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अलविदा!

चनात्मकता उन्हें घुट्टी में मिली थी। माता-पिता दोनों रचनाकार थे। इसलिए साहित्य से अनुराग बचपन में ही हो गया था। खूब पढ़ती थीं। विवाह के बाद पति के साथ बंबई गर्इं तो उन्हें लिखने की धुन सवार हुई।

Author July 31, 2016 2:13 AM

सूर्यनाथ सिंह

महाश्वेता देवी लेखक के सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप में यकीन करती थीं। पूरा जीवन उन्होंने आदिवासी और समाज के वंचित तबके को समर्पित कर दिया। कभी किसी राजनीतिक विचारधारा या राजनीतिक दल से राब्ता कायम नहीं किया। अपनी लीक पर चलती रहीं, अपने ढंग से रचती रहीं। अपनी विचारधारा खुद गढ़ी और उस पर अडिग रहीं। जो कुछ लिखा, खूब जांच-परख कर लिखा। लेखन को आंदोलन का रूप दे दिया। इस तरह महाश्वेता देवी ने साबित कर दिया कि अगर रचना में सच्चाई है तो उसकी गूंज अनसुनी नहीं रह सकेगी। इतिहास, पुराकथा, लोककथा, लोकसंगीत आदि के समंजन से जिस तरह उन्होंने अपने समकाल को रूपायित किया, वह विलक्षण है। 

चनात्मकता उन्हें घुट्टी में मिली थी। माता-पिता दोनों रचनाकार थे। इसलिए साहित्य से अनुराग बचपन में ही हो गया था। खूब पढ़ती थीं। विवाह के बाद पति के साथ बंबई गर्इं तो उन्हें लिखने की धुन सवार हुई। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई से वे बहुत प्रभावित थीं, सो उन्होंने उनके जीवन को आधार बना कर कुछ लिखने का तय किया। उनसे संबंधित जो भी किताबें थीं, सब पढ़ डालीं। मगर संतोष नहीं हुआ। उन तमाम जगहों पर गर्इं, जो लक्ष्मी बाई के जीवन से जुड़ी थीं। तब मुफलिसी में गुजारा हो रहा था, पर उन्हें धुन सवार हो गई थी लिखने की, तो उन्होंने तमाम जगहों पर जाकर तथ्य जुटाए और अपना पहला उपन्यास लिख डाला- झांसी की रानी।
महाश्वेता देवी इतिहास, पुराकथा, लोककथा, लोकगीत आदि से घटनाओं को उठातीं और उन सबको सामयिक कलेवर में लपेट कर कथाएं रचतीं। उन्होंने शिल्प या भाषा संबंधी प्रतिमानों और अनुशासनों की परवाह कभी नहीं की। कथा उनके लिए सदा महत्त्वपूर्ण रही। कथा में मनुष्य के जीवन की यथार्थ घटनाएं सदा महत्त्वपूर्ण रहीं। स्वतंत्रता संग्राम, खासकर अठारह सौ सत्तावन की घटनाओं ने, उन्हें बेहद प्रभावित किया था और उन्हें आधार बना कर ‘झांसी की रानी’ के बाद दो और उपन्यास लिखे- ‘नटी’ और ‘जली थी अग्निशिखा’।
उनके इस तरह इतिहास और पुराकथाओं, लोककथाओं आदि को मिला कर खूबसूरत तरीके से कथा कहने के अंदाज से प्रभावित होकर 1974 में फिल्म निर्माता शांति चौधरी ने महाश्वेता देवी से बिरसा मुंडा पर एक कहानी लिखने को कहा। बिरसा मुंडा से संबंधित जहां जो भी सामग्री मिल सकती थी, सब कुछ उन्होंने जुटाई। दक्षिण बिहार जाकर वहां के लोगों से मिलीं, बिरसा मुंडा से संबंधित जितनी कहानियां थीं, जो भी तथ्य थे, उन्होंने जुटाए और उपन्यास लिख दिया- ‘अरण्येर अधिकार’ यानी ‘जंगल के दावेदार’।

