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मुद्दा- कैसे हो जनसंख्या का स्थिरीकरण

बढ़ती आबादी जल्द ही बड़ी समस्या का रूप धारण करनी चा रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक 2050 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा आबादी वाला देश होगा यानी चीन को भी भारत आबादी के मामले में पछाड़ देगा।

Author January 22, 2017 12:43 AM

अखिलेश आर्येंदु

बढ़ती आबादी के कारण प्राकृतिक संसाधन का दोहन बहुत तेजी से हो रहा है। दूसरी ओर बहुराष्टीय कंपनियां अधिक मुनाफे के चक्कर में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बहुत तेजी से कर रही हैं, इससे आबादी का पलायन हो रहा है। वहीं पर लोगों में अविश्वास और निराशा भी बढ़ रही है। पर्यावरण प्रदूषण की गहराती समस्या का एक बड़ा कारण यह भी है।

बढ़ती आबादी जल्द ही बड़ी समस्या का रूप धारण करनी चा रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक 2050 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा आबादी वाला देश होगा यानी चीन को भी भारत आबादी के मामले में पछाड़ देगा। अगर आबादी की रफ्तार और भी तेज हुई तो 2050 के पहले ही भारत सबसे बड़ा आबादी वाला देश बन जाएगा। जो आंकड़े बढ़ती आबादी के राज्यवार जारी हुए हैं, उससे साबित होता है कि देश के बड़े राज्यों की अपेक्षा छोटे राज्यों ने आबादी की रफ्तार पर काबू पाने में अधिक सफलता पाई है। ये राज्य हैं केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हिमाचल, गोवा, पंजाब, ओडिशा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर। बढ़ती आबादी के साथ घटते संसाधन और इसी के साथ बढ़ती बेरोजगारी देश में कई समस्याओं को जन्म देते दिखाई दे रहे हैं, जो विकास की राह में बड़े रोड़े साबित हो सकते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की परिवार नियोजन की योजनाओं, अभियानों और कार्यक्रमों और स्वयंसेवी संगठनों की सशक्त भूमिका के बावजूद भारत में जनसंख्या की समस्या लगातार बढ़ रही है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की आबादी 1.21 अरब से अधिक हो गई है।

आबादी बढ़ने की रफ्तार कम जरूर हुई है, लेकिन जन्म दर की अपेक्षा मृत्युदर कम होने के कारण महज 2001 से 2010 के दौरान 18.14 करोड़ की बढ़ोतरी दर्ज की गई। पिछले पांच सालों में जनसंख्या बढ़ने का औसत यही रहा है। यह वृद्धि पिछली जनसंख्या के आंकड़ों की तुलना में 17.64 प्रतिशत अधिक है। अब भी भारत की जनसंख्या 1.4 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रही है जो कि चीन से 0.6 से ढाई गुना अधिक है। विषेशज्ञों के मुताबिक पानी, जमीन, खाद्यान्न, कोयला, पेट्रोलियम पदार्थ और अन्य जरूरी संसाधनों में लगातार कमी हो रही है। सबसे बड़ी समस्या इस क्त पीने वाले पानी और शुद्ध खाद्यान्न की है। देश के अभी लाखों गांवों में जरूरत के अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पीने लायक पानी की व्यवस्था नहीं हो पाई है। इससे गांवों से लगातार पलायन हो रहा है और शहरी आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक अगर गांवों से शहरों की ओर पलायन नहीं रुका तो 2030 तक शहरों की आबादी बढ़कर चालीस फीसद ज्यादा हो जाएगी। इससे शहरों में जनसंख्या का भार और बढ़ेगा जिससे नई-नई समस्याएं बढ़ेंगी।
गांवों की अपेक्षा शहरों में पीने लायक पानी, हवा और प्राकृतिक संसाधन धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। बढ़ती आबादी की अपेक्षा खाद्यान्न उपलब्धता खासकर, दलहन, तिलहन और दुग्ध उत्पादन लगातार कम हो रहा है। मिलावटी दूध शहर का हर आदमी पीने के लिए मजबूर है। बढ़ती मंहगाई, घटते संसाधन और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में शहरों की आधी आबादी बहुत ही खराब स्थिति में जिंदगी बसर कर रही है।

