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योग से बढ़ाएं रोग प्रतिरोधक क्षमता, पढ़ें कारगर उपाय

आज के जीवन में टॉक्सिन, प्रदूषण, भोजन का गलत चयन तथा नकारात्मक विचार हमारे इम्यून सिस्टम को कमजोर बना देते हैं। पाचन तंत्र का ठीक न होना भी इस रोग का बहुत बड़ा कारण है। आप जो कुछ खाते हैं उसका पचना जरूरी है।

Author July 28, 2019 2:44 AM
इम्यूनिटी को बढ़ाने के लिए योगासन तथा प्राणायाम के साथ-साथ उचित भोजन का चयन भी आवश्यक है।

आधुनिक जीवन शैली में हमारा आहार, विहार, आचरण जिस तरह प्रभावित हुआ है उसका हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम पर बड़ा नकारात्मक असर पड़ा है। जब शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति अंदर से कमजोर हो जाती है तब व्यक्ति जल्दी-जल्दी बीमार पड़ने लगता है। सर्दी, जुखाम, खांसी, बुखार, सिर दर्द आदि बीमारियां लगातार शरीर को जकड़े रखती हैं। आज के जीवन में टॉक्सिन, प्रदूषण, भोजन का गलत चयन तथा नकारात्मक विचार हमारे इम्यून सिस्टम को कमजोर बना देते हैं। पाचन तंत्र का ठीक न होना भी इस रोग का बहुत बड़ा कारण है। आप जो कुछ खाते हैं उसका पचना जरूरी है। जब भोजन ठीक से पच जाता है तब सप्त धातु का निर्माण होता है। भोजन से शरीर में रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा अंतिम धातु शुक्र (वीर्य) बनता है, जो कि शरीर को चलाने में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। अगर हमारा पाचन तंत्र ठीक न हो तो सप्त धातु में दोष आने लगता है, जिसके कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। अत्यधिक चिंता, तनाव, विफल होने का भाव, नींद का पूरा न होना, भय, अविश्वास आदि भी रोग उत्पन्न करने में सहायक हैं। प्रोसेस्ड फूड यानी डिब्बाबंद खाना शरीर के लिए हानिकारक है। जन्म से लेकर दो-तीन वर्ष की आयु तक बच्चों को सबसे अधिक प्रोसेस्ड फूड खिलाया जाता है। इसी उम्र का भोजन बच्चे के स्वास्थ्य की नींव होता है और आगे चल कर इस प्रकार का भोजन बच्चे का इम्यून सिस्टम कमजोर कर देता है।

भोजन द्वारा उपचार
इम्यूनिटी को बढ़ाने के लिए योगासन तथा प्राणायाम के साथ-साथ उचित भोजन का चयन भी आवश्यक है।
’ भोजन वह लें जो सुपाच्य हो। देर से पचने वाला भोजन त्याग दें। दही, छाछ का सेवन अधिक करें।
’ पत्तेदार सब्जियां जो कि एंटी ऑक्सीडेंट होती हैं। पचने में सरल हैं, जो कि सप्त धातु को बनाने में सहायक होती हैं।
’ पांच ग्राम दालचीनी एक कप गरम पानी में दिन में कभी भी सेवन करें।
’ लहसुन शरीर का विष निकालने में अत्यधिक सहायक है। रात को सोने से पहले एक से दो कली लहसुन की चबा कर या पीस कर ठंडे पानी के साथ पंद्रह से बीस दिन तक लगातार लें।
’ पंद्रह से बीस बादाम रात को पानी में भिगो दें और सुबह उनका छिलका उतार कर चबाएं।
’ मशरूम और ब्रोकली का सूप या फिर सब्जी बना कर दो बार सप्ताह में जरूर प्रयोग करें।
’ कच्ची हल्दी एंटीफंगल होती है। इसका दो चम्मच रस प्रतिदिन सुबह खाली पेट लें तथा दशहरे के बाद की पहली पूर्णमासी से लेकर होली के बाद की पूर्णमासी तक प्रति रात सोने से पहले एक चम्मच तवे पर भुनी हुई हल्दी या सामान्य हल्दी का पाउडर एक गिलास गाय के दूध के साथ पीकर सो जाएं और सुबह तक पानी न पीएं। यह नुस्खा आपके इम्यूनिटी को अत्यधिक शक्तिशाली बना देगा और पूरे वर्ष सर्दी, खांसी, जुकाम,बुखार नहीं होने देगा तथा साइनस को समाप्त कर देगा।
’ अदरक पाचन तंत्र को ठीक रखता है, भूख बढ़ाता और रक्त को पतला बनाता है, जिससे कि शरीर में रक्त संचार अच्छा बना रहता है। साथ ही तुलसी अश्वगंधा का भी प्रयोग लाभकारी है। श्वेत रक्त कणिका मशरूम से बनती हैं। चुकंदर, गाजर का सेवन लाल रक्त कणिकाओं को बढ़ाता है।
’ इम्यून सिस्टम को अत्यधिक बलशाली बनाने में गिलोय की भूमिका सबसे अधिक है। गिलोय का रस, चूर्ण, गोली का सेवन डॉक्टर के परामर्श अनुसार जरूर करना चाहिए।

योगासन द्वारा उपचार
वैसे तो सभी आसन शरीर को लचीला सुदृढ़ तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने में सहायक होते हैं, लेकिन कुछ विशेष आसन इम्यूनिटी बढ़ाने में अत्यधिक सहायक होते हैं। दस से पंद्रह दिन तक ही आसन करने से इसका लाभ आपको दिखना आरंभ हो जाता है।

