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स्वराज की अहमियत और जनमन

सभी राजनीतिक विचारधाराएं मानव कल्याण का दावा करती रही हैं। लेकिन, व्यवहार में कोई भी विचारधारा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरी और समय के साथ सबकी खामियां उजागर हुर्इं। स्वराज और गांधीवाद को लेकर भी भारत में कई तरह के किंतु-परंतु रहे हैं। नए संदर्भ में इस बारे में बता रहे हैं मनोज त्यागी।

Author January 15, 2017 1:48 AM
मार्गरेट बर्क व्हाइट ने महात्मा गांधी की चरखे के साथ तस्वीर 1946 में ली थी। (स्क्रीनग्रैब)

मनोज त्यागी

दुनिया में जितनी किस्म की राजनीतिक-आर्थिक विचारधाराएं हैं- मसलन, पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद और यहां तक कि गांधीवाद भी। इनके मेल से बनी दूसरी विचारधाराएं-जैसे, मध्यमार्गी विचारधारा, उन सभी के पास अपना एक सुनिश्चित और सुचिंतित अर्थशास्त्रीय सिद्वांत भी है। इस मामले में स्वराज की विचारधारा कुछ दबी हुई दिखती है। हालांकि, स्वराज की राजनीतिक-आर्थिक विचार को मानने वालों की संख्या दूसरे किसी भी विचारधारा को मानने वालों से कम नहीं है। भारत में तो इस विचारधारा का बोलबाला रहा है। स्वराज की विचारधारा मूलरूप से भारतीय है। जैसे पूंजीवाद और साम्यवाद जैसा विचारधाराएं यूरोप की मिट्टी में उपजीं, वैसे ही स्वराज भारत की मिट्टी में जन्मा है। यह विचारधारा उस व्यवहार से निकली जो भारतीयों के कर्म से रची-बसी थी।
अंग्रेजों से पहले यहां स्वराज का विचार ही व्यवहार में था और यह समग्र आर्थिक राजनीतिक और सांस्कृतिक दर्शन समेटे हुए था। बुनियादी रूप से यह व्यवहार सामुदायिकता, सहकार और संयम पर टिका था। आर्थिक क्रियाकलाप और उपभोग इन्हीं मूल्यों के द्वारा संचालित होते थे। गांधी ने जब स्वराज और स्वदेशी को एक ही सिक्के के दो पहलू कहा था तो उन्होंने इस विचार के आर्थिक दर्शन को और स्पष्ट करने की कोशिश की। आजादी के आंदोलन में स्वराजवादियों की बड़ी तादाद थी।

स्वराज का क्या अर्थशास्त्र होना चाहिए, इस पर विचार के लिए कुछ बिंदु, जो देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुकूल हो, रखे जा सकते है। पहला-जल, जंगल, जमीन, खनिज, जैवविविधता जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व का है। स्वराज के अर्थशास्त्र में इन बुनियादी संसाधनों पर समुदाय का स्वामित्व होना चाहिए। हालांकि प्रकृति-प्रदत्त चीजों पर स्वामित्व का सवाल अटपटा सा लगता है। कोई भी व्यक्ति या समुदाय खुद कमाई गई या सृजित की गई संपत्ति का ही स्वामी हो सकता है। प्रकृति-प्रदत्त चीजों पर व्यक्ति या समुदाय का मालिकाना नैतिक रूप से इसलिए गलत है क्योंकि उनके उपभोग पर मनुष्य सहित पूरे जीव जगत का बराबर का अधिकार है और वे सभी इनके मालिक है।

