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स्वास्थ्य: कोरोना ने बदला पौष्टिकता का पैमाना, सेहत की आड़ बाजार की मार

आइ एम ए कांप्लान ब्यॉय। इन्हें चाहिए झंडु केसरी जीवन। ये क्या हाल बना रखा है कुछ लेते क्यों नहीं? इन्हें चाहिए हेल्थ का टॉनिक सिंकारा…। नब्बे के दशक में टीवी पर आने वाले इन विज्ञापनों के जुमले हमारी जुबां पर होते थे। उदारीकरण ने हमारी रसोई को डायनिंग टेबल में तब्दील कर दिया था […]

सेहतसेहत के लिहाज से पौष्टिकता और स्वाद दो अलग-अलग जरूरते हैं।

आइ एम ए कांप्लान ब्यॉय। इन्हें चाहिए झंडु केसरी जीवन। ये क्या हाल बना रखा है कुछ लेते क्यों नहीं? इन्हें चाहिए हेल्थ का टॉनिक सिंकारा…। नब्बे के दशक में टीवी पर आने वाले इन विज्ञापनों के जुमले हमारी जुबां पर होते थे। उदारीकरण ने हमारी रसोई को डायनिंग टेबल में तब्दील कर दिया था और सेहत का पूरा फलसफा बदल गया था। ब्रेड जैम, दूध-कॉर्नफ्लेक्स, हेल्थ ड्रिंक घर के बजट का अहम हिस्सा होने लगे थे।

‘बेबी फूड’ की कड़ियों ने नई मां के पोषण की समझ को बाजार के हवाले कर दिया था। पति-पत्नी के दो से तीन होते ही सेरेलेक उनके घर का हिस्सा नहीं बना तो वो विकास के दौर में पिछड़े हुए साबित होने लगते थे। दो मिनट की मैगी तो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मिलने लगी थी। डिब्बाबंद खाद्य-पदार्थ संभ्रांतता और सेहत का पैमाना हो गए थे।

घर की रसोई
उदारीकरण के दौर के सेहत के बनाए पैमाने को इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में कोरोना ने बदल दिया। इस बीमारी ने सबसे पहले हमारे खाने की थाली पर सवाल उठाए। अचानक से घर का खाना इस समय में सबसे ज्यादा बोला जाने वाला शब्द हो गया।

पूर्णबंदी का पूरा दबाव हिंदुस्तानी घरों की रसोई पर पड़ा। समोसे और जलेबी जिन्हें गली पकवान का तमगा दे दिया गया था रसोई की कड़ाही में छनने लगे। खेत से निकलने के बाद खाना हमारे पेट तक पहुंचने में जितना कम सफर तय करे उतना अच्छा माना जा रहा है।

खेत-खलिहान से दूर हुए लोग अपने अपार्टमेंट की छतों और बालकोनी में बैंगन, मिर्च, टमाटर उगा के खुश हो रहे हैं। अचानक से लोगों को अपने गांव की याद आने लगी कि घर के आंगन में ही सब्जी से लेकर दूध-दही-पनीर तक का इंतजाम हो जाता था। इन सबको लाने के लिए कभी बाजार जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। कोरोना जैसी बीमारी वैश्विक बाजार की देन है तो एक बात तो सीधे-सीधे समझ आने लगी कि सेहत को बाजार से जितना दूर रखा जाए उतना अच्छा।

यूरोप के डिब्बाबंद खाने की संस्कृति ने ‘सॉसपेन’ को सबसे लोकप्रिय वैश्विक बर्तन बना दिया था। सॉसपेन का काम खाना बनाना नहीं सिर्फ उसे गर्म करना होता है। जब रसोईघर का इस्तेमाल सिर्फ खाना गर्म करने के लिए होने लगा तो उसके दुष्परिणाम भी दिखने लगे। कोरोना ने रसोई को फिर से कड़ाही और हांडी से सुसज्जित कर दिया। हां, खाना बनाना सिर्फ औरतों का काम नहीं यह सेहतमंद सीख तो पुरुषों को मिल ही गई है।

पीढ़ी की सीढ़ी
इन दिनों कहा गया कि इंसान का खाना गुफा मानव की तरह का होना चाहिए। यानी कुदरत से निकलने के बाद उसमें कम से कम बदलाव हो। खाद्य पदार्थ की पहली पीढ़ी सबसे अच्छी है। जौ से लेकर रागी तक के जलवे हो गए हैं और कई रूप बदल कर अपनी चिकनाई पर इतराने वाला मैदा खलनायक घोषित किया जा चुका है। एक समय में हर रसोई की आवश्यक जरूरत बना दिया गया रिफाइंड तेल सेहत के लिए खतरनाक घोषित किया जा चुका है और घर में बने सफेद मक्खन और घी बिना किसी हिचक के उदरस्थ किए जा रहे हैं। घी जो नानी-दादी की कहानी में सिमटा जा रहा था अब नई पीढ़ी के खाने में सेहतमंद सुगंध घोल रहा है।

बहुरूपिया बाजार
नब्बे के दशक में हेल्थ वाला बाजार कोरोना काल में इम्युनिटी में बदल गया है। ‘हल्दी लैटे’ बाजार का नया शिगूफा है और कंपनियां तो अब साबुन और शैंपू को भी इम्युनिटी बूस्टर के नाम से बेच रही हैं। एक राजनेता ने भाभीजी के पापड़ को कोरोना से बचाव के नाम पर विज्ञापित किया, हालांकि दुखद पहलू यह रहा कि नेताजी खुद भी कोरोना से पीड़ित हो गए। किसी पांच सितारा होटल से लेकर गली-मोहल्ले के रेस्तरां तक सबसे ज्यादा बेची जाने वाली चीज इम्युनिटी ही है। पता नहीं कितने तरह का काढ़ा बाजार में आ गया और हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना दिया गया। आज हमें अपनी सेहत को इस बाजारू इम्युनिटी से सुरक्षित करने की जरूरत है। ‘बाजारू इम्युनिटी खतरे जान’ को मान कर अपनी रसोई की बुनियाद पर टिके रहिए।

इम्युनिटी किसी खाने-पीने की चीज से एक दिन में बनने वाली चीज नहीं है। यह एक जीवन पद्धति है। मुलेठी से लेकर गिलोय तक जब बाजारू चमक के साथ हम पर थोपे जा रहे हैं तो इसकी चकाचौंध से बचने की जरूरत है। ‘इम्युनिटी की इमरजेंसी’ जैसे माहौल में अपना प्रतिपक्ष और स्वाभाविक विवेक बनाए रखें।

(यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। उपचार या स्वास्थ्य संबंधी सलाह के लिए विशेषज्ञ की मदद लें।)

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