इस उपन्यास पर उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। तब आदिवासियों ने ढोल बजा-बजा कर गीत गाया- हमें साहित्य अकादेमी मिला है। तब तक वहां के आदिवासियों को सरकारी रिकार्ड में भूमिज नाम से दर्ज किया गया था। महाश्वेता देवी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो उनमें अपने मुंडा होने का बोध जागा। उन्होंने सरकारी दफ्तर में उपस्थित होकर मांग की कि सरकारी रिकार्ड में उन्हें मुंडा के रूप में दर्ज किया जाए। आदिवासी समुदाय के लोगों ने उन्हें सम्मानित करते हुए कहा कि ‘मुख्यधारा ने हमें कभी स्वीकृति नहीं दी। हम इतिहास में नहीं थे। तुम्हारे लिखने से हमें स्वीकृति मिली।’ महाश्वेता देवी को जितनी खुशी अपनी किताब पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने की नहीं हुई, उससे ज्यादा उन्हें मुंडा आदिवासी समुदाय में सम्मान पाकर हुई। तबसे वे आदिवासी समुदाय के लिए समर्पित होकर रह गर्इं।

महाश्वेता देवी ने देश भर- खासकर झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़ीशा- के आदिवासियों और समाज के हाशिये पर पड़े लोगों के जीवन की दुर्दशा को केंद्र में रख कर रचनाएं कीं। इन समुदाय के लोगों के लिए काम कर रहे संगठनों से जुड़ कर उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करती रहीं। न्यूनतम मजदूरी, मानवीय गरिमा, सड़क, पेयजल, अस्पताल, स्कूल की सुविधा से वंचित भूमिहीन होने को अभिशप्त आदिवासियों और दलितों को आजादी के इतने साल बाद भी न्याय नहीं मिला है, यही महाश्वेता की चिंता के कारण बन गए।

महाश्वेता देवी अथक योद्धा थीं, पर कभी किसी राजनीतिक विचारधारा या राजनीतिक दल से उन्होंने खुद को बांध कर नहीं रखा। हालांकि उनके पति विजन भट््टाचार्य और और पुत्र नवारुण भट््टाचार्य गहरे स्तर पर वामपंथी विचारधारा से जुड़े हुए थे, और महाश्वेता देवी पर भी इस विचारधारा से जुड़ने के दबाव भी बनते रहे, पर वे नहीं जुड़ीं। यहां तक कि उन्होंने कभी मार्क्स और लेनिन का लिखा कुछ नहीं पढ़ा। वे स्वतंत्रमना थीं। उन्होंने अपनी विचारधारा खुद विकसित की थी। बाद के दिनों में ममता बनर्जी से उनकी निकटता जरूर बनी थी, पर राजनीतिक रूप से वे उनके साथ भी पूरी तरह नहीं बनी रहीं। सिंगूर और नंदीग्राम के मसले पर दोनों के बीच स्पष्ट मतभेद थे।
महाश्वेता देवी मूल रूप से रचनाकार थीं और वे मानती थीं कि जब तक रचनाकार समाज के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होगा, उसका लेखन वास्तविक नहीं होगा। इसलिए आदिवासी और दलित-शोषित समुदाय को लेकर उन्होंने जो कुछ लिखा उन्होंने उनकी जमीन से जुड़ कर लिखा, उनके जीवन को नजदीक से देख और जीकर लिखा। वे आदिवासियों के सशस्त्र आंदोलनों की पक्षधर थीं। उन्होंने अपने उपन्यास ‘अग्निगर्भ’ में कहा भी कि ‘जब बटाईदारी-अधिया जैसी घृणित प्रथा में किसान पिस रहे हों, खेतिहर मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी न मिले, बीज-खाद-पानी-बिजली के लाले पड़े हों, उनका अस्तित्व दांव पर हो, ऐसे में वह सामंती हिंसा के विरुद्ध हिंसा को चुन ले तो क्या आश्चर्य?’