पर ब्रिटिश शासन ने जब निजी संपत्ति के विचार को भारत में लागू किया तो उन्होंने इसका विस्तार करके जल, जंगल, जमीन और खनिजों को भी संपत्ति बना दिया और उस पर राज्य का स्वामित्व घोषित कर दिया। आजाद भारत में ऐसी कोई संवैधानिक व्यवस्था न होने के बावजूद प्राकृतिक संपत्ति के स्वामित्व की यही परंपरा चली आई। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 1962 में 18वीं सदी के ‘एमीनेंट डोमेन’ के ब्रिट्रिश सिद्वांत की व्याख्या करते हुए भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के स्वामित्व और नियंत्रण को मान लिया। लेकिन, 8 जुलाई 2013 को सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने केरल के एक किसान के मुकदमे में फैसला देते हुए स्वीकार किया कि भारत में ऐसी कोई कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था नहीं है जो प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य का स्वामित्व तय करती हो। जो जमीन का मालिक है वही उस जमीन पर मौजूद जल, जंगल और खनिज का मालिक है। समुदाय का स्वामित्व इसी का विस्तार भर है।
आदिवासी क्षेत्रों में तो यह कानूनी व्यवस्था है कि बिना ग्राम सभा की अनुमति के वहां के प्राकृतिक संसाधन नहीं लिए जा सकते। अपने इसी अधिकार का प्रयोग करके ओड़िशा में नियमगिरी के डोंगरिया कौंध आदिवासियों ने वेदांता कंपनी को दिए जाने वाले अपने जल, जंगल, जमीन, खनिज और पहाड़ को बचाने की लड़ाई लड़ी। देश के सभी समुदायों तक इस अधिकार के विस्तार की आवश्यकता स्वराज के अर्थशास्त्र की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

दूसरा- आर्थिक क्रियाकलापों पर संपूर्ण नियंत्रण का है। समुदाय-चाहे ग्रामीण हो या शहरी-उनके भीतर चलने वाले आर्थिक और विकास के क्रियाकलापों पर उसी समुदाय का संपूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। नाली कहां बनेगी, सड़क कहां बनेगी, आवास और शौचालय किस किस के लिए और कैसे बनेंगे, समुदाय को उपलब्ध कच्चा माल किस उद्योग से लिए जाएंगे, कृषि कैसी होगी, लघु कुटीर उद्योगों को कैसे चलाया जाएगा, पानी और खनिजों का उपयोग कैसे होगा, यह सब समुदाय के द्वारा ही अंतिम रूप से तय होना चाहिए। बड़े उद्योग भी समुदाय चला सकता है। बराबर के अंशधारक बनकर वे आज की जैसी कंपनियां बना सकते है और अगर यह तय हो कि इन कंपनियों का मोटा मुनाफा समुदाय के पास आएगा तो समुदाय के लोग आज की कंपनियों के अंशधारक निवेशकों और निदेशकों से ज्यादा सक्षम और दक्ष सिद्व हो सकते हैं। बिजली जैसी जरूरत भी समुदाय स्वयं पूरी कर सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के इतर जो संसाधन है, उनका संचालन भी समुदाय के संपूर्ण नियंत्रण के चलते वह ज्यादा कारगर होगा। व्यावहारिक ज्ञान और प्रशिक्षण से ही समुदाय को शक्ति मिलेगी। हमारे विश्वविद्यालय, ज्ञान विज्ञान और तकनीक के बड़े-बड़े संस्थान इस मामले में बेकार ही साबित हुए। आज के हमारे बड़े उद्यमी तो इन विश्वविद्यालयों और विज्ञान तकनीक के संस्थानों से नही निकले है। बल्कि यहां के पढ़े लिखों को अपने यहां नौकर रखते है। यह काम समुदाय के लोग भी कर सकते हैं।

स्वराज के अर्थशास्त्र में तीसरी बुनियादी बात यह है कि समुदाय के आर्थिक उन्नयन के लिए काम करने वाली संस्थाओं पर भी समुदाय का पूर्णनियंत्रण। गोदाम, मंडियां, स्कूल, अस्पताल, प्रशिक्षण के संस्थान, सहकारी संस्थाएं और बैंक, सिंचाई और जल कल विभाग आदि पर समुदाय का नियंत्रण स्थापित हो तो निश्चित ही लोक हितकारी व पर्यावरण सम्मत काम होगा। स्वराज में कृषि का स्वरूप तो एकदम भिन्न होगा। यह स्वावलंबी और जैविक खेती होगी। बीज, खाद, पानी आदि को स्थानीय स्तर पर ही संरक्षित और विकसित किया जाएगा। आधुनिक रासायनिक खेती को स्वराज का अर्थशास्त्र मान्यता नहीं देता। असल में उक्त बातें, किसी भी विचारधारा के अर्थशास्त्र की बुनियाद तय करती हैं। फर्क यह है कि पूंजीवाद में ये तीनों चीजें निजी व्यक्ति के हाथ में, साम्यवाद और समाजवाद में राज्य के हाथ में, अन्य विचारधाराओं में व्यक्ति और राज्य के हाथ में मिली जुली होती हैं। लेकिन, गांधीवाद में ये बातें स्वराज की आर्थिक विचारधारा के काफी नजदीक है।

