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शख्सियत: बिपिन चंद्र पाल

देश की आजादी में गरम दलों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। गरम दल में लाल-बाल-पाल के योगदान को देश आज भी याद करता है। इस तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बिपिन चंद्र पाल क्रांतिकारी विचारों के जनक माने जाते हैं।

Author Published on: November 4, 2018 6:18 AM
बिपिन चंद्र पाल

देश की आजादी में गरम दलों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। गरम दल में लाल-बाल-पाल के योगदान को देश आज भी याद करता है। इस तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बिपिन चंद्र पाल क्रांतिकारी विचारों के जनक माने जाते हैं। बंगाल के सिलहट में जन्मे बिपिन चंद्र पाल एक लेखक, वक्ता, पत्रकार, राष्ट्रवादी नेता और शिक्षक थे। उनके पिता रामचंद्र पाल एक जमींदार थे।

जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ाई
बिपिन चंद्र पाल ने देश को जातीय भेदभाव से मुक्ति दिलाने का भी काम किया। इसकी शुरुआत उन्होंने सबसे पहले खुद से की। इसी कड़ी में उन्होंने एक ऐसी विधवा महिला से विवाह किया, जो उनसे ऊंची जाति की थी। पाल के इस कदम से उन्हें घर से निकाल दिया गया। इन दबावों के बावजूद उन्होंने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ना बंद नहीं किया।

शिक्षा
बिपिन चंद्र पाल की शुरुआती शिक्षा सिलहट में हुई। बाद में वे उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता गए और प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया, पर वे स्नाकोत्तर पूरा नहीं कर पाए। बाद में उन्होंने चर्च मिशन सोसायटी कॉलेज (अब सैंट पॉल कैथड्रील मिशन कॉलेज) में पढ़ाया और कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी में पुस्तकाध्यक्ष भी रहे।

स्वराज को बढ़ावा
पहली बार स्वराज का लिखित प्रयोग स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया था, लेकिन स्वराज को जनआंदोलन लाल-बाल-पाल ने ही बनाया। बिपिन चंद्र पाल 1886 में कांग्रेस में शामिल हुए। उन्होंने देश में स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की नीति अपनाई थी।

उग्र विचारधारा से किया किनारा
जब क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा ने 1909 में कर्जन वाइली की हत्या कर दी, तब ‘स्वराज’ का प्रकाशन बंद कर दिया गया। इस घटना के बाद बिपिन चंद्र पाल को बहुत दुख हुआ और उन्होंने खुद को उग्र विचारधारा से अलग कर लिया।

सांप्रदायिक सौहार्द की समझ
बिपिन चंद्र पाल ने अपनी आत्मकथा ‘सत्तार बतसार’ में अपने बचपन की घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि जब वे छोटे थे तब उस कारखाने में जाकर नीबू पानी पीया करते थे, जहां मुसलिम काम करते थे। एक बार उनके पिता ने उन्हें वहां नीबू पानी पीते देख लिया और जम कर पिटाई की। लेकिन जब बिपिन बीमार पड़े तो उन्हें डॉक्टर ने नींबू पानी पीने की सलाह दी। उनके पिता ने उन्हें नींबू पानी लाकर दिया। साथ ही कहा कि दवा ईश्वर के रूप की तरह होती है। इसके लिए शुद्ध-अशुद्ध कुछ नहीं होता। इस घटना के बाद बिपिन के मन मैं सांप्रदायिक सौहार्द की भावना पनपी।

पत्रकारिता
देश में सामाजिक जागरूकता और देशभक्ति की भावना का प्रचार करने के लिए बिपिन ने पत्रकारिता का सहारा लिया। उन्होंने लोगों में राष्ट्रवाद की भावना प्रबल करने के लिए कई पत्रिकाएं। उनकी प्रमुख पुस्तकों में स्वराज और वर्तमान स्थिति, हिंदुत्व का नूतन तात्पर्य, भारतीय राष्ट्रवाद, भारत की आत्मा, राष्ट्रीयता और साम्राज्य, सामाजिक सुधार के आधार और अध्ययन शामिल है। वे डेमोक्रेटिक, इंडिपेंडेंट और कई अन्य पत्रिकाओं और समाचारपत्रों के संपादक रहे; परिदर्शक, न्यू इंडिया जैसी पत्रिकाएं शुरू की थीं।

निधन: बिपिन चंद्र पाल का निधन 20 मई, 1932 को कोलकाता में हो गया।

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