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सेहत: चुस्ती-फुर्ती के नाम पर देह पर अत्याचार, नकल से नहीं अक्ल से लें काम

कुदरत ने हम सबको अलग बनाया है। लेकिन बाजार ने हम पर दबाव बनाया कि हम सब एक जैसे और एक खास उम्र के ही दिखें। लेकिन कोरोना के समय हमें यह अहसास फिर से हुआ कि हम अपनी मूल शारीरिक बनावट के साथ ज्यादा छेड़खानी न करें।

healthखुद को फिट रखने के लिए कुदरती व्यवस्था को स्वीकारें, बाजारू चमक-दमक से न प्रभावित हों।

पिछले हफ्ते इस स्तंभ में बात की गई थी कि किस तरह से हमने अपनी सेहत के मानदंडों को बाजार के हवाले कर दिया है। जिसका बुरा असर हम सब पर पड़ा है। कोरोना के समय ने हमें घर के अंदर बंद कर अहसास कराया कि हमारे खाद्य पदार्थ खेत और रसोई के बीच जितना कम सफर करें उतना बेहतर। बाजार ने हमारी मानसिकता पर एक और कब्जा जमाया था शरीर के आकार-प्रकार को लेकर। कुदरत ने हम सबको अलग बनाया है। लेकिन बाजार ने हम पर दबाव बनाया कि हम सब एक जैसे और एक खास उम्र के ही दिखें। लेकिन कोरोना के समय हमें यह अहसास फिर से हुआ कि हम अपनी मूल शारीरिक बनावट के साथ ज्यादा छेड़खानी न करें।

उतर गया वजन का बोझ
पूर्णबंदी के दौरान एक विदेशी मॉडल ने अपनी दो तरह की वीडियो साझा की। एक में उसका चर्बीमुक्त सपाट पेट, तो दूसरे में वो सांस छोड़ते हुए अपने पेट को सामान्य करती दिखाई दी। विज्ञापन की शूटिंग के दौरान उसने सांसें रोक कर अपने पेट को सपाट दिखाने की कोशिश की थी। मॉडल ने अपना दूसरा वीडियो यह दिखाने के लिए साझा किया कि विज्ञापन में दिख रहा उसका चर्बीमुक्त शरीर एक भ्रम है और लोगों को वैसा शरीर पाने की बेकार कोशिश नहीं करनी चाहिए।

पूर्णबंदी के दौरान प्रसाधन गृहों से दूर रहकर बहुत से भारतीय कलाकारों ने भी अपने असली रूप को बेबाक तरीके से जनता के सामने रखा। घर में रहने और बेहतर खान-पान के कारण लोगों का शरीर सेहतमंद हुआ तो फिर ‘जीरो फिगर’ का शिगूफा भी सिर से उतर गया। अदाकार भी अपने बढ़े वजन को लेकर सहज हुए और उसी रूप में जनता के सामने आए। घर पर बने वीडियो और न्यूनतम संपादन के कारण दर्शकों ने भी उनकी हकीकत को स्वीकार कर लिया। मोटापा अपने आप में एक बीमारी है और बीमारी पर किसी का बस नहीं चलता। लोग इससे बचने के उपाय कर सकते हैं लेकिन पूरी तरह बच नहीं सकते हैं।

बहुत लोग सारे उपाय कर भी पतले नहीं हो पाते हैं क्योंकि उनके शरीर का गुणसूत्र अलग होता है। लेकिन अब लोगों को बात समझ आ गई है कि शरीर को स्वस्थ रखना है और ‘फिटनेस’ के विज्ञापन से दूर रहना है।

बालों की सफेदी से भी प्यार
उम्र बढ़ना और बालों का सफेद होना जीवन का सबसे बड़ा सच है। लेकिन सुंदरता की आधुनिक अवधारणा ने इस सबसे बड़े सच पर खिजाब की परतें डाल दीं। कोई भी अपने सिर पर सफेद बाल नहीं बर्दाश्त करना चाहता है और बालों को रंगने वाले रसायन कितना नुकसान पहुंचाते हैं, यह जानते हुए भी उसे अपनाता है। घरबंदी ने लोगों को अपने सफेद बालों को लेकर सहज बना दिया और बहुत से लोगों ने फैसला किया कि अब वो अपने बालों को रंगना छोड़ देंगे। लोग अपने सफेद बालों के साथ गर्वीली सेल्फी लेते हैं और उसे सोशल मीडिया पर डाल पहले से ज्यादा दिल के निशान बटोरते हैं।

तंग कपड़ों को ना
हमने अपने घर के बाहर की दुनिया तंग कपड़ों की बना ली थी। सब कुछ कसा हुआ होने के चक्कर में शरीर कितना परेशान होता था इस पर तवज्जो ही नहीं देते थे। कोरोना के समय में जींस (डेनिम के कपड़े) बनाने वाली एक कंपनी ने चिंता जाहिर की कि उसके उत्पादों की मांग इतनी कम हो गई है कि उसका बाजार में टिके रहना मुश्किल हो गया है। लोगों ने डेनिम के कपड़ों की खरीद बिल्कुल ही बंद कर दी है।

कोरोना के समय लोगों ने सबसे ज्यादा आरामदायक पायजामों की खरीद की, जिनकी घर में सबसे ज्यादा जरूरत थी। बहुत सी महिलओं ने अपने अनुभव बांटते हुए कहा कि कसे हुए अंत:वस्त्रों को न पहनने के कारण उनके शरीर की बहुत सी समस्या ठीक हुई। खास कर कसी जींस कमर दर्द को बढ़ा देती थी और उस कारण त्वचा को भी नुकसान पहुंचता था।

ऊंची एड़ी वाले जूते भी अब चलन से बाहर हो रहे हैं। लोगों को समझ आ गई है कि इन्हें पहन कर अदाकारी करना जितना आसान है, इनके साथ असल जिंदगी की कदमताल करना उतना ही मुश्किल। जूते बनाने वाली कंपनियां अब आरामदायक डिजायनों पर ही ज्यादा से ज्यादा प्रयोग कर रही हैं। उम्मीद है कि कोरोना के समय शरीर पर से बाजारू सुंदरता के जिस बोझ को कम किया गया है, वह आगे भी कायम रहेगा।

(यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। उपचार या स्वास्थ्य संबंधी सलाह के लिए विशेषज्ञ की मदद लें।)

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