हालांकि, गांधीवाद में भी पूर्ण स्वामित्व और पूर्ण नियंत्रण की बात का खुलासा विस्तार सें नही किया गया है। गांधीवादी अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा ने ‘इकॉनामी आॅफ परमानेंस’ और जेके मेहता ने ‘थ्योरी आॅफ वॉटलेसनेस’ शोध ग्रंथ में इस बारे में लिखा है, पर वे बहुत बुनियादी बात कहने के बावजूद स्वराज के अर्थशास्त्र पर सुस्पष्ट वैज्ञानिक चिंतन प्रस्तुत नहीं कर पाए। पूंजीवादी, समाजवादी और साम्यवादी आर्थिक विचारधाराओं में जो अर्थतंत्र की संरचना गढ़ी गई है, वह ऐसी है जैसे उलटा पिरामिड।स्वराजवादी आर्थिक संरचना सीधे पिरामिड की तरह है। इस सीधे पिरामिड की व्यवस्था में सर्वशक्तिमान और मालिक जन-गण है। संविधान में भी संप्रभु जन-गण को ही माना गया है। आपत्ति यह उठाई जाती है कि अगर जन-गण संप्रभु हो गया तो देश की सुरक्षा, विदेश नीति या अंतरिक्ष कार्यक्रमों में त्वरित निर्णय लेने में दिक्कत होगी। लेकिन इसके समाधान के लिए समुदायों के प्रतिनिधियों से गठित विधानसभाएं और लोकसभा और वहां से बनी केंद्रीय सत्ता तो स्वराज में भी होगी और वह ऐसे निर्णय तुरंत ले सकेगी।

स्वराज के अर्थशास्त्र की यह झलक भारतीय संविधान में भी दिखाई देती है। संविधान के नीति निर्देशक सिद्वांतों के अनुच्छेद 39 बी में कहा गया है कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार हो जिससे सामूहिक हित सर्वोत्तम रूप से सध सकें यानी सारे भौतिक संसाधन समुदाय के हंै। इस बात को समझने में आरंभ में हमारे न्यायालय से भी चूक हुई थी। असल में न्यायालय की शुरुआती राय अठारहवीं शताब्दी के यूरोपीय विद्वानों- ग्रोशस और कांट के एमीनेंट डोमेन (संप्रभुसत्ता) के सिद्वांत पर आधारित था। वह सिद्धांत यह कहता था कि भौतिक संसाधनों को राज्य के अधीन हैं। हालांकि, हमारे संविधान में हुए 73वें और 74वें संशोधन के तहत अनुच्छेद 243 जी ग्रामीण क्षेत्र में पंचायतों को और अनुच्छेद 243 डब्लू शहरी क्षेत्र में नगरपालिकाओं को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने की शक्ति देता है।

संविधान की 11वीं अनूसुची के अनुच्छेद 243 ब में शहरी क्षेत्रों के लिए और 243 द में ग्रामीण क्षेत्रो के लिए उन संसाधनों और कार्यक्रमों की सूची दी गई है जो यहां के समुदाय के स्वामित्व और नियोजन में होंगे। इन बातों को लेकर स्वराज के समग्र दर्शन और उसके अर्थशास्त्रीय पक्ष पर गहन शोध के साथ-साथ व्यावहारिक कार्यों पर काफी अध्ययन की जरूरत है। राजनीतिक पार्टी बनाकर सत्तापक्ष की नीतियों का औपचारिक विरोध भी जरूरी है, पर पर्याप्त नही। स्वराज की बात करने वाले अपनी प्रासगिकता सिद्व कर सकें और लोगो में भरोसा जगा सकें, उसके लिए भी जरूरी है कि वे अपना सुस्पष्ट आर्थिक दर्शन और उसे लागू करने की योजना देश के सामने रखें।