आदिम जनजातियों, वनों में जीवन गुजारने वाले लोगों के जीवन को तहस-नहस करने वाले कपटी सभ्य समाज के जीवन की दूसरी विकृतियों को भी महाश्वेता देवी ने बेनकाब किया है। उन्होंने अपनी अनेक रचनाओं के जरिए उपभोक्ता संस्कृति के पंजों में जकड़ी और दम तोड़ती आदिवासी संस्कृति को बचाने की जरूरत रेखांकित की है।

महाश्वेता देवी इस बात का उदाहरण है कि रचनाकार चाहे तो अपने लेखन के बल पर दलित-वंचित समुदायों और छीजती संस्कृतियों की रक्षा के लिए व्यापक आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने कुछ साल पेशे के तौर पर अध्यापन किया, पर मूलत: वे आंदोलनकारी, सक्रिय रचनाकार बन कर ही रहीं। कभी उन्हें भाषा और शिल्प को लेकर सजग रहते नहीं देखा गया। इसे लेकर उन पर कुछ लोगों ने तोहमत भी लगाई, पर उसकी परवाह उन्होंने कभी नहीं की। अगर उनकी पुस्तकों की भूमिकाएं पढ़ें तो महाश्वेता देवी न केवल श्रेष्ठ कथाकार, बल्कि सजग समालोचक भी नजर आएंगी। उनका जाना न सिर्फ एक योद्धा रचनाकार का अवसान, बल्कि आदिवासी-वंचित समाज के लिए उठने वाली एक बुलंद आवाज की गूंज का समाप्त हो जाना है।

कहानी के इर्द-गिर्द महाश्वेता

मैं तो अब अस्तगामी हो चली हूं। आयु की बालू-घड़ी में से बालू के कण नि:शब्द झर रहे हैं। आज लगता है, सभी असह्य परिस्थितियों के बावजूद जो आदमी की जिजीविषा है, वह जो सत् मूल्यों में आस्था रखना चाहता है, जिसके लिए बरसात ही खेती का साधन है, वह मनुष्य जब एक पौधा रोपता है जमीन में तो वह भी गहरी आस्था के साथ उसी जिजीविषा का रोपण करता है- ये ही मेरे लिए सबसे ज्यादा जानने योग्य बातें हैं। यह उपलब्धि वह मंजिल है, जहां अंत में अपना रास्ता ढूंढ़ते हुए मैं पहुंची हूं। जिन्हें केवल करुणा का पात्र, भिखारी बना कर रखा जा रहा है, वे आज पीने और सिंचाई के पानी के लिए खुद लड़ रहे हैं और अपने हाथों कुआं खोद रहे हैं, अपने हाथों अपना रास्ता बना रहे हैं, इतना देख कर जा रही हूं, इसके लिए खुद को धन्य मानती हूं।

