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संस्कृति: असम का जातीय पर्व बिहू

असम में बिहू मनाने की प्रथा आज भी परंपरागत रूप से चल रही है। गांव और बस्तियों में थोड़ी बहुत नाचती-गाती बिहू टोली नजर आ जाती है। लोग हुसोरी और नृत्य में भाग भी ले रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रचलन पहले की तुलना में बहुत कम हो गया है।

Author April 14, 2019 1:55 AM
बोहाग बिहू की शुरुआत होती है गोरू बिहू से, जो कि आमतौर पर 14 अप्रैल, संक्रांति के दिन पड़ता है।

नूतन पांडेय

पूरे भारत में लोग बसंत की अगवानी हर्षोल्लास से करते हैं, पर प्रकृति की गोद में बसे असम में बोहाग यानी वसंत के स्वागत का अपना ही ढंग है। एक महीने के लिए असम की धरती खुशी और उल्लास का चादर ओढ़ लेती है। पहले बोहाग आदरनी यानी स्वागत किया जाता है और फिर माह के अंत में बोहाग विदाई की जाती है। इस पूरे काल में सब कुछ रंगीन हो उठता है।

खुशियों का पर्व है ‘बोहाग बिहू’। ‘बोहाग’ इस ऋतु में प्रकृति उदासी के बाद पुन: प्रफुल्लित हो अपने सौंदर्य की ओर लौटने लगती है। असम की वादियां अलग-अलग हरे रंगों से मुखर हो उठती हैं। ऋतुराज बसंत अपने आगमन के साथ लाता है प्रकृति में एक नयापन। आमों में बौर लगने के साथ ही अमराई में कोयल की कूक गूंजने लगती है। वातावरण नाहर और केतकी की खुशबू से सुगंधित हो उठता है। लोग अनायास ही कह उठते हैं- ‘बिहू बिहू लागिसे’। असम पूर्वोत्तर का एक ऐसा राज्य है, जहां आमतौर पर वर्ष में एक ही मुख्य फसल होती है। प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध यह राज्य अत्यधिक वर्षा को भोगता है। प्रकृति यहां हमेशा प्रफुल्लित और खिली-खिली नजर आती है। ऐसी खुशहाल प्रकृति की गोद में बसे असमी समाज का मुख्य पर्व है ‘बिहू’। यह वास्तव में ग्रामीण जीवन से जुड़ा पर्व है। वर्ष का प्रारंभ होता है ‘बोहाग बिहू’ से। इसे ‘रंगाली बिहू’ भी कहते हैं। चैत संक्रांति के दिन से यह प्रारंभ होता है। पौराणिक परंपराओं पर आधारित बिहू वास्तव में एक ‘लोक-पर्व’ है।

पूरे वर्ष में तीन बार बिहू मनाया जाता है। नववर्ष का शुभारंभ ‘रंगाली बिहू’ या ‘बोहाग बिहू’ से होता है। इसमें सुख-समृद्धि की कामना के साथ लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। ‘हुसोरी’ गाकर सर्वमंगल की कामना की जाती है। दूसरा है ‘काति बिहू’, जिसे ‘कंगाली बिहू’ भी कहते हैं। यह कार्तिक महीने में होता है। इस समय तक खेतिहर अनाज से कंगाल होने लगते हैं यानी उनका हाथ खाली होने लगता है। चूंकि आमदनी का वही एक माध्यम होता है, इसलिए इसे कंगाली बिहू कहते हैं। तीसरा है ‘माघ बिहू’ या ‘भोगाली बिहू’। यह मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है और इस समय धान की कटाई होने लगाती है। लोग इस खुशी को विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का स्वाद लेकर जाहिर करते हैं, खासकर धान के बने पकवान और व्यंजन। रंगाली बिहू अलग ही रंग लेकर आता है। नवजीवन का सूचक वसंत यानी बोहाग। पतझड़ के बाद बहार पुनर्जीवन का संदेश लाती है। रात्रि के प्रथम पहर में कोयल की कूक नव-प्रभात का पैगाम छेड़ती है। प्रकृति का सूखा मुर्झाया चेहरा खिल उठता है। बोहाग के आगमन के साथ ही संपूर्ण असम खुशी की तरंग में झूमने लगता है।

