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कहानी: शिबू का नया साल

नया साल आने वाला था और क्लास के सभी बच्चों में खुसुर-फुसुर शुरू हो गई थी। सबको पता था कि इस साल भी प्रिंसिपल सर बच्चों के साथ नए साल पर कोई बढ़िया सा आइडिया लेकर आएंगे। क्लास का मॉनीटर दीपेश डस्टर से दस बार ब्लैक बोर्ड पोंछ चुका था, पर प्रिंसिपल सर ने अभी तक एंट्री नहीं ली थी।

Author December 30, 2018 2:05 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

डॉ मंजरी शुक्ला

नया साल आने वाला था और क्लास के सभी बच्चों में खुसुर-फुसुर शुरू हो गई थी। सबको पता था कि इस साल भी प्रिंसिपल सर बच्चों के साथ नए साल पर कोई बढ़िया सा आइडिया लेकर आएंगे। क्लास का मॉनीटर दीपेश डस्टर से दस बार ब्लैक बोर्ड पोंछ चुका था, पर प्रिंसिपल सर ने अभी तक एंट्री नहीं ली थी।
जैसे ही उसे गुप्ता सर के साथ प्रिंसिपल सर की आवाज सुनाई दी वह फिर से ब्लैक बोर्ड साफ करने लगा। प्रिंसिपल सर ने उसे मुस्कुराकर देखा और क्लास के अंदर आ गए। पहली बेंच पर बैठा हुआ सागर बोला-‘अगर सर थोड़ी देर और ना आते तो आज हमारा ब्लैक बोर्ड व्हाइट बोर्ड बन जाता।’क्लास में इस बात पर एक जोरदार ठहाका गूंज उठा। प्रिंसिपल सर बोले-‘इस बार नए साल के पहले दिन को हम सब बिल्कुल अलग तरह से मनाएंगे। सभी बच्चे मुस्कुरा उठे।
‘सर, जल्दी बताइए, हम तो कब से इंतजार कर रहे हैं।’ नैना ने तुरंत कहा
‘इस बार सभी बच्चे अपने पापा और मम्मी के साथ स्कूल आएंगे और सबके मम्मी -पापा अपने बारे में थोड़ा-थोड़ा बताएंगे। प्रिंसिपल सर ने कहा
प्रिंसिपल सर की बात सुनते ही सभी बच्चों ने खुशी से तालियां बजार्इं और एक बार में ही सहमति दे दी।
समता बोली-‘सर, आपने बहुत अच्छी बात कही। हमारे मम्मी-पापा को भी अपने स्कूल के दिन याद आ जाएंगे।
प्रिंसिपल सर बोले-‘तो 1 जनवरी को मैं आप सभी की बैठने की व्यवस्था सभागार में करवा दूंगा। सब टाइम पर पहुंच जाना।
बच्चे खुशी से चीख उठे। मम्मी पापा के साथ उनके अनुभव शेयर करने की बात सुनकर सब को मजा आ गया।
बस फिर क्या था दिन भर जब भी मौका मिलता बच्चे अपने मम्मी-पापा के बारे में अपने दोस्तों को बताते रहे और खुश होते रहे, पर क्लास में अचानक ही जैसे कोई बुत बन गया था तो वो था शिबू…

शिबू को समझ ही नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे। उसकी मां उसी स्कूल में सफाई का काम करती थी। प्रिंसिपल सर ने उनकी सालों की मेहनत और ईमानदारी को देखते हुए शिबू की फीस माफ कर दी थी और किताबों की व्यवस्था भी वह स्कूल से ही करवा देते थे।हर इतवार के दिन शिबू उनके घर जाकर पढ़ता भी था, पर ये बात पूरे स्कूल में किसी को पता नहीं थी। तभी शिबू को क्लास के बाहर मां झाड़ू लगाती हुई दिखी। पसीने में तरबतर मां उसे देखकर मुस्कुराई पर शिबू ने उन्हें देखकर नजरें नीची कर लीं। तभी शिबू का दोस्त मिहिर बोला-‘आज तक तूने हमें अपनी मम्मी से नहीं मिलवाया है, इस बार तो हम उनसे ढेर सारी बातें करेंगे।’ शिबू का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया। वह तुरंत वहां से उठकर चला गया। शाम को जब मां घर लौटकर आई तो वह सिर दर्द का बहाना करते हुए औंधा पड़ा रहा। न उसने होमवर्क किया और न ही खाना खाया। पता नहीं क्लास की सब बातें सोचते हुए वह कब सो गया।
सपने में भी उसे, उसकी क्लास के बच्चे, उसकी मां का मजाक ही उड़ाते दिखे। अब शिबू का हंसना बोलना सब बंद हो गया। वह घुमा फिराकर बच्चों से कहता कि हम लोग प्रिंसिपल सर से कहते हैं कि उस दिन पिकनिक चलें या फिर कुछ और कार्यक्रम कर लें, पर कोई भी बच्चा उसकी बात पर ध्यान नहीं देता। सभी अपने मम्मी-पापा के स्कूल आने की बात को लेकर बहुत खुश थे।