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‘जगमोहन की मृत्यु’, ‘रुदाली’, ‘शिशु’, ‘नमक’, ‘बीज’ तथा अन्य उपन्यास और कहानियां एक विशेष अंचल पर आधारित हैं। उस अंचल को मैं भारतवर्ष मानती हूं और यही अंचल बार-बार मेरी कहानियों में लौट आता है। इन चरित्रों के प्रति भी मैं जवाबदेह हूं।
जो लोग आज भी पूछते हैं कि अकादेमी पुरस्कार लेकर मैंने क्या अपने को बेच नहीं दिया है, उनसे मेरा अनुरोध है कि वे पुरस्कार संबंधी अपना दृष्टिकोण पहले स्पष्ट करें। सिनेमा-थियेटर में, किसी विशेष सिनेमा के लिए निर्देशकों को ढेरों सरकारी पुरस्कार और सम्मान मिलता है। आप लोग उनकी निष्ठा पर तो प्रश्नचिह्न नहीं लगाते। सिनेमा के क्षेत्र में वामपंथी निर्देशक को आत्मविक्रय और समझौतावादी नहीं करार देंगे और साहित्य के क्षेत्र में ऐसा करेंगे; इससे प्रमाणित होता है कि आप लोग दोमुंहे न्यायबोध से परिचालित हो रहे हैं। शायद कहीं यह भी अवधारणा आपके अवचेतन में बनी हुई है कि सिनेमा-निर्देशकों का मूल्य साहित्यकार की अपेक्षा कहीं ज्यादा है। सिनेमा-निर्देशक को दस-बीस-पचीस-पचास हजार में खरीदा जा सकता है, तो बेचारे साहित्यकार को उससे कहीं सस्ते दामों यानी पांच या दस हजार में ही खरीदा जा सकता है। कौन लेखक किस तरह का समझौता कर रहा है, यह उसके साहित्य-कर्म में ही पकड़ा जा सकता है। जो कहते हैं कि मैं सिर्फ शोषण-उत्पीड़न दिखा रही हूं, इससे मुक्ति की बात नहीं कर रही हूं- उनसे कहना चाहूंगी कि अगर मेरा लेखन यह बता पा रहा है कि स्थिति असहनीय हो गई है और इससे मुक्ति जरूरी है, तो मैं अपने उद्देश्य में सफल हूं। जिनके जीवन में आग लगी हुई है उन पर मेरी पूरी आस्था है कि वे कभी गलती नहीं करेंगे। उन्होंने कभी कोई गलती नहीं की, न तेलंगाना में, न तेनागा में और न नक्सलबाड़ी में। अपना रास्ता वे खुद चुन लेंगे। इस विषय में मैं पूर्ण अनधिकारी हूं। मैं तो जो देख रही हूं, उसका यथातथ्य चित्रण करने की चेष्टा-भर कर रही हूं। जो इस बात से दुखी हैं कि मैं साहित्य-विषयक आलोचना-प्रत्यालोचना के प्रति आग्रही नहीं हूं, उनसे मेरा विनम्र निवेदन है कि अभी तक जितनी बातें मैंने कहीं वे मेरे लिए केवल समाज-व्यवस्था के प्रश्न से संबंधित नहीं हैं, बल्कि साहित्य के संदर्भ में भी उतनी ही सही हैं।
जो यह कहते हैं कि साहित्यिक दृष्टि से मेरी रचनाशीलता व्यर्थ हो रही है, ‘आपरेशन वसाइटुडू’ या ‘स्तनदायिनी’ की शैली-भाषा-शिल्प के निर्माण में मैं विफल हो रही हूं- उनसे मेरा निवेदन है कि अब मुझे साहित्य के शिल्पगत उत्कर्ष का कोई आग्रह नहीं रहा। जो इसमें सक्षम हैं, वे करें। इसके साथ ही विनम्रतापूर्वक यह भी बता दूं कि चूंकि सारा साल दूसरे तरह के क्रियाकलापों में कटता है, इसलिए साहित्य के लिए साहित्यिक ढंग की आलोचना-प्रत्यालोचना के लिए मैं अपने अंदर कोई उत्साह नहीं पाती। इन बातों को बंधुगण मेरी व्यर्थता ही मानें। दरअसल, अपने लेखन को लेकर कोई वक्तव्य प्रस्तुत करना मुझे बड़ा बुरा लगता है।
काफी दिनों से मैं कुछ जन-संगठनों से जुड़ी हुई हूं। जैसे संथाल, मुंडा, लोधाशबर, भूमिज, खेड़ियाशबर जैसे आदिवासी समाज-कल्याण संगठन हैं, वैसे ही कुछ दलित जनकल्याण समितियां और जाति-धर्म-निरपेक्ष ग्रामाधार वाली कल्याण समितियों सहित, पालामऊ जिला भूमिदास मुक्तिमोर्चा और कुछ र्इंट-भट्ठा श्रमिक यूनियनें भी हैं। इन सभी संगठनों में से कई की स्थापना से भी मैं जुड़ी रही हूं- जैसे पालामऊ संगठन और पुरुलिया में स्थापित खेड़ियाशबर कल्याण समिति।

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