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शख्सियत: इश्क और इंकलाब का शायर मजाज लखनवी

कहते हैं कि आगरा तक तो मजाज इश्किया शायर थे, पर अलीगढ़ आते-आते इश्किया शिद्दत इंकलाब में तब्दील हो गई।

प्रसिद्ध शायर मजाज लखनवी।

भारत में अभी उस दौर के लोग जीवित हैं, जिन्होंने ब्रितानी हुकूमत का दौर देखा है। उम्र के साथ तारीख का लंबा सफर देख चुके ऐसे लोगों से मिलने-बात करने पर अंदाजा होता है कि गुलामी और आजादी के बीच इस देश की बोली-भाषा और संस्कृति का स्वायत्त मिजाज स्वाधीनता पूर्व से था। दिलचस्प यह कि इस मिजाज में भी भारत की बहुलता देखने को मिलती है।

तरक्की पसंद शायर मजाज लखनवी के बारे में बात करने से पहले यह बात समझनी इसलिए जरूरी है क्योंकि उनकी शायरी में जबान या मजहब के आधार पर न तो कोई भेद दिखता है और न ही वे कोई एकरंगी या इकहरी बात ही करते हैं। यही नहीं, मजाज की शायरी से गुजरते हुए हमें यह भी इल्म होता है कि उर्दू की सुखनवरी ने इश्किया दामन से लिपटे रहने की तोहमत को बहुत पहले झुठलाना शुरू कर दिया था।

मजाज का जन्म 19 अक्तूबर,1911 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रुदौली गांव में हुआ था। छोटी उम्र में उर्दू साहित्य के ‘कीट्स’ कहे जाने वाले असरार उल हक ‘मजाज’ की जिंदगी बहुत लंबी नहीं रही, पर इस जहां से कूच करने से पहले उर्दू अदब को उन्होंने कई स्तरों पर समृद्ध किया है। मजाज एक शायराना खानदान से ताल्लुक रखते थे। उनकी बहन का निकाह आज के मशहूर शायर और फिल्मों के पटकथा लेखक जावेद अख्तर के पिता जांनिसार अख्तर के साथ हुआ था। मजाज ने अपने शायराना सफर की शुरुआत कॉलेज में पढ़ने के दौरानफनी बदायूंनी की शागिर्दी में की थी।

प्रेम मजाज की शायरी का केंद्रीय तत्व रहा, जो बाद में दर्द में बदल गया। मजाज को चाहने वालों की कमी नहीं थी। पर एक प्रेम प्रसंग ने उनकी जिंदगी में ऐसा तूफान ला दिया कि वे उससे आजीवन उबर न सके। 1929 के दशक में मजाज जिन दिनों आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज में पढ़ रहे थे, उनको जज्बी और मैकश अकबराबादी जैसे नामवर शायरों की सोहबत मिली। वालिद की चाहत के मुताबिक वे इंजीनियर बनने के बजाए शायरी करने लगे। उनकी शुरुआती गजलों को फानी ने दुरुस्त किया।

इसी दौरान उन्होंने व्याकरण सीखा। इसके बाद तो वह निखरते ही चले गए। जब वे आगरा से अलीगढ़ आए तो यहां वो सआदत हसन मंटो, इस्मत चुगताई, अली सरदार ज़ाफरी, सिब्ते हसन, जांनिसार अख्तर जैसे उर्दू के बड़े साहित्यकारों के संसर्ग में आए। इसके बाद उन्होंने अपना तखल्लुस बदलकर ‘मजाज’ कर दिया।

मजाज की शायरी के दो रंग हैं-एक इश्किया, दूसरा इंकलाब़ी। वे एक तरफ कहते हैं कि ‘तेरे माथे पे ये आंचल तो बहुत ही खूब है लेकिन, तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था’, वहीं वे नाजुकी से भरकर यह भी कहते हैं- ‘कुछ तुम्हारी निगाह काफिर थी, कुछ मुझे भी खराब होना था।’ कहते हैं कि आगरा तक तो मजाज इश्किया शायर थे, पर अलीगढ़ आते-आते इश्किया शिद्दत इंकलाब में तब्दील हो गई।

वैसे भी वह दौर स्वाधीनता आंदोलन में आए तारीखी उबाल का था। देश के नामी कवि-शायर और फनकार इंकलाबी गीत गाने लगे थे। ऐसे माहौल में उन्होंने ‘रात और रेल’, ‘नजर’, ‘अलीगढ़’, ‘नजर खालिदा’, ‘अंधेरी रात का मुसाफिर’, ‘सरमायादारी’ जैसी बेजोड़ रचनाएं लिखीं। उसी दौरान मजाज आल इंडिया रेडियो की पत्रिका ‘आवाज’ के सहायक संपादक हो कर दिल्ली पहुंच गए।

दिल्ली में नाकाम इश्क के दर्द ने लखनऊ लौटा दिया। फिर वे देखते-देखते शराब में डूबते चले गए। 1954 में उनको पागलपन का दौरा पड़ा, फिर भी शराब की लत नहीं गई। ऐसी ही बेपरवाह और अराजक जिंदगी जीते हुए 15 दिसंबर 1955 को दिमाग की नस फटने से इस अजीम शायर ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

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