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विमर्श- लेखक का अकेलापन

यह अकेलापन ‘राग दरबारी’ में भी दिखता है। इसके अलावा: ‘मैं लिखता हूं क्योंकि मुझे आशा है कि शायद इस तरह मैं समझ सकूंगा कि मैं आप सबसे, हर एक से, बहुत-बहुत ज्यादा नाराज क्यों हूं... मैं लिखता हूं कि मैं चाहता हूं कि सभी लोग, पूरी दुनिया यह जान सके कि यहां इस सदी में हमने कैसा जीवन जिया है और अभी कैसा जीवन जी रहे हैं।

‘राग दरबारी’ के लेखक श्री लाल शुक्ल।(फाइल फोटो)

पंकज चतुर्वेदी

ओरहान पामुक के नोबेल अभिभाषण का श्रीलाल शुक्ल से एक संबंध नजर आता है। पामुक कहते हैं: ‘मैं अकेला होने के लिए लिखता हूं।’ यह अकेलापन ‘राग दरबारी’ में भी दिखता है। इसके अलावा: ‘मैं लिखता हूं क्योंकि मुझे आशा है कि शायद इस तरह मैं समझ सकूंगा कि मैं आप सबसे, हर एक से, बहुत-बहुत ज्यादा नाराज क्यों हूं… मैं लिखता हूं कि मैं चाहता हूं कि सभी लोग, पूरी दुनिया यह जान सके कि यहां इस सदी में हमने कैसा जीवन जिया है और अभी कैसा जीवन जी रहे हैं।… मैं लिखता हूं, क्योंकि मैं कभी खुश नहीं रह सका हूं। मैं खुश होने के लिए लिखता हूं।’

श्रीलाल शुक्ल जब कानपुर के मुख्य नगर अधिकारी थे, वहां के नाट्य-मंडल ने उनसे संपर्क और निवेदन किया कि ‘आपकी कहानी का नाट्य रूपांतरण हम खेलना चाहते हैं। इसके लिए आपकी अनुमति और इसे देखने के लिए आपको आमंत्रित करने आए हैं।’ श्रीलाल जी ने कहा कि ‘मैं आज यहां अधिकारी हूं, मैं चाहता हूं कि मेरी जिस कहानी का आपने नाट्य-रूपांतरण किया है, उस पर नाटक आप जरूर खेलें, लेकिन तीन स्थितियों में खेलें, तो मुझे अच्छा लगेगा। पहली स्थिति यह है कि मेरा यहां से ट्रान्सफर हो जाए। दूसरी कि मैं रिटायर हो जाऊं।’ विनोदप्रियता और आत्मनिर्ममता, दोनों का अद्भुत संश्लेषण उनकी बहुत बड़ी विशेषता थी। फिर जो उन्होंने कहा, ‘तीसरी स्थिति है कि जब मैं मर जाऊं, तब आप यह नाटक खेलें!’ श्रीलाल जी को सत्ता का इस्तेमाल अपने साहित्यिक उन्नयन के लिए करना नापसंद था।

जब हम उनकी रचनाधर्मिता से अपने समय के रिश्ते पर गौर करते हैं, तो हमारे समय में किस तरह साहित्य हाशिए पर चला गया है और उसके क्या कारण हैं, इस मुद्दे पर अपने एक निबंध में वे कहते हैं कि मध्यकाल में ‘लोक-संस्कृति और शास्त्रीयता के बीच इतनी चौड़ी खाई न थी और मध्यकालीन काव्य लोक-जीवन में पूरी तौर से रचा-बसा था।’ आज हम खुद को कवि या लेखक की हैसियत से इंसानी वजूद की समग्र चिंताओं से जोड़े हुए हैं। इसके बावजूद उन्हें महसूस होता था कि ‘इसी मानवीय समाज में ऐसी ताकतें सक्रिय हो गई हैं, जिन्होंने साहित्य और कलाओं और उसी के साथ रचनाकार को केंद्र से खींच कर हाशिए पर ढकेल दिया है और बहुत-से रचनाकार अपने ही परिवेश में विस्थापित जैसा महसूस करने लगे हैं।’

उनकी नजर में इसके कारण हैं: ‘राजनीतिक संस्थाओं की सांस्कृतिक निरक्षरता, उसी के साथ सत्ता में उन्हीं संस्थाओं का प्रचंड वर्चस्व और सारे समाज में विज्ञान और तकनीकी और उनसे पनपे संचार-माध्यमों का आतंक, उनका खुल कर दुरुपयोग, उपभोक्ता-अपसंस्कृति के लिए ललक।’ अपने वैचारिक लेखन में श्रीलाल जी ने एक जगह कहा है कि ‘आज का यथार्थ इतना जटिल और डरावना हो चुका है कि रचनाकार किसी भी किस्म की कल्पना करे, कोई ऐसी भयानक घटना घट जाती है, जो हमारी कल्पना को दुत्कार देती है।’

