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समाज सुधारक रचनाकार ईश्वर चंद्र विद्यासागर

वे बंगाल के पुनर्जागरण आंदोलन के अग्रणी नेताओं में थे। उनके बचपन का नाम ईश्वर चंद्र बंद्योपाध्याय था। संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध पांडित्य के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कालेज ने उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की थी। तबसे उनके नाम के साथ यह उपाधि जुड़ गई थी।

समाज सुधारक रचनाकार ईश्वर चंद्र विद्यासागर

वे स्त्री शिक्षा के समर्थक थे। उनके प्रयास से ही कोलकाता और अन्य स्थानों पर बड़ी संख्या में बालिका विद्यालयों की स्थापना हुई। उस समय हिंदू समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत शोचनीय थी।

उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के लिए लोकमत तैयार किया। उन्हीं के प्रयासों से 1856 में विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ। उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का विवाह भी एक विधवा से कराया था। इसके अलावा उन्होंने बाल विवाह का भी विरोध किया।

बांग्ला भाषा के गद्य को सरल और आधुनिक बनाने का उनका कार्य सदा याद किया जाएगा। उन्होंने बांग्ला लिपि की वर्णमाला को सरल और तर्कसम्मत बनाया। बांग्ला पढ़ाने के लिए उन्होंने सैकड़ों विद्यालय स्थापित किए तथा रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की।

उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास किया। उन्होंने संस्कृत कालेज में पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन भी शुरू किया।

सन 2004 के एक सर्वेक्षण में उन्हें ‘अब तक का सर्वश्रेष्ठ बंगाली’ माना गया था। ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले के वीरसिंह गांव में एक अति निर्धन परिवार में हुआ था। नौ वर्ष की अवस्था में उन्होंने कोलकाता जाकर संस्कृत कालेज में विद्यारंभ किया।

शारीरिक अस्वस्थता, घोर आर्थिक कष्ट तथा गृहकार्य के बावजूद ईश्वरचंद्र ने प्राय: प्रत्येक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 1841 में फोर्ट विलियम कालेज में पचास रुपए मासिक पर उन्हें मुख्य पंडित के पद पर नियुक्ति मिली। तभी वे ‘विद्यासागर’ की उपाधि से विभूषित हुए।

1851 में वे उस कालेज में मुख्य अध्यक्ष बने। 1855 में असिस्टेंट इंस्पेक्टर, फिर पांच सौ रुपए मासिक पर स्पेशल इंस्पेक्टर नियुक्त हुए। 1858 में मतभेद होने पर फिर त्यागपत्र दे दिया। फिर साहित्य तथा समाजसेवा में लग गए। 1880 में सीआइई का सम्मान मिला।

विद्यार्थी जीवन में भी इन्होंने अनेक विद्यार्थियों की सहायता की। समर्थ होने पर बीसों निर्धन विद्यार्थियों, सैकड़ों निस्सहाय विधवाओं तथा अनेकानेक व्यक्तियों को अर्थकष्ट से उबारा। उन्होंने अपने ही व्यय से मेट्रोपोलिस कालेज की स्थापना की। साथ ही अनेक सहायता प्राप्त स्कूलों की भी स्थापना कराई।
संस्कृत अध्ययन की सुगम प्रणाली निर्मित की। इसके अतिरिक्त शिक्षा प्रणाली में अनेक सुधार किए। समाजसुधार उनका प्रिय क्षेत्र था, जिसमें उन्हें कट्टरपंथियों का तीव्र विरोध सहना पड़ा, प्राणभय तक आ बना। समाज सुधारक के रूप में इन्हें राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता है।

साहित्य के क्षेत्र में वे बांग्ला गद्य के प्रथम प्रवर्त्तकों में थे। उन्होंने बावन पुस्तकों की रचना की। जिन पुस्तकों से उन्हें विशेष प्रतिष्ठा मिली वे हैं, ‘वैतालपंचविंशति’, ‘शकुंतला’ तथा ‘सीता वनवास’। वे अपना जीवन एक साधारण व्यक्ति के रूप में जीते थे, लेकिन दान पुण्य वे एक राजा की तरह करते थे।

क्षुद्र तथा स्वार्थी व्यवहार से तंग आकर उन्होंने अपने परिवार के साथ संबंध विच्छेद कर लिया और अपने जीवन के अंतिम अठारह से बीस वर्ष बिहार (अब झारखंड) के जामताड़ा जिले के करमाटांड़ में संताल आदिवासियों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उनके सम्मान में अब करमाटांड़ स्टेशन का नाम ‘विद्यासागर रेलवे स्टेशन’ कर दिया गया है।

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First published on: 25-09-2022 at 04:06:00 am