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मन तंबूरा बाजे

ध्वनियां सिर्फ बाहर नहीं, हमारे भीतर भी तरंगें पैदा करती हैं। ध्वनियां हमारे भीतर दृश्य रचती हैं। जैसा हम सुनते हैं, वैसा ही हमारा मन बनता है।

मन तंबूरा बाजे

रोहित कुमार

कोई ध्वनि हमें सहज ही अपनी तरफ खींच लेती है, तो कोई मन को वितृष्णा से भर देती है। अब तो विज्ञान भी सिद्ध कर चुका कि ध्वनियां बहुत से गंभीर रोगों में उपचार का काम करती हैं, व्यक्ति में सकारात्मक सोच पैदा करती हैं, तो कछ ध्वनियां अवसाद से भर देती हैं।

हम भीड़भाड़ में हैं, चारों ओर शोर-शराबा है, मगर कोई महीन-सी ध्वनि हमारे कान में ऐसे पड़ती है कि हम उसे सुनने को व्याकुल हो उठते हैं। हमारे आसपास का शोर धीरे-धीरे थमने लगता है, हमारे कान सिर्फ उस ध्वनि पर केंद्रित हो जाते हैं। हमारा ध्यान एकदम से उस ध्वनि की ओर एकाग्र हो जाता है। हमारी आंखें उस ध्वनि को तलाशने लगती हैं।

शरीर की भंगिमा बदल जाती है। गर्दन घुमा-घुमा कर उस ध्वनि को पहचानना शुरू कर देते हैं। पर इसके उलट यह भी होता है कि आप गहरी नींद में सोए हों, कि कोई कर्कश, भयावह ध्वनि कानों में पड़े और आप एकदम से उठ खड़े होते हैं। उस ध्वनि की तरंगें आपके भीतर इतनी देर तक गूंजती रहती हैं कि फिर आपको नींद आती ही नहीं। मन खिन्न हो उठता है।

दरअसल, हमारा स्वभाव मधुर, सुकोमल ध्वनियों को सुनने का है। मन सदा सुकोमल ध्वनियों को तलाशता रहता है। उन ध्वनियों को बार-बार सुनना चाहता है। यही वजह तो है कि एक गीत-संगीत को बार-बार सुनने के बावजूद मन भरता ही नहीं। हजारों हजार ध्वनियां हमारे आसपास उभरती रहती हैं, पर उनमें से वही ध्वनि हमें पसंद आती है, जो हमारे भीतर सुकोमल तरंगें पैदा करती है।

इसलिए संगीतकार सदा ध्वनियों का संयोजन कर उन्हें प्रभावोत्पादक रागमाला में पिरोने का प्रयास करते हैं। वे ध्वनियों की तीव्रता को पहचानते हैं। उन्हें तो इस बात की साधना भी है कि किस प्रहर में किस ध्वनि का मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और किस ध्वनि का नकारात्मक।
इसलिए रागों को प्रहर के अनुसार गाए-बजाए जाने का विधान है। उनका असर भी उसी प्रहर में ठीक-ठीक पड़ता है, जिस प्रहर के लिए वे संयोजित हैं। इसका भी एक विज्ञान है। जब बाहरी वातावरण और हमारे भीतर के वातावरण की तरंगें सम पर होती हैं, तो उस प्रहर की ध्वनियां उन तरंगों से मिल कर सुखद वातावरण की रचना करती हैं।

कभी गहन रात में अगर आपने राग मालकौंस सुना होगा, तो उसका अनुभव किया होगा। एक आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम गहन निद्रा की अवस्था में पहुंच जाते हैं, पर चेतना उच्च ऊर्जा से भरी होती है। सुबह उठते ही चिड़ियों का कलरव और सरसराते पवन की ध्वनि किस तरह ऊर्जा से भर देती है। अगर इन्हीं प्रहरों में विपरीत ध्वनियां सुनने को मिलें, तो मन खिन्न हो जाता है। जैसे सारी ऊर्जा निचुड़ जाती है।