पश्चिमोत्तानासन: समतल जमीन पर बैठें। दोनों पैर सीधे रखते हुए कमर सीधी रखें। गहरी लंबी सांस भरते हुए दोनों हाथों को एक साथ ऊपर उठाते हुए ले जाएं। श्वास छोड़ते हुए आगे की ओर झुकें तथा पंजों को हाथों से पकड़ लें। जितना सरलता पूर्वक आगे की ओर झुक सकें झुक जाएं और माथे को घुटने से छूने का प्रयास करें। दो-तीन मिनट तक सरलता पूर्वक रुकें। श्वास सामान्य रखें तथा ध्यान शरीर के खिंचाव तथा दबाव पर रखें। जिस प्रकार से आसन आरंभ किया था, उसी विपरीत क्रम से आसन को समाप्त करें।

धनुरासन: पेट के बल लेट कर पीछे से दाएं पैर के टखने को दाएं हाथ से तथा बाएं पैर के टखने को बाएं हाथ से पकड़ें। गहरा लंबा श्वास भरते हुए आगे से छाती और कंधों को तथा पीछे से दोनों पैरों और जांघों को ऊपर उठा दे और पैरों को आकाश की दिशा में ले जाएं और सांस को सामान्य छोड़ दें। तीन से पांच मिनट तक करें। इस आसन को एक मिनट से शुरू करते हुए तीन से पांच मिनट तक करने का अभ्यास बनाएं। आसन में ध्यान नाभि केंद्र पर रखें और जैसे हृदय में धड़कन होती है ऐसा ही नाभि में भी महसूस करें।

सर्वांगासन: पीठ के बल लेट कर दोनों हाथों का सहारा लेते हुए अपने दोनों पैरों तथा कमर को ऊपर की ओर उठा दे इस स्थिति में शरीर का सारा भजन दोनों कंधों, गर्दन तथा सिर पर आ जाएगा और एनर्जी का प्रभाव सिर की ओर हो जाएगा। इस स्थिति में सिर तथा गर्दन को सीधा रखें। दाएं-बाएं मोड़ने का प्रयास न करें। एक मिनट से रुकते हुए तीन से पांच मिनट तक इस आसन का अभ्यास करें

हलासन: सर्वांगासन की ही स्थिति में रहते हुए दोनों पैरों को सिर के पीछे जमीन पर टिकाने का प्रयास करें। शरीर में सबसे अधिक दबाव गर्दन तथा कंधों पर आएगा और खिंचाव रीढ़ की हड्डी में अनुभव होगा। ठोड़ी से थायराइड ग्लैंड पर दबाव बनेगा। श्वास सामान्य गति से रखें। लगभग तीन से पांच मिनट तक रोकने का प्रयास करें। वापस आने के लिए दोनों हाथों को जमीन पर रखते हुए सहारा लें और धीरे-धीरे कमर, नितंब तथा दोनों पैरों को सहज भाव से जमीन पर ले आएं। पांच से दस बार गर्दन को दाएं से बाएं मोड़ें जिससे की गर्दन में कोई खिंचाव या दबाव न रह जाए।

शीर्षासन: इस आसन का अभ्यास योग शिक्षक की उपस्थिति में ही करें अन्यथा हानि हो सकती है। शीर्षासन को करने के लिए शक्ति से ज्यादा आत्मविश्वास तथा संतुलन की आवश्यकता है। जमीन पर कंबल या फिर आधा इंच मोटी सूती चादर बिछा लें। सिर पर जहां से बाल शुरू होते हैं वहां से चार अंगुल पीछे अपने दोनों हाथों की उंगलियों को कस कर आपस में जकड़ें। जमीन पर सिर को धीरे से रखें। दोनों कोहनी हाथों की कुछ उंगलियां और सिर का अग्रभाग जमीन पर टिका दें। तब धीरे-धीरे संतुलन बनाते हुए दोनों पैरों, कमर, छाती पूरा शरीर हवा में उठाते हुए आकाश की ओर ले जाएं। शरीर का सारा वजन सिर, कंधों तथा हाथों पर रहेगा। ध्यान रहे, गर्दन पर दबाव बिल्कुल न रहे। संतुलन बनाते हुए दो से पांच मिनट तक इस आसन में रुकने का अभ्यास करें। वापस आते समय जैसे धीरे-धीरे ऊपर की ओर गए थे, वैसे ही धीरे-धीरे नीचे आ जाएं। शीर्षासन के तुरंत बाद तीन मिनट के लिए शवासन अर्थात पीठ के बल आंख बंद करके लेट जाएं।

प्राणायाम
कपालभाति: कमर सीधी रखते हुए दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा या चिन मुद्रा में रखें। धीरे-धीरे श्वास को नाक से बाहर छोड़ने की कोशिश करें। श्वास लेने की आवाज न आए, बल्कि श्वास छोड़ने की आवाज तीव्र गति से आए। जैसे छींकते हैं ऐसी ही आवाज कपालभाति प्राणायाम करते समय आए।

भस्त्रिका प्राणायाम: तीव्र गति से श्वास अंदर बाहर करना है। श्वास अंदर लेते हुए पेट बाहर तथा श्वास छोड़ते समय पेट अंदर रखें। इस प्राणायाम से फेफड़ों की शुद्धि तथा अत्यधिक शक्ति मिलती है।

उज्जाई प्राणायाम: नाक से गहरी लंबी श्वास भीतर लेते और छोड़ते हुए अपनी ग्रीवा की अंतरंग मांसपेशीयों को सख्त करें तथा ग्रीवा में कंपन महसूस करें।

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