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शख्सियत: सेवा और संघर्ष के आदर्श नानाजी देशमुख

1940 में हेडगेवार के निधन के बाद संघ को खड़ा करने की जिम्मेदारी नानाजी पर आ गई। इस जिम्मेदारी को जीवन का मूल उद्देश्य बनाते हुए नानाजी ने अपना पूरा जीवन संघ के नाम कर दिया। संघ प्रचारक के रूप में पहली बार आगरा प्रवास पर आए नानाजी की मुलाकात पंडित दीनदयाल उपाध्याय से हुई।

त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति नानाजी देशमुख।

आजादी के बाद भारतीय राजनीति में उन लोगों ने बड़ी शिरकत की, जिन्होंने इससे पहले राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान निष्ठा, त्याग और आदर्श की बड़ी मिसालें पेश की थीं। पर बाद में जैसे-जैसे इस पीढ़ी या जमात के लोग कम होते गए सार्वजनिक जीवन में स्फीति का दौर गहराता गया। इस लिहाज से हाल के दशकों में हर स्तर पर दिखी चारित्रिक स्फीति के बीच जिस व्यक्ति का जिक्र समाज सेवा और सार्वजनिक जीवन में शुचिता के उदाहरण के तौर पर बार-बार होता है, वे थे नानाजी देशमुख।

नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले में 11 अक्तूबर, 1916 को हुआ था। ‘मैं अपने लिए नहीं, अपनों के लिए हूं‘, इस लक्ष्य वाक्य पर चलते हुए उन्होंने देश के कई ऐसे गांवों की तस्वीर बदल दी, जो विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर थे। नानाजी ने अपनी कर्मभूमि भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट को बनाया। बातचीत में वे अक्सर कहा करते थे कि जब अपने वन प्रवास के दौरान भगवान राम चित्रकूट में आदिवासियों तथा दलितों के उत्थान का कार्य कर सकते हैं तो वे क्यों नहीं। इसलिए नानाजी चित्रकूट जब पहली बार आए तो फिर यहीं बस गए।

जीवन में प्रेरणा और संस्कार के बीज बचपन में ही पड़ जाने पर आगे वे काफी सुंदर तरीके से पल्लवित-पुष्पित होते हैं। किशोरावस्था में नानाजी के मन में भारत के गांवों की दुर्दशा ने गहरी छाप छोड़ी थी। इसलिए वे गांवों के विकास और लोगों के उत्थान के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। चूंकि उनका बचपन काफी अभावों में बीता था इसलिए उनके अंदर दबे-पिछड़े और गरीब लोगों के लिए कुछ करने का भाव बहुत पहले जग गया था। यह भाव आगे नानाजी के जीवन का सकर्मक मकसद बन गया। राष्ट्रीय स्वयंसवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से नानाजी के पारिवारिक संबंध थे।

1940 में हेडगेवार के निधन के बाद संघ को खड़ा करने की जिम्मेदारी नानाजी पर आ गई। इस जिम्मेदारी को जीवन का मूल उद्देश्य बनाते हुए नानाजी ने अपना पूरा जीवन संघ के नाम कर दिया। संघ प्रचारक के रूप में पहली बार आगरा प्रवास पर आए नानाजी की मुलाकात पंडित दीनदयाल उपाध्याय से हुई।

आगरा के बाद नानाजी गोरखपुर गए और वहां दिन-रात मेहनत करते हुए संघ की शाखाएं खड़ी कीं। यहां तक कि नानाजी को गोरखपुर में ठहरने के लिए (संघ के पास उस समय संगठन संचालन के लिए पर्याप्त धन नहीं था) आश्रम संचालक बाबा राघवदास के लिए भोजन तक बनाना पड़ा था। आज देश भर में सरस्वती शिशु मंदिर के नाम से स्कूलों की जो शृंखला है, उसकी स्थापना नानाजी ने सर्वप्रथम गोरखपुर में ही की थी।

जेपी आंदोलन के समय जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ऊपर बिहार की राजधानी पटना के आयकर चौराहे पर पुलिस की लाठियां बरसीं तो नानाजी ने साहस का परिचय देते हुए जेपी को सुरक्षित बाहर निकाला। आपातकाल हटने के बाद जब चुनाव हुआ तो नानाजी यूपी के बलरामपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। उन्होंने मोरारजी मंत्रिमंडल में शामिल होने का न्योता यह कहकर ठुकरा दिया कि 60 वर्ष की उम्र के बाद संसदीय राजनीति से दूर रहकर सामाजिक व सांगठनिक कार्य करें।

अपनी इस सैद्धांतिक टेक पर उन्होंने खुद भी अमल किया। राजनीतिक जीवन से संन्यास के बाद वे आजीवन सामाजिक कार्य करते रहे। मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित नानाजी का जीवन सार्वजनिक जीवन में शुचिता के साथ ही समाज सेवा के प्रति अखंड प्रतिबद्धता के लिहाज से हम सबके लिए प्रेरक आदर्श है।

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