ध्वनियां सदा टकराव से पैदा होती हैं। चाहे वे कंठ में स्वर-विवर में टकराव से पैदा हों, किसी तार पर प्रहार से पैदा हों या किसी तालवाद्य पर प्रहार से। मगर वह टकराव सायास पैदा किया जाता और उसे संयोजित किया जाता है।

ध्वनियों को संयोजित करने की साधना कर ली जाए तो कर्कश को भी मधुर बनाया जा सकता है। मगर विडंबना है कि आधुनिकता ने टकराव पैदा करने के साधन तो बहुत सारे विकसित कर लिए हैं, पर उनसे निकलने वाली ध्वनियों को संयोजित करने का कोई उपाय नहीं है।

प्रकृति अपने टकराव और उससे निकलने वाली ध्वनियों को संयोजित करके ही प्रक्षेपित करती है, इसलिए वे कर्कश नहीं लगतीं। आधुनिकता ने सुविधा के लिए मशीनें तो खूब सारी बना लीं, उनसे निरंतर ध्वनि निकलती रहती है, पर उसे संयोजित करने का कोई उपाय नहीं है।

जब हम सितार के तार को आहत करते हैं, उस पर मिजराब टकराते हैं तो उससे निकलने वाली ध्वनि को संयोजित करने का उपाय करते हैं। तारों पर अंगुलियां फिरा कर उन ध्वनियों को संयोजित करते हैं। मशीन से निकलने वाली ध्वनि को संयोजित करने का कोई उपाय नहीं है।

एक मोटरसाइकिल गहन रात को फर्रांटा भरती हुई आपके घर की बगल से गुजर जाती है और आप नींद से जाग जाते हैं। इसलिए कि उस मोटरसाइकिल में ध्वनि को संयोजित करने का कोई उपाय नहीं है। आधुनिकता ने हमारे चारों तरफ इसी तरह की अनियोजित, बेलगाम, कर्कश ध्वनियों, इसी तरह के शोर का वातावरण हमारे चारों तरफ रच दिया है। हम न चाहते हुए भी उनके बीच में हैं।

इन ध्वनियों का हमारे जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है। हम स्वभाव से चिड़चिड़े और कर्कश होते जा रहे हैं। हमारे बोलने का स्वभाव बदल गया है। तंज, उग्र, चिढ़, डांट-फटकार, लड़ाई-झगड़े की भाषा बोलने लगे हैं।

हमारे भीतर क्रोध जल्दी उभर आता है। बाहरी टकराव बढ़ता है, तो हमारे भीतर की स्वरतंत्रिका में भी उसी तरह का टकराव पैदा होता है। वहां से वैसी ही स्वर लहरियां उत्पन्न होने लगती हैं। अनियंत्रित, कर्कश।

बाहर की तरंगों को कैसे अपनी भीतर की तरंगों पर हावी न होने दें, अपने भीतर की तरंगों के स्वभाव को न बदलने दें, यही तो कठिन चुनौती बनती गई है हमारे समय में। बाहर जो तरंगें विज्ञान की मशीनी कर्कशता ने रची हैं, उन्हें अपने भीतर, अपने मानस-तंत्र तक न पहुंचने दें, यह कठिन काम होता गया है। मगर मनुष्य के लिए कठिन तो कुछ भी नहीं। तमाम शोर और कर्कशता के बावजूद बाहर की दुनिया में कोमल ध्वनियां मौजूद हैं।

बस, उन्हें कर्कश ध्वनियों ने ढंक लिया है। इसी तरह हमारे भीतर भी बाहर का शोर प्रवेश कर कोमल ध्वनियों पर मोटी परत बन चढ़ गया है। बस जरूरत है कि शोर की उस परत को हटाया जाए। हमारे भीतर की ध्वनियां अपने आप बज उठेंगी।

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First published on: 25-09-2022 at 04:05:00 am
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