How many are authentic organic food available in the market - रविवारीः एक हराभरा गोरखधंधा! - Jansatta
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रविवारीः एक हराभरा गोरखधंधा!

बढ़ते भूमि और जल प्रदूषण, उत्पादन बढ़ाने की मंशा से जीन फसलों, रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से अनाज-फल-सब्जियों में जहरीले तत्त्व घुले होने की बात लंबे समय से कही जा रही है। इससे बचने के लिए जैविक यानी आर्गेनिक खेती पर भी जोर दिया जाता है। जैविक अनाज-फल-सब्जियां और दुग्ध उत्पाद सामान्यतया काफी महंगी कीमत पर बाजार में उपलब्ध हैं। पर बाजार में उपलब्ध आर्गेनिक खाद्य कितने प्रामाणिक हैं, इसकी पड़ताल कर रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

Author August 12, 2018 7:20 AM
सिक्किम देश का पहला पूर्ण ऑर्गेनिक राज्य है। इसे यह पदवी 2015 में मिली।

अभिषेक कुमार सिंह

जीने को दो वक्त की रोटी, बदन पर कपड़ा और सिर पर छत- इससे ज्यादा और क्या चाहिए? बेशक, आज भी ये चीजें इंसान की मूलभूत जरूरतें हैं और अगर इतना भर मिल जाए, तो जिंदगी की गाड़ी खिंच ही जाती है। मगर दुनिया ने आगे बढ़ना सीखा है। सिर्फ जरूरत भर को मिल जाए, इस सोच से बाहर निकल कर हैसियत की चादर को बाहर निकलते पांवों के मुताबिक बढ़ाना सीखा है। सिर्फ खाने-पीने की बात की जाए तो एक दौर था, जब दुनिया भर के किसान जमीन से अपनी जरूरत भर का उगा पाते थे। पर आबादी बढ़ी, भूख का दायरा व्यवसाय की शक्ल में विस्तार पा गया, तो हरित क्रांति आई जिसने सिखाया कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों की मदद से जमीनें पहले के मुकाबले कई गुना अनाज-फल-सब्जी उगा सकती हैं।

तस्वीर बदलने वाले इस किस्से का दूसरा पहलू भी सामने आया कि रसायन-युक्त अनाज-फल-सब्जियां हमारे शरीर में कैसे-कैसे कैंसर बो रही हैं। यहीं से दुनिया में ऑर्गेनिक यानी जैविक खेती का सिलसिला शुरू हुआ। दावों पर यकीन करें तो दुनिया के कई मुल्कों के साथ भारत में भी खेती की यह किस्म किसानों की किस्मत और ऐसे अनाज-सब्जियों का सेवन करने वालों की सेहत में चार चांद लगा रही है। लेकिन क्या यह सच है? खेती-किसानी की पौ-बारह करने वाली जैविक खेती से जुड़ा अहम सवाल यह है कि क्या जो अनाज, फल, सब्जियां आदि ऑर्गेनिक बताकर बेचे-खरीदे जा रहे हैं, वे वास्तव में ऑर्गेनिक ही हैं। या फिर यह सारा इंतजाम दिल को तसल्ली देने वाले अच्छे खयाल तक सीमित है।

आंकड़ों की बात करें तो अब दुनिया में ऑर्गेनिक खेती करने वाला हर तीसरा किसान भारतीय है। वर्ष 2018 में आई वर्ल्ड ऑफ ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय दुनिया में करीब सत्ताईस लाख किसान ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं, जिसमें से आठ लाख पैंतीस हजार किसान भारत के हैं। यानी ऑर्गेनिक खेती करने के मामले में भारतीय किसान सबसे आगे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में ऑर्गेनिक खेती में आई तेजी के कारण भारत में अब सोलह करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा रकबे में ऑर्गेनिक खेती होने लगी है। दुनिया में अभी करीब उनसठ करोड़ हेक्टेयर में ऑर्गेनिक खेती हो रही है। भारत के बाद युगांडा का नंबर है। वहां करीब दो लाख दस हजार तीन सौ बावन किसान ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। इसके बाद मैक्सिको का नंबर है। वहां दो लाख दस हजार किसान पूरी तरह से ऑर्गेनिक खेती को अपना चुके हैं। कुल मिलाकर भारत में इस खेती का रकबा दुनिया में नौवें नंबर पर है। इसके अलावा सिक्किम को ऐसे राज्य का दर्जा हासिल है, जहां रासायनिक खाद या कीटनाशक का किसी भी रूप में इस्तेमाल नहीं होता।