जहां एक ओर बच्चे नए साल को लेकर दुगुने उत्साह में थे वहीं दूसरी ओर शिबू का दिल बैठा जा रहा था। शिबू के न चाहने पर भी नया साल आ ही गया।
आज एक जनवरी थी और बच्चे हों या बूढ़े सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे। लोग एक दूसरे को नए साल की बधाइयां और शुभकामनाएं दे रहे थे।
शिबू का मन स्कूल जाने का बिल्कुल नहीं था। मां जितनी बार आवाज लगाती वह चादर और कस कर पकड़ लेता। मां ने शिबू का माथा चूमते हुए कहा-‘नया साल बहुत बहुत मुबारक हो।’ शिबू का मन हुआ कि मां के गले लग कर खूब रोये पर वह उनके पैर छूकर चुपचाप खड़ा हो गया। माँ ने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी और उसके लिए नाश्ता बनाने लगी।
अगर उसे प्रिंसिपल सर का डर न होता तो आज वह किसी भी कीमत पर स्कूल न जाता। किसी तरह से जैसे-तैसे तैयार होकर वह भारी कदमों से स्कूल के लिए चल पड़ा।
थोड़ा ही आगे जाने पर उसके मोहल्ले के दो बच्चे उसे कूड़े के ढेर के पास प्लास्टिक की बोतले बीनते हुए मिले।
एक बच्चा बोला-‘सुनो…’ शिबू उसकी आवाज सुनकर रुक गया। एक ही मोहल्ले में रहने के कारण वह इन बच्चों को बहुत अच्छी तरह से पहचानता था। शिबू उनके पास जाकर खड़ा हो गया।
वह बच्चा बोला-‘हैप्पी नई ईयर…’

शिबू मुस्कुरा उठा और बोला-‘हैप्पी न्यू ईयर’ कहते हैं।
हां…हमें सही पता नहीं है। हम स्कूल नहीं जाते हैं न तुम्हारी तरह… पर हमें बहुत अच्छा लगता है तुम्हें स्कूल जाते देखकर …’ वह बच्चा प्लास्टिक की बोतल को थैले में रखते हुए बोला।
हां…जिस समय तुम स्कूल बैग टांगकर घर से निकलते हो, उसी समय हमें ये कूड़े का थैला लेकर निकलना पड़ता है।’ दूसरे बच्चे ने कहा
शिबू बोला-‘तुम दोनों तो मेरे घर के पीछे ही रहते हो न?’
‘हां…तुम हम दोनों को भी पढ़ा दिया करो। हम दोनों स्कूल नहीं जाते न…’ एक बच्चे ने शिबू के स्कूल बैग को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा
‘पढ़ा दूंगा।’ कहते हुए शिबू के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।
दोनों बच्चे हंसते हुए चल दिए। तभी एक बच्चा दूसरे से बोला-‘इसकी मम्मी बहुत अच्छी है, वह इसके पापा के नहीं होने पर भी इसे रोज स्कूल भेजती है वरना इसे भी रोज सुबह हमारी तरह …’
इसके आगे शिबू कुछ सुन नहीं सका।
उसकी आंखों से आंसूं बह निकले और वह रोते हुए घर की ओर दौड़ पड़ा, मां को अपने साथ स्कूल ले जाने के लिए…

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