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विचार बोध: लोकमन और तीन स्वप्न

आमतौर पर विद्वतजन किंवदंतियों को भारतीयता की व्याख्या के लिहाज से या भारतीय लोकमानस की रचना को समझने के लिए खास अहमियत नहीं देते हैं। डॉ. लोहिया इस स्थिति को समझते थे। वे विद्वान तो थे ही तार्किक दृष्टि से भी काफी समृद्ध थे।

विचार बोधशास्त्र या ग्रंथ जब लोक आस्था और स्मृति का हिस्सा बन जाता है, तो वह वैसा ही नहीं रहता जैसा वर्णित किया गया होता है।

रोहित कुमार

देश और समाज की स्फीति आज राजनीतिक दायरों में भी दिखती है। यही कारण है कि आचरण, विचार और नेतृत्व का समास अब यहां हमें कम देखने को मिलता है। पर ऐसा हमेशा से नहीं रहा है। स्वाधीनता संघर्ष के दौरान भारतीय नेतृत्व की यह सामासिक खूबी आजादी के बाद के भी कुछ दशकों तक देखने को मिली। विनोबा और जयप्रकाश नारायण जैसे लोग सीधे-सीधे राजनीति से नहीं जुड़े थे तो भी उन्होंने भारतीय सार्वजनिक जीवन की धज को बनाए रखा। इस लिहाज से एक नाम और जो बहुत महत्वपूर्ण है, वह है डॉ राममनोहर लोहिया। लोहिया ने भारतीय समाज और संस्कृति को लेकर नई समझ के साथ बात की। यह समझ दर्शन या श्रद्धा के बोझ से तकरीबन मुक्त थी। दरअसल, वे भारतीय लोक समाज की बुनावट को नए संदर्भ में समझना चाहते थे।

डॉ. लोहिया का एक प्रसिद्ध निबंध है- ‘राम, कृष्ण और शिव’। इस निबंध के आरंभ में वे भारतीय लोकमानस की उस विलक्षणता की बात करते हैं, जिसमें आस्था, विवेक और बुद्धि मिलकर कई तरह की किंवदंतियों को जन्म देते हैं। वे कहते हैं, ‘दुनिया के देशों में हिंदुस्तान किंवदंतियों के मामले में सबसे धनी है। हिंदुस्तान की किंवदंतियों ने सदियों से लोगों के दिमाग पर निरंतर असर डाला है। इतिहास के बड़े लोगों के बारे में, चाहे वे बुद्ध हों या अशोक, देश के चौथाई से अधिक लोग अनभिज्ञ हैं। दस में एक को उनके काम के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी होगी और सौ में एक या हजार में एक उनके कर्म और विचार के बारे में कुछ विस्तार से जानता हो तो अचरज की बात होगी।’

दिलचस्प है कि आमतौर पर विद्वतजन किंवदंतियों को भारतीयता की व्याख्या के लिहाज से या भारतीय लोकमानस की रचना को समझने के लिए खास अहमियत नहीं देते हैं। डॉ लोहिया इस स्थिति को समझते थे। वे विद्वान तो थे ही तार्किक दृष्टि से भी काफी समृद्ध थे। इसलिए वे विद्वानों की समझ से सीधे भिड़ने के बजाय आगे अपनी बात पौराणिकता तक ले जाते हैं। वे इस संदर्भ में कहते हैं, ‘देश के तीन सबसे बड़े पौराणिक नाम – राम, कृष्ण और शिव – सबको मालूम हैं।

उनके काम के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी प्राय: सभी को, कम से कम दो में एक को तो होगी ही। उनके विचार व कर्म या उन्होंने कौन-से शब्द कब कहे, उसे विस्तारपूर्वक दस में एक जानता होगा। भारतीय आत्मा के लिए तो बेशक और कम से कम अब तक के भारतीय इतिहास की आत्मा के लिए और देश के सांस्कृतिक इतिहास के लिए यह अपेक्षाकृत निरर्थक बात है कि भारतीय पुराण के ये महान लोग धरती पर पैदा हुए भी या नहीं।’

शास्त्र या ग्रंथ जब लोक आस्था और स्मृति का हिस्सा बन जाता है, तो वह वैसा ही नहीं रहता जैसा वर्णित किया गया होता है। यहां आकर उसे चूंकि लोक सहजता की अपेक्षाओं पर खड़ा होना होता है, इसलिए उसे अपनी मौलिकता से आगे की यात्रा करनी होती है। किंवदंति इसी यात्रा का नाम है। इस संबंध में डॉ लोहिया अपनी बात और बेहतर तरीके से स्पष्ट करते हैं। वे इस निबंध में लिखते हैं, ‘किसी कौम की किंवदंतियां उसके दुख और सपनों के साथ उसकी चाह, इच्छा और आकांक्षाओं का प्रतीक हैं तथा साथ-साथ जीवन के तत्व उदासीनता और स्थानीय व संसारी इतिहास का भी।

राम और कृष्ण और शिव भारत की उदासी के साथ-साथ रंगीन सपने हैं। उनकी कहानियों में एकसूत्रता ढूंढ़ना या उनके जीवन में अटूट नैतिकता का ताना-बाना बुनना या असंभव व गलत लगनेवाली चीजें अलग करना उनके जीवन का सब कुछ नष्ट करने जैसा होगा। केवल तर्क बचेगा। हमें बिना हिचक के मान लेना चाहिए कि राम, कृष्ण और शिव कभी पैदा नहीं हुए, कम से कम उस रूप में, जिसमें कहा जाता है। उनकी किंवदंतियां गलत और असंभव हैं। उनकी शृंखला भी कुछ मामले में बिखरी है जिसके फलस्वरूप कोई तार्किक अर्थ नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यह स्वीकारोक्ति बिल्कुल अनावश्यक है।’

साफ है कि वे किंवदंतियों की तार्किक अहमियत पर उठने वाले सवालों को गलत नहीं मानते पर इस संदर्भ में वे इस तरह की किसी तार्किकता या स्वीकार-अस्वीकार को पूरी तरह गैरजरूरी जरूर मानते हैं। ये बातें हम चूंकि राम, कृष्ण और शिव को लेकर कर रहे हैं तो यहां यह भी समझ लेना बेहतर होगा कि इन नामों की लोक स्वीकृति या इनके लिए भारतीय लोकमन में सदियों से रही आस्था को दरकिनार कर हम भारतीय मन और चेतना को लेकर कोई सार्थक बात नहीं कर सकते हैं।

इस संबंध में बात करते हुए डॉ लोहिया कहते भी हैं, ‘भारतीय आत्मा के इतिहास के लिए ये तीन नाम सबसे सच्चे हैं और पूरे कारवां में महानतम हैं। इतने ऊंचे और इतने अपूर्व हैं कि दूसरों के मुकाबले में गलत और असंभव दिखते हैं। जैसे पत्थरों और धातुओं पर इतिहास लिखा मिलता है वैसे ही इनकी कहानियां लोगों के दिमागों पर अंकित हैं जो मिटाई नहीं जा सकतीं।’

इसी क्रम में वे आगे काफी सुंदरता के साथ कहते हैं कि राम, कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं। सब का रास्ता अलग-अलग है। राम की पूर्णता मर्यादा में है, कृष्ण की उन्मुक्त या संपूर्ण व्यक्तित्व में और शिव की असीमित व्यक्तित्व में लेकिन हरेक पूर्ण है।

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