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मुद्दाः लाभ बनाम लोभ

बाजार में लेखक है तो प्रकाशक भी है। सवाल यह है कि अगर साहित्य का स्तर गिर रहा है तो किसे दोषी माना जाए?

Author April 2, 2017 02:00 am
प्रतीकात्मक चित्र

कमल किशोर गोयनका

बाजार में लेखक है तो प्रकाशक भी है। सवाल यह है कि अगर साहित्य का स्तर गिर रहा है तो किसे दोषी माना जाए? कह सकते हैं कि दोनों की जिम्मेदारी बराबर है। प्रकाशक है जो अपने अनुसार माल को तैयार कराता है और बाजारू नीति से उसे बेचता है और माल के उत्पादक को एक पैसा नहीं देता। आज का प्रकाशक शुद्ध व्यापारी है, पुस्तक प्रकाशक तो अधिकांशत: पुस्तक को छापने या न छापने की कोई साहित्यिक नीति ही नहीं जानते, न समझते हैं। प्रेमचंद, जैनेंद्र, अश्क आदि बड़े लेखक स्वयं प्रकाशक भी थे और उनके पास प्रकाशनार्थ आर्इं पांडुलिपियों को परखने की एक साहित्यिक दृष्टि थी। आज इस साहित्यिक परख का अभाव है और इसका एक कारण यह भी है कि पुराने प्रकाशकों के यहां काम करने वाले लोग प्रकाशक बन गए हैं और उनका मूल लक्ष्य केवल पैसा कमाना है। किताब कितनी साहित्यिक है, इससे उनका कोई संबंध नहीं है। इस कारण आज बाजार में इरोटिक,सैक्स पर लिखी किताबें खूब छपती हैं और सरकारी खरीद के बिना खूब बिकती हैं। हिंदी में प्रकाशकों ने एक और महान काम किया है। आज एक ही मालिक के अनेक प्रकाशन-गृह हैं, यहां तक कि सत्तर तक प्रकाशन संस्थाएं हैं, जो केवल पैसा कमाने के लिए पुस्तकें प्रकाशित करती हैं। नवलकिशोर प्रेस, सरस्वती प्रेस, पूर्वोदय प्रकाशन, हंस प्रकाशन, नीलाभ प्रकाशन आदि अपने-अपने मालिकों की एक मात्र संस्था थीं। इस संदर्भ में सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, ज्ञानपीठ, नेशनल बुक ट्रस्ट आदि उल्लेखनीय हैं।
असल में प्रकाशकों की पुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाने में कोई रुचि नहीं है। इस गिरावट के कई कारण हैं। पहला तो यही कि प्रकाशक का मुख्य लक्ष्य सरकारी थोक खरीद में पुस्तकों को बेचना है। 1925 में प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ की पांच हजार प्रतियां छपी थीं और लेखक को अग्रिम के रूप में अठारह सौ रुपए (आज की मुद्रा में लगभग बीस लाख रुपए) मिले थे। हिंदी साहित्य और हिंदी समाज में अलगाव तेजी से बढ़ा है, क्योंकि साहित्य की गरिमा और अर्थवत्ता समाप्त हो रही है। विगत आधी शताब्दी से हिंदी में प्रगतिशील लेखकों का वर्चस्व रहा है। उन्होंने जो साहित्य रचा, उससे पाठक संस्कृति कम होती चली गई, इसको भी समझने की जरूरत है। आज नरेंद्र कोहली सबसे अधिक पढ़े जाने वाले और सबसे अधिक रॉयल्टी पाने वाले लेखक हैं, लेकिन वे प्रगतिशील नहीं हैं। आप जब तक अपनी रचनाओं में प्रेमचंद के समान जीवन के लिए कोई प्रेरणादायक तथा स्वस्थ भारतीय दृष्टि नहीं देंगे, आपको कौन पढ़ेगा ?

पु स्तक संस्कृति के ह्रास में प्रकाशकों की मनोवृत्ति, थोक खरीद, पुस्तकों के मूल्यों में अतिशय वृद्धि और इसमें चलनेवाली रिश्वतखोरी का बड़ा हाथ रहा है। इसे सारा प्रकाशन जगत जानता है। एक बड़ा सवाल है कि सरकारी पुस्तक खरीद में कैसे प्रकाशकों द्वारा दी जाने वाली रिश्वत को खत्म किया जाए ? केंद्रीय हिंदी निदेशालय का नियम है कि एक प्रकाशक की चालीस हजार रुपए से अधिक की नहीं खरीदी जाएंगी। इससे रिश्वत की प्रणाली पर अंकुश लगा है, लेकिन एक प्रकाशक की अगर दस-बीस फर्में हैं तो ऐसे में क्या किया जाए? पुस्तकों की थोक खरीद में अगर रिश्वत आदि खत्म हो जाए तो पुस्तकों की कीमत अपने आप 25-30 प्रतिशत कम हो जाएगी।

सरकार चाहें तो पुस्तकों की कीमत के लिए कोई फार्मूला बना सकती है, लेकिन एक प्रकाशक की अनेकानेक प्रकाशन संस्थाओं पर रोक लगाना संभव नहीं है, फिर भी कोई रास्ता निकालना चाहिए। यह सही है कि लेखक, प्रकाशक को पैसे देकर किताबें छपवाता है और कई प्रकाशक इससे ही फल-फूल रहे हैं और लेखक हाशिए पर पड़े हैं।
सरकारी खरीद में यह नियम होना जरूरी है कि प्रकाशक को खरीदी गई पुस्तकों की रॉयल्टी देने के प्रमाण-पत्र देना होगा। हमें पुस्तक व्यापार एवं लेखकीय अधिकार को नियमों से बांधना होगा और तभी हम पुस्तक संस्कृति के केंद्र में लेखक और पाठक को ला सकेंगे और प्रकाशक इन दोनों का मिलन बिंदु होगा और ज्ञान को पैसे से खरीदने-बेचने का रास्ता बंद करना होगा। तब सही अर्थों में लेखक नहीं प्रकाशक बीच बाजार में होगा और लेखक तथा पाठक, दोनों के हितों की रक्षा करेगा। १

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