आजादी का आर्थिक पक्ष

छब्बीस जनवरी, 1930 को लाहौर के पास रावी नदी के तट पर उपस्थित कांग्रेस के सदस्यों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने पूर्ण स्वराज की घोषणा का प्रस्ताव पारित किया था। यह प्रस्ताव महात्मा गांधी ने स्वयं लिखा था। इसमें आर्थिक पहलू भी शामिल था। यानी साफ है कि आजादी की लड़ाई में भी स्वराज का विचार और उसका आर्थिक पक्ष अहम था। प्रस्ताव के कुछ अंश-

‘‘हमारा विश्वास है कि किहीं भी अन्य लोगों की तरह भारत के लोगों का यह अहस्तांतरणीय अधिकार है कि वे आजाद रहें और अपने श्रम के फल का आनंद उठाएं और जीवन की आवश्यकताएं प्राप्त करें, जिससे उन्हें वृद्धि के पूर्ण अवसर प्राप्त हो सकें। हमारा यह भी विश्वास है कि यदि कोई सरकार लोगों के इन अधिकारों को छीनती है और उनका दमन करती है तो लोगों को उसे बदलने या समाप्त करने का भी अधिकार है। भारत में ब्रितानी सरकार ने भारतीय लोगों की न केवल आजादी छीनी है बल्कि वह खुद आमजन के शोषण पर टिकी है और उसने भारत का आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से विनाश किया है। अत: हमारा विश्वास है कि भारत को ब्रितानी सरकार से संबंध विच्छेद करना चाहिए और पूर्ण स्वराज प्राप्त करना चाहिए। भारत का आर्थिक रूप से विनाश हुआ है। हमारे लोगों से वसूल किया जाने वाला राजस्व हमारी आय से कोई अनुपात नहीं रखता। हमारी औसत आय प्रतिदिन सात पैसा है और जो भारी कर हम भुगतान करते हैं उसमें से बीस प्रतिशत किसानों से वसूल किए गए भूमि राजस्व का हिस्सा है और तीन फीसद नमक कर है जिसका सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है। कताई जैसे गृह उद्योग नष्ट कर दिए गए हैं। नतीजतन, किसान लोग साल में कम से कम चार महीने बेकार बैठे रहते हैं और हस्त कलाओं के अभाव में अपनी बुद्धि को कुंद करते रहते हैं और इस प्रकार नष्ट की गई कलाओं के स्थान पर कुछ और खड़ा नहीं किया गया है जैसा कि अन्य देशों में हुआ है। सीमा शुल्क और मुद्रा में ऐसी हेरा-फेरी की गई है जिससे किसानों पर और बोझ लद गए हैं। हमारे आयात का ज्यादा हिस्सा ब्रितानी निर्मित सामान होते हैं। सीमा शुल्क में ब्रितानी निमार्ताओं के प्रति साफ पक्षपात दिखाई पड़ता है और उसमें से प्राप्त राजस्व आम जन के बोझ को कम करने के लिए इस्तेमाल नहीं होता बल्कि एक अत्यंत फिजूलखर्ची प्रशासन को टिकाए रखने में खर्च होता है। इससे भी ज्यादा मनमानी विनिमय अनुपात की हेरा-फेरी की है जिसके फलस्वरूप करोड़ों का धन देश के बाहर चला जाता है।’’

हालांकि, यह प्रस्ताव ब्रितानी हुकुमत से आजादी के लिए तैयार किया गया था, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे आज भी प्रासंगिक है। इससे पहले गांधीजी ने अपने पत्र ‘यंग इंडिया’ के दस मार्च, 1927 के अंक में स्वराज को स्पष्ट करते हुए लिखा है-‘स्वराज का अर्थ है सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने का सतत् प्रयास। यह सरकार विदेशी हो अथवा राष्ट्रीय।’ स्वराज में आर्थिक संरचना भी ऐसी होगी जिस पर सरकार का न्यूनतम नियंत्रण रहे। इसलिए इन मुद्दों को आज की आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाकर स्वराज के अर्थशास्त्र की दृष्टि से फिर से प्रस्तुत करना होगा और आम जनता के सामने रखकर उसकी गोलबंदी के निरंतर प्रयास करने होंगे। ० मनोज

 

 

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