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शख्सियत: महापंडित राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय

राहुल सांकृत्यायन की स्मृति में भारतीय डाक-तार विभाग की ओर से 1993 में उनकी जन्मशती के अवसर पर सौ पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया। पटना में राहुल सांकृत्यायन साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है।

Author April 14, 2019 2:52 AM
महापंडित राहुल सांकृत्यायन। (जन्म : 9 अप्रैल, 1893 – निधन : 14 अप्रैल, 1963)

महापंडित राहुल सांकृत्यायन हिंदी साहित्य की अद्वितीय विभूति हैं। राहुलजी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा नामक ग्राम में हुआ था। उनका बचपन का नाम केदारनाथ था। सांकृत्य गोत्र होने के कारण वे सांकृत्यायन कहलाए। बौद्ध धर्म में आस्था रखने के कारण उन्होंने अपना नाम बदल कर राहुल रख लिया था और फिर राहुल सांकृत्यायन नाम से विख्यात हुए। रानी की सराय और निजामाबाद में अनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। उन्होंने 1907 में उर्दू मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद उन्होंने कभी विधिवत शिक्षा ग्रहण नहीं की। अपने घूमने के अनुभव के आधार पर ही उन्होंने साहित्य का सृजन किया।

’राहुलजी को साहित्य रचने की प्रेरणा, पालि और संस्कृत के अध्ययन से प्राप्त हुई। उन्होंने तिब्बत, श्रीलंका, रूस, जापान, चीन, आदि देशों की यात्रा की और बौद्ध साहित्य का गहन अध्ययन किया। उन्होंने कहानी, नाटक, उपन्यास, यात्रावृत्त, निबंध, आत्मकथा, जीवनी, साहित्यालोचन, राजनीति और इतिहास आदि विषयों पर लगभग डेढ़ सौ ग्रंथों की रचना की है।

विवाह और संन्यास
राहुल जी का विवाह बचपन में ही कर दिया गया। इसकी प्रतिक्रिया में उन्होंने किशोरावस्था में ही घर छोड़ दिया। अपनी जिज्ञासु और घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चलते घर-बार त्याग कर साधु वेषधारी संन्यासी से लेकर वेदांती, आर्यसमाजी, किसान नेता और बौद्ध भिक्षु से लेकर साम्यवादी चिंतक तक का लंबा सफर तय किया। 1930 में श्रीलंका जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए। उनकी अद्भुत तर्कशक्ति और अनुपम ज्ञान भंडार को देख कर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी।

घुमक्कड़ी का शौक
राहुल सांकृत्यायन सदा घुमक्कड़ रहे। 1929 से उनकी विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर इसका अंत उनके जीवन के साथ ही हुआ। ज्ञानार्जन के उद्देश्य से प्रेरित उनकी इन यात्राओं में श्रीलंका, तिब्बत, जापान और रूस की यात्राएं विशेष उल्लेखनीय हैं। वे चार बार तिब्बत पहुंचे। वहां लंबे समय तक रहे और भारत की उस विरासत का उद्धार किया, जो हमारे लिए अज्ञात, अलभ्य और विस्मृत हो चुकी थी।
’अध्ययन-अनुसंधान के साथ वे वहां से प्रभूत सामग्री लेकर लौटे, जिसके कारण हिंदी भाषा एवं साहित्य की इतिहास संबंधी कई पूर्व निर्धारित मान्यताओं और निष्कर्षों में परिवर्तन हुआ। इससे शोध एवं अध्ययन के नए क्षितिज खुले।

सम्मान और पुरस्कार
राहुल सांकृत्यायन की स्मृति में भारतीय डाक-तार विभाग की ओर से 1993 में उनकी जन्मशती के अवसर पर सौ पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया। पटना में राहुल सांकृत्यायन साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है। यहां उनसे संबंधित वस्तुओं का एक संग्रहालय भी है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में राहुल सांकृत्यायन साहित्य संग्रहालय की स्थापना की गई है, जहां उनका जन्म हुआ था। उन्हें 1958 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा 1963 में भारत सरकार के पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया गया।

प्रमुख रचनाएं
कहानियां : सतमी के बच्चे, वोल्गा से गंगा, बहुरंगी मधुपुरी, कनैला की कथा।
उपन्यास : बाईसवीं सदी, जीने के लिए, सिंह सेनापति, जय यौधेय, भागो नहीं, दुनिया को बदलो, मधुर स्वप्न, राजस्थान निवास, विस्मृत यात्री, दिवोदास। आत्मकथा : मेरी जीवन यात्रा जीवनियां : सरदार पृथ्वीसिंह, नए भारत के नए नेता, बचपन की स्मृतियां, अतीत से वर्तमान, स्तालिन, लेनिन, कार्ल मार्क्स, माओ-त्से-तुंग, घुमक्कड़ स्वामी, मेरे असहयोग के साथी, आदि।
यात्रा साहित्य : लंका, जापान, इरान, किन्नर देश की ओर, चीन में क्या देखा, मेरी लद्दाख यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा, तिब्बत में सवा वर्ष, रूस में पच्चीस मास आदि।

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