पहली बात कि आखिर ऑर्गेनिक खेती है क्या? वैज्ञानिक तथ्यों और परिभाषाओं में ज्यादा जाए बगैर इसका आसान जवाब यह है कि अनाजों या फल-सब्जी की ऐसी खेती, जिसमें रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बजाय गोबर की खाद जैसी जैविक खादों और नीम-गोमूत्र जैसे प्राकृतिक कीटनाशकों का इस्तेमाल हो। देश में ऑर्गेनिक खेती के कुछ नियम-कायदे भी हैं, जिनका पालन करना जरूरी है और ऐसी खेती के प्रमाणीकरण (सर्टिफिकेशन) की भी कुछ व्यवस्थाएं हैं। इसके अलावा सरकार ने 2001 में कृषि मंत्रालय के तहत नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन संगठन बनाया था। देश में ऑर्गेनिक खेती के कायदे-कानून बनाना और इसे बढ़ावा देना उसके जिम्मे किया गया था। हालांकि इस किस्म की खेती की जांच-परख की शुरुआती व्यवस्था 2015 में ही हो पाई, जब पार्टिसिपेटरी गारंटी स्कीम बना कर देश में करीब पच्चीस ऐसी मान्यता प्राप्त प्रमाणीकरण एजेंसियां बनाई गर्इं, जो खेतों, भंडारण और प्रसंस्करण इकाइयों की जांच कर उन्हें अपने उत्पादों पर इंडिया ऑर्गेनिक लोगो (चिह्न) लगा कर बाजार में बेचने का प्रमाणपत्र देती हैं।

वर्ष 2015-16 का आंकड़ा है कि देश में ऑर्गेनिक लेबल वाले 10.35 लाख टन कृषि उत्पाद विदेशी बाजारों को भेजे थे। इससे अगले साल 2016-17 में करीब 2,478 करोड़ के ऑर्गेनिक उत्पादों का निर्यात किया। यहां उल्लेखनीय बात यह है कि बाजार भेजे जाने वाले ऑर्गेनिक उत्पादों की जांच-परख का काम एग्रीकल्चरल ऐंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी के जिम्मे है, लेकिन जब देश के बाजारों (घरेलू बाजार) में उपलब्ध ऑर्गेनिक उत्पादों की सच्चाई का सवाल उठता है, तो पता चलता है कि सरकार की तरह इसकी जांच करने वाला कोई भरोसेमंद प्रणाली या कायदे-कानून नहीं हैं। यही वह पेच है, जिससे दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे देश में बेचे जा रहे ऑर्गेनिक उत्पादों की सच्चाई का सवाल उठ खड़ा होता है और यह संदेह होने लगता है कि ऑर्गेनिक के नाम पर कई गुना ज्यादा कीमत देने के बाद हम जो फल-सब्जी खा रहे हैं, वे सच में दावों पर खरे उतरते भी हैं या नहीं। इन दावों की पड़ताल इसलिए जरूरी है, क्योंकि देश में उगाए जा रहे ऑर्गेनिक उत्पादों में से पंचानबे फीसद से ज्यादा की खपत घरेलू बाजारों में ही हो रही है।

ऑर्गेनिक उत्पादों की सच्चाई का एक सवाल पिछले साल 2017 में इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस ने अपनी शोध रिपोर्ट ‘ऑर्गेनिक फार्मिंग इन इंडिया: स्टेटस, इश्यूज ऐंड वे फॉरवर्ड’ में उठाया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में खेती का जो ऑर्गेनिक क्षेत्र बीस फीसद सालाना की दर से बढ़ रहा है, घरेलू बाजारों में बेचे जा रहे उसके उत्पादों के दावों की जांच, लेबलिंग की जरूरतों, फर्जीवाड़े पर दंडित करने वाले कायदे-कानूनों का अभाव है और ऐसी कोई एक नोडल एजेंसी नहीं है, जो देश के अंदर ऑर्गेनिक खेती के नियमन का काम करे। जाहिर है यह सारा काम या तो जनता की इच्छा पर छोड़ा गया है कि वह अगर अपने स्तर से कोई जांच करना-कराना चाहे तो इसकी खोजबीन करे, अन्यथा कुछ स्वतंत्र इकाइयों के लगाए लेबल को सच मान लिया जाए।