काूनन-व्यवस्था की समस्या जो हमेशा बनी रहती है सो अलग। ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे लोगों को बेहतर स्वास्थ्य, सबको रहने के लिए मकान, पहनने का कपड़ा, शुद्ध पीने का पानी और खाना और शिक्षा मुहैया कराई जाए। जाहिर है शहरों में गैरबराबरी बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है। गरीब आदमी छोटे परिवार की जगह बड़ा परिवार बनाने को प्राथमिकता देता है। क्योंकि इससे उसकी आय लगातार बढ़ती जाती है। उसे न तो बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य की कोई चिंता रहती है और न तो मूलभूत बेहतर सुविधाओं की। बल्कि उसकी प्राथमिकता हमेशा छोटे से लेकर बड़े बच्चों तक से काम कराना होता है। वह काम किसी भी तरह का हो सकता है। ऐसे बच्चे गलत सोहबत में आकर धूम्रपान, शराब और स्मैंकिंग करने लगते हैं। हिंसा, चोरी और दूसरे अपराध भी करना शुरू कर देते हैं। ऐसे परिवारों को सुधारना सबसे मुश्किल का काम है। आबादी की जो समस्या है, वह निम्न वर्गीय लोगों में ज्यादा है।

देश में दूध और खाद्यान्न की कमी कोई नई बात नहीं है। खासकर दालों की उपलब्धता की समस्या लगातार बनी रहती है। इस साल लाखों टन दाल बाहर से मंगानी पड़ी। आने वाले वक्त में चीनी का भी आयात करना पड़ सकता है। हालात यहां तक आ पहुंची है कि पानी, दूध और दलहन की बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ठेका दिया जा रहा है जिससे अरबों रुपए भारत से बाहर जा रहा है। शुद्ध पानी, शुद्ध दूध, शुद्ध हवा, शुद्ध सब्जी, शुद्ध अनाज और रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली सभी वस्तुओं की शुद्धता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। बढ़ती आबादी के कारण प्राकृतिक संसाधन का दोहन बहुत तेजी से हो रहा है। दूसरी ओर बहुराष्टीय कंपनियां अधिक मुनाफे के चक्कर में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बहुत तेजी से कर रही हैं, इससे आबादी का पलायन हो रहा है। वहीं पर लोगों में अविश्वास और निराशा भी बढ़ रही है। पर्यावरण प्रदूषण की गहराती समस्या का एक बड़ा कारण यह भी है। बढ़ती खुदकुशी की समस्या भी आबादी और बढ़ती निराशा की ही देन है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार देश में बढ़ रहा नक्सलवाद, आतंकवाद, अपराध, बीमारियां और विघटन की तमाम समस्याओं की एक वजह भारी जनसंख्या भी है।

भारत में आबादी का स्थरीकरण कैसे हो ? यह बड़ा सवाल है। स्थिरीकरण का मतलब, साल में जन्म-दर और मृत्य-दर का समान होना है। जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि आज जो स्थिति है, उसमें स्थिरीकरण बहुत कठिन दिख रहा है। गौरतलब है अभी देश में प्रजनन दर 2.3 है। इसे 2020 तक 2.1 तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। इस हिसाब से औसतन एक जोड़े को दो से ज्यादा बच्चे नहीं पैदा करना चाहिए। सरकार 2010 तक प्रजनन दर 2.1 तक लाना तय किया था, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। इसलिए दस साल का समय और निर्धारित किया गया। अब देखना है कि क्या 2020 तक लक्ष्य हासिल हो पाता है कि नहीं।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें छोटा परिवार-सुखी परिवार की योजना पर काम तो कर रही हैं, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिल पा रही है। कई जातियों और धर्मों में आज भी लोग यह मानते हैं कि परिवार नियोजन कुदरत और मजहब के खिलाफ है। इस मान्यता और विचार को तोड़े बिना आबादी के स्थिरीकरण का मुकाम हासिल करना दूर की कौड़ी दिख रही है। गौरतलब है सरकार के परिवार कल्याण कार्यक्रम सफल नहीं हो पाया है। जिसका परिणाम यह हुआ है कि बढ़ती आबादी के कारण तमाम तरह की समस्याएं, जटिलताएं और विसंगतियां पैदा हो गई हैं। सरकार को कड़ाई से इस ओर कदम उठाने होंगे। तमाम कवायदों के बावजूद लोगों में छोटे परिवार प्रति वैसी ललक नहीं बन पाई है जैसी आबादी के स्थिरीकरण के लिए जरूरी है। शहरों में छोटा परिवार सुखी परिवार की समझ को विकसित करने की जरूरत है। गांवों में कृषि के लिए दो -चार लोगों से काम नहीं चलता। मजदूरी बढ़ने के कारण मजूदरों से ही सारा काम कराने का मतलब, घाटे का सौदा करना। इसलिए संयुक्त परिवार और बड़े परिवार की जरूरत गांवों में आज भी बनी हुई है। इस समस्या का जब तक स्थायी समाधान नहीं हो जाता, गांवों में परिवार नियोजन की सफलता संदिग्ध ही रहेगा। सरकार को कुछ ऐसी योजनाएं और तरीके निकालने चाहिए जिससे खेती और बागवानी पर मानव श्रम-शक्ति की निर्भरता कम हो और लोगों को परिवार नियोजन करने के दिशा में भी प्रगति हो सके। ०

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