श्रीलाल जी के लेखन की एक बड़ी खासियत है शक्ति के मठों का प्रत्याख्यान। शक्ति-संरचना के जितने भी रूप हो सकते हैं और जितनी भी किस्में हो सकती हैं, उसके जो भी स्रोत और गढ़ हो सकते हैं; वे उनके खिलाफ थे। इसकी वजह यह है कि प्रतिष्ठान पर निर्भरता के नतीजे में उसका अभ्यस्त हो जाने से लेखक की संवेदना के छीजने और एक कमतर प्रतिभा में उसके अध:पतन का संकट वे बराबर महसूस करते थे। इसलिए इसे एक बड़ी चिंता के तौर पर संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा है कि रचनाकार के सामने ‘सवाल व्यक्तित्व के ह्रास का है। बाहर से कोई दबाव न हो, तब भी प्रतिष्ठान के निरंतर संसर्ग से लेखक का व्यक्तित्व धीरे-धीरे गिरता जाता है।… यहां बात सरकारी नौकरी की ही नहीं, उन सब प्रतिष्ठानों से संबंध की है, जहां व्यक्ति को एक निर्धारित आचरण का, पूवार्नुभव और पूर्व दृष्टांतों पर आधारित किसी खास चिंतन-परंपरा का अनुसरण करना होता है। भाषा, जिसके शब्द अपनी सारी संभावनाएं खो चुके हैं, और गतानुगतिकता के चलते वह धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व में उन तत्त्वों को आत्मसात करेगा ही, जो बुनियादी तौर पर अच्छे सृजनात्मक लेखन के खिलाफ हैं।… व्यापार, सरकारी नौकरी या अर्थार्जन के ऐसे धंधे, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमें राजसत्ता पर आश्रित रखते हैं, सही-गलत के बारे में हमारी कल्पना को धीरे-धीरे पराश्रित बनाने लगते हैं। तब वे स्थितियां जिनसे किसी विस्फोट की संभावना निकल सकती थी, सिर्फ फाइल और कॉफी के प्याले पर होने वाली बहस का हिस्सा बन जाती हैं, कुव्यवस्था से चिपके रहने के कारण उसे व्यवस्था का सहज अंग मानने की आदत पड़ जाती है। और संवेदना, जो सृजन की बुनियादी शर्त है, भोथरी पड़ने लगती है।’ इसलिए श्रीलाल जी लिखते हैं कि सत्ता-प्रतिष्ठानों से जुड़े हुए लेखक अंतर्विरोधों में तालमेल बैठाने का जो रास्ता पकड़ते हैं, उसके किसी मोड़ पर ‘मीडियाक्रिटी के दलदल का खतरा बराबर बना रहता है।’

दूसरी खासियत है कविता से श्रीलाल जी का लगाव। हमारी पूरी परंपरा में कविता और दर्शन का जो अंतरावलंबन रहा है, उसको उन्होंने भारतीय सृजनशीलता की विशिष्ट पहचान माना और उसे अपने दाय के रूप में स्वीकार किया था। मगर बीसवीं सदी के आखिरी दौर में वे हिंदी के रचनात्मक लेखन में अवसाद के अतिरेक और जीवंतता के अभाव से कुछ निराश भी हो चले थे: ‘अधिकांश कविताएं और कथा-साहित्य को पढ़ने पर एक बड़ा ही अवसादपूर्ण परिदृश्य उभरता है। कभी-कभी लगता है कि भले ही लिखने वाले युवा हों, यह बड़ा ही वृद्ध लेखन है। क्या मजाल कि जीवन के उत्सव और उल्लास की वह कोई झलक भी दे सके। अरुंधति राय का ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ अंग्रेजी में ही लिखा जा सकता था, हिंदी में नहीं।’ श्रीलाल जी के यहां व्यंग्यधर्मिता, विद्रोह और विनोदप्रियता का जो संश्लेषण मिलता है, उसकी बुनियाद में उनकी अपनी रचनात्मक अस्मिता है।

पहली नजर में यह लग सकता है कि श्रीलाल जी का दृष्टिकोण कविता-विरोधी है; लेकिन, दरअसल कविता के सच में घटित न हो पाने की पीड़ा उनके कथा-साहित्य में समाई हुई है।… और लगता है कि जो काम कविता के क्षेत्र में नागार्जुन ने किया और व्यंग्य के क्षेत्र में हरिशंकर परसाई ने, उपन्यास के क्षेत्र में एक मायने में श्रीलाल शुक्ल ने उसे संभव किया।

 

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