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परिदृश्यः भारतीय सांस्कृतिक बनावट को तोड़ती संकीर्णता

भारतीय जीवन दर्शन इतना संकीर्ण कभी नहीं हुआ कि कोई भी व्यक्ति या परिवार अपनी उपलब्धियों का उपयोग सिर्फ अपने लिए करे।

प्रतीकात्मक चित्र

अतुल कनक

भारत भिन्नता में एकता का देश है, लेकिन संकीर्णता और स्वार्थ के कारण जागृत हुआ अहं इस एकता के वैराट्य पर कुठाराघात कर रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने उपन्यास ‘गोरा’ में लिखा था- ‘भारतवर्ष को सहज बुद्धि और प्यार से देखिए, इसे प्यार कीजिए। जिस जगह से देखने से यहां के मनुष्यों को संपूर्ण देखा जा सकता है, वहां से देखिए। वे अनेक प्रकार से चलते हैं, उनके विश्वास और संस्कार विविध प्रकार के हैं, पर सबकी जड़ में एक मनुष्यत्व है, सबके ही भीतर एक ऐसी वस्तु है- जो मेरी है, जो भारतवर्ष की है। बहुत काल की अनेक विध साधनाएं उसमें दीख पड़ती हैं। राख के अंदर प्राचीन होम की अग्नि अब भी जल रही है और वही अग्नि देशकाल को नीचे छोड़ कर संसार में अपनी शिक्षा प्रज्ज्वलित करेगी। इस भारतवर्ष में मनुष्य ने अनेक दिन से अनेक बड़ी बातें की हैं, अनेक बड़े काम किए हैं। वे बातें, वे काम- बिल्कुल मिथ्या या निरर्थक हो गए हैं, ऐसा समझना सत्य के प्रति अश्रद्धा है। यही नास्तिकता है।’

शायद इसीलिए रोमां रोलां ने एक बार कहा था, ‘अगर पृथ्वी की सतह पर कोई ऐसा स्थान है, जहां मानव द्वारा अपने अस्तित्व के अहसास के प्रारंभ से ही सभी मनुष्यों के सपनों को आश्रय मिल सका हो, तो वह स्थान केवल भारत है।’ ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी ने भी लिखा है ‘मानव इतिहास के इन अत्यंत कठिन क्षणों में अगर संपूर्ण मानवता के लिए कहीं मुक्ति की आशा है तो वह जीवन जीने के भारतीय दर्शन में है। यहां के आचरण में वह प्रवृत्ति और आत्मा है, जो संपूर्ण मानवजाति को एक परिवार के रूप में एक साथ विकास और पोषण का अवसर देती है।’ अर्नाल्ड शायद भारतीय वांग्मय के उस दर्शन से भी प्रभावित थे, जिसने सदियों पहले ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का उद्घोष किया था।

भारतीय जीवन दर्शन इतना संकीर्ण कभी नहीं हुआ कि कोई भी व्यक्ति या परिवार अपनी उपलब्धियों का उपयोग सिर्फ अपने लिए करे। सदियों पहले हमारे गुणी ऋषियों ने हमें समझाया था- ‘अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतषाम्।’ यानी यह मेरा है और वह तेरा है, ऐसी बातें तो छोटे दिल के लोग करते हैं। महाभारत में राजा शिवि की कथा है। एक बार वे अपने महल के प्रांगण में बैठे थे कि आसमान से उड़ता हुआ एक घायल कबूतर उनकी गोद में गिरा। उस कबूतर के पीछे एक बाज भी था। राजा शिवि ने कबूतर को अपने हाथ में उठा लिया तो बाज ने कहा कि वह कबूतर उसका शिकार है और उसे प्रकृति के प्रावधानों के अनुसार अपना पेट भरने का अधिकार दिया जाना चाहिए। इस पर राजा शिवि ने जब करुणा आदि की बातें की तो बाज ने ताना मारा कि दूसरों का भोजन छीन कर ये बातें बहुत सलीके से की जा सकती हैं। इस पर राजा शिवि ने निश्चय किया कि वे कबूतर के शरीर के बराबर मांस अपने शरीर से काट कर बाज को देंगे।

कथा के अनुसार यह देवताओं द्वारा राजा शिवि की दानशीलता के परीक्षण का उपक्रम था। इसलिए जब शिवि ने तराजू के एक पलड़े पर घायल कबूतर को रखा और दूसरे पलड़े में अपने शरीर का मांस चढ़ाना शुरू किया तो कबूतर वाला पलड़ा लगातार भारी होता गया। इसलिए शिवि स्वयं दूसरे पलड़े में जा बैठे, लेकिन उन्होंने शरणागत कबूतर की जान का संकल्प निभाने से इंकार नहीं किया। राजा शिवि की कथा तो पौराणिक है, लेकिन भारतीय इतिहास के मध्यकाल में भी रणथंभौर के शासक हाड़ा हम्मीर ने अपने समय के सबसे शक्तिशाली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध लड़ना तो स्वीकार कर लिया, लेकिन शरणागत मंगोलों को उसे सौंपने से इंकार कर दिया। भारतीय इतिहास में ऐसे कई प्रसंग हैं जब सामर्थ्यवान लोगों ने दूसरों की आवश्यकताओं को देखते हुए अपने साधनों का सहर्ष त्याग कर दिया।

