अपराधियों से डरती थीं, अब क्या उन्हें छोटे-छोटे बच्चों से डरना पड़ेगा।

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