बोहाग बिहू की शुरुआत होती है गोरू बिहू से, जो कि आमतौर पर 14 अप्रैल, संक्रांति के दिन पड़ता है। इस दिन ग्रामीण अपनी गायों और मवेशियों को नदी में स्नान कराते हैं। उनकी रस्सी बदल कर उन्हें सजाया जाता है और पूजा कर उन्हें बैगन, लौकी आदि सब्जी खिलाते हैं। फिर प्रवेश होता है वैशाख के प्रथम दिन का, जिसे ‘मानुह बिहू’ कहते हैं। इसमें लोग पूरे हर्षोल्लास के साथ बड़ों को प्रणाम कर वस्त्र भेंट करते और उन्हें भोजन कराते हैं। घर के सभी सदस्य नया कपड़ा धारण करते हैं। एक-दूसरे के घर बिहू मिलने और खाने जाते हैं। तरह-तरह के पीठा और पकवान बनाए जाते हैं जो सामान्यत: चावल, तिल, नारियल और गुड़ से बनाए जाते हैं। इस विशेष दिन एक सौ एक प्रकार की साग-सब्जियों को एक साथ मिला कर पकाया जाता है, जिसमें अनेक जड़ी बूटियां भी शामिल होती हैं। भोजन के बाद घर की मां या भाभी आने वाले पुरुषों को सम्मान स्वरूप गमछा प्रदान करती हैं। संक्रांति के तीसरे दिन आता है ‘गोसांई बिहू’। इस दिन देवताओं को बिहू का प्रसाद भोग लगाया जाता है। फिर पूरे महीने लोग तरह-तरह से अपने उद्गार प्रकट करते हैं। मानुह बिहू के साथ ही रंगाली बिहू में आता है एक नयापन। ‘हुसोरी’ (बिहू में गाया जाने वाला एक प्रकार का गीत) का स्वर चारों ओर गूंजने लगता है। हुसोरी घर-घर जाकर गाया जाता है। इस विशेष प्रकार के गीत को लोग टोली में ढोल, पेंपा, गमेना आदि के धुन के साथ स्वर मिला कर गाते हैं। यह टोली दरवाजे पर जाकर गोल घेरा बना कर घूम-घूम कर गीत गाती है और फिर गृहस्थ को आशीर्वाद देती है। लोग उन्हें पैसा देते हैं और उनसे शुभकामनाओं की उम्मीद के साथ आशीष ग्रहण करते हैं।
बिहू आरंभ होते ही प्रकृति की गोद में बसे इस राज्य में नवयुवक-नवयुवतियों का उत्साह देखते बनता है। पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर ये लोग समूहों में बाहर आते हैं। प्रेम और प्रणय के गीत वातावरण में गूंज उठते हैं और उन्हीं गीतों की लय पर युवक-युवतियों का समूह नाचते हुए घर-घर घूमा करता है। यह समूह नृत्य ‘मुकोली’ कहलाता है।

असम में बिहू मनाने की प्रथा आज भी परंपरागत रूप से चल रही है। गांव और बस्तियों में थोड़ी बहुत नाचती-गाती बिहू टोली नजर आ जाती है। लोग हुसोरी और नृत्य में भाग भी ले रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रचलन पहले की तुलना में बहुत कम हो गया है। अब तो बिहू आदरणी और बिहू विदाई के नाम से उत्सव को स्टेजों पर पेश किया जाने लगा है। कभी बोहाग आने की तैयारी में पेड़ों के नीचे अपनी छाया को देख कर ‘नाचोनी’ अभ्यास में लग जाती थी, जबकि अब बंद कमरों और बिहू कक्षाओं में सीखने और सिखाने का सिलसिला शुरू हो गया है। अब गली-गली गूंजने वाले हुसोरी और गीत के बोल गांवों के गलियारों में कम ही सुनाई देते हैं। जबकि कुछ वर्ष पहले तक इसे ऊपरी असम के गलियों और मुहल्लों में रात भर सुना और देखा जा सकता था। समय के साथ-साथ भले बिहू पर्व को मनाने में कुछ बदलाव आया हो, पर इसके प्रति लोगों का प्रेम और गहराया ही है और बिहू नृत्य तो देश-विदेश में आज असम संस्कृति का प्रतीक बन चुकी है। यहां का समाज विभिन्न जातियों-जनजातियों का मिलाजुला संगम होने के कारण उनकी प्रथाओं से प्रभावित था, बल्कि कुछ हद तक आज भी है। जनजातीय संस्कृति की छाप आज भी देखी जा सकती है। हालांकि आज बहुत बदलाव आ गया है। पहले यहां यह आम प्रथा थी कि बिहू के नृत्य-गीत के साथ युवक-युवतियों का प्रेम परवान चढ़ता और वे आगे-पीछे की परवाह किए बगैर बिहू टोली से ही एक-दूसरे के साथ हो लेते। साथ ही गीत के बोल में जो उन्मुक्त यौवन का वर्णन और प्रेम का इजहार होता है उससे भी उत्तेजना पैदा होती है। ऐसे में संपन्न घरों की महिलाएं अपने आंगन में ही झेंग बिहू गाकर उत्सव का आनंद उठाती थीं। रंगाली बिहू के शुभारंभ पर पूरे वर्ष के लिए असम के सुख-समृद्धि की मंगलकामना की जाती है। मान्य है कि नृत्य की थाप पृथ्वी को सम्मान प्रदान करती है और पैरों के भार से जमीन उर्वर होती है। वर्ष के इस प्रथम दिन वर्षा अगर अपनी बूंदें बिखेर जाती है तो यह अच्छी फसल का सूचक माना जाता है। सावन में आने वाली बहार का प्रथम बीज यहीं से पनपना शुरू होता है। आज बिहू का रंग बदल रहा है। लोगों ने इसे सामजिक मान्यता देकर असम का जातीय यानी राष्ट्रीय पर्व मान लिया है। बिहू नृत्य अब खेतों और मैदानों से स्टेज पर आ गया है। अब लोग गांव में पेड़ों तले बिहू टोली नहीं सजाते, बल्कि बिहू नृत्य स्टेजों के चबूतरे पर सीमित होता जा रहा है।

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