वसुधैव कुटुंबकम् के संस्कारों के कारण जन्मी करुणा हमारे स्वभाव को सदैव सौहार्द से पूर्ण रखती है। यही कारण है कि भारतीय समाज ने युद्ध के लिए आए यूनानियों और मुगलों के सांस्कृतिक वैविध्य को भी अपनी जीवनशैली का एक अंग बनाया। भारतीय रंगमंच की कई प्रमुख प्रवृत्तियों का उत्स यूनानी नाट्य परंपरा में निहित हैं। चंद्रगुप्त मौर्य की यूनानी पत्नी द्वारा डिजाइन की गई साड़ी भारतीय स्त्रियों का प्रमुख पहनावा हो गई। यूनानी संपर्क ने हमें ज्योतिष प्रसंगों में भी समृद्ध किया। मुगलों के आक्रमण का उद्देश्य कुछ भी रहा हो, लेकिन हमने स्थापत्य से लेकर संगीत तक, उनकी कई सांस्कृतिक विविधताओं को अपना बना लिया। यह केवल भारतीय समाज में ही संभव है कि आक्रांताओं की सैनिक छावनियों से संपर्क की जरूरत के कारण विकसित हुई उर्दू भाषा दुनिया के सबसे समृद्ध साहित्य की भाषाओं में एक हो गई।

तीर्थाटन की परंपरा ने भी हमें एक सूत्र में बांधने का काम किया। यात्रा के दौरान विविध पड़ावों पर विविध लोगों और उनकी सांस्कृतिक विविधता से संपर्क होता था। यह संपर्क देश के विविध हिस्से के निवासियों को परस्पर आत्मीयता के सूत्र में बांधता था। तीथर्यात्रियों का सत्कार करना आज भी सौभाग्य माना जाता है। आज भी राजस्थान के रामदेवरा जाने वाले पैदल यात्रियों को हर गांव, शहर में न केवल निश्शुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है, बल्कि उन्हें वांछित सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जगह-जगह शिविर लगाए जाते हैं। यह सद्भाव लोगों को एकता के सूत्र में बांधता है।

अंग्रेजों ने भारत में आधुनिक विकास की नींव डाली, लेकिन उनकी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति ने देश के विविध वर्गों के अंतस में घृणा के ऐसे बीज बो दिए कि भाषा, धर्म, प्रांत, जाति के नाम पर अलगाव के विषधर फुंफकाने लगे हैं। देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में रोजगार की तलाश में गए लोगों पर आक्रमण की प्रवृत्ति भारत के संघीय ढांचे के लिए एक नई चुनौती बन गई है। गुजरात में पिछले दिनों उभरी यह प्रवृत्ति पहले मुंबई में भी देखी जा चुकी है। मुंबई में बिहारियों और मारवाड़ियों पर कुछ लोगों द्वारा यह कह कर आक्रमण किए गए कि उनके कारण स्थानीय लोगों के रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। आक्रमण करने वाले भूल गए कि बिहार में जन्में वर्धमान महावीर को पूरे देश में पूजा जाता है।

महाराष्ट्र के संत नामदेव के भजन देश भर में गाए जाते हैं। गुजरात के पोरबंदर में पैदा हुए महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन में सारे देश का नेतृत्व किया। सन 1014 में सिंहासन पर बैठा चोल शासक राजेंद्र प्रथम उत्तर भारत की नदी गंगा की प्रतिष्ठा से आक्रांत नहीं हुआ, बल्कि उसकी प्रांजलता से प्रभावित होकर विशिष्ट अनुष्ठान के साथ गंगाजल अपनी राजधानी लेकर गया था। क्या क्षेत्रीयता की राजनीति में सुख पाने वाले कभी गंगा की प्रांजलता को मन से अस्वीकार कर सकेंगे? दरअसल, इस सांस्कृतिक वैराट्य में जब कोई अपेक्षित महत्त्व नहीं पा पाता है, तो वह सीधे संघीय अस्मिता के प्रतीकों पर प्रहार करके संकीर्ण दायरे में विशिष्ट होना चाहता है। दशकों पहले दक्षिण भारत में भड़के हिंदी विरोधी आंदोलन की कहानी हो या पिछले दिनों गुजरात में भड़के हिंदी भाषियों के विरोध का प्रसंग, भारत का सांस्कृतिक गौरव इन प्रवृत्तियों का समर्थन नहीं करता।

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