अपने देश में बाजार में उपलब्ध खाने-पीने की चीजों में मौजूद तमाम किस्म के जहर या नुकसानदायक चीजों की जांच-पड़ताल को लेकर जनता में कोई ज्यादा सजगता यों ही नहीं दिखती है। कभी-कभार सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट जैसी संस्थाएं ही इस पर कोई सवाल उठाती हैं तो वे मामले बहस का विषय बनते हैं। खाद्य तेलों और नूडल्स आदि में सेहत के लिए खतरनाक तत्त्वों की मौजूदगी का भी पिछले कुछ सालों में ही खुलासा हुआ, अन्यथा इन्हें दशकों से बेखटके इस्तेमाल में लाया जाता रहा है। फिर इधर कुछ वर्षों से सेहत को लेकर देश में जो थोड़ी-बहुत जागरूकता आई है, उससे लोग ऑर्गेनिक दूध, फल, सब्जी के सेवन को उत्सुक हुए हैं। पर यहां भी विडंबना यह है कि सामान्य के मुकाबले कई गुना ज्यादा कीमत चुका कर, जो ऑर्गेनिक उत्पाद घरों में लाए जा रहे हैं, आम जनता के लिए उनकी ऑर्गेनिकता सिर्फ उन पर लगाए लेबल तक सीमित है। इस लेबल के साथ बेचे जा रहे उत्पाद सच में ऑर्गेनिक हैं या नहीं- यह जानने का कोई जरिया लोगों के पास नहीं है। यानी लोग दसियों गुना दाम चुका कर जो ऑर्गेनिक उत्पाद खरीद रहे हैं, मुमकिन है कि वे महज तसल्ली देने तक सीमित हों।

इसमें संदेह नहीं कि अगर लोगों को ऊंची कीमत चुकाने के बाद वास्तविक ऑर्गेनिक फल, सब्जी मिल जाते हैं तो स्वाद और सेहत, दोनों मामलों में संतुष्ट हो सकते हैं। पर क्या यह बात दावे से कही जा सकती है कि दिल्ली के एशियाड गेम्स विलेज, कनॉट प्लेस के दिल्ली ऑर्गेनिक फार्मर्स मार्केट से लेकर गुड़गांव के ऑर्गेनिक बाजार में मिलने वाले दूध, दही, पनीर, फल, सब्जी, दालें आदि उतनी ही प्राकृतिक और ऑर्गेनिक हैं, जितनी कि वे हकीकत में होनी चाहिए। तीन साल पहले 2015 में एक संसदीय पैनल ने उठाया था। पैनल ने सरकार को दी अपनी रिपोर्ट ने कहा था कि असली के नाम पर घरेलू बाजारों में बेचे जा रहे नकली ऑर्गेनिक उत्पादों पर लगाम लगाने के लिए एक ठोस व्यवस्था बनानी चाहिए, जो इनकी जांच करे, इन्हें सर्टिफिकेट दे और नकली पाए जाने पर इनके उत्पादकों और विक्रेताओं को दंडित करे। उल्लेखनीय बात यह थी कि इस पैनल ने अपनी जांच में 2012-14 के बीच देश को मिली उन पच्चीस शिकायतों का जिक्र किया, जो अमेरिका और यूरोपीय संघ के कई अन्य देशों से मिली थीं। शिकायतों में कहा गया था कि भारत से ऑर्गेनिक उत्पादों की जो खेप भेजी गर्इं, उनमें रासायनिक कीटनाशक मौजूद थे।

हैरानी नहीं कि जब कड़े नियमन के बावजूद विदेश भेजे जा रहे ऑर्गेनिक उत्पादों में घपला हो सकता है, तो देश के भीतर इस बारे में कायदे-कानून की कमी का फायदा उठा कर एक भरापूरा हराभरा गोरखधंधा आसानी से क्यों नहीं चल सकता। इस संसदीय पैनल ने मर्ज की जड़ की तरफ भी इशारा किया था। पैनल की रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि देश में ऑर्गेनिक उत्पादों के प्रमाणीकरण की जो थोड़ी-बहुत व्यवस्था है, वह प्रक्रिया-आधारित (प्रोसेस ओरिएंटेड) है, न कि लैबोरेटरी में होने वाली जांच पर आधारित। यानी इसमें इसकी आरंभिक जांच तो की जाती है कि उगाए जाते समय किसी फसल में ऊपर से रासायनिक खादें या कीटनाशक डाले गए या नहीं। पर यह नहीं देखा जाता कि बाजार में भेजने के वक्त उस उत्पाद में रासायनिक कीटनाशक या जहरीला अवशेष (रेसेड्यू) मौजूद है या नहीं।

दो तरह के प्रमाण-पत्र

मौजूदा वक्त में देश में ऑर्गेनिक उत्पादों की प्रामाणिकता तय करने वाली दो व्यवस्थाएं हैं। पहली पार्टिसिपेटरी गारंटी स्कीम (पीजीएस) है, जो देश के भीतर बेचे जाने वाले उत्पादों की जांच-पड़ताल और सर्टिफिकेशन का काम करती है। यह योजना ऑर्गेनिक उत्पादकों को अपने उत्पाद की स्वत: जांच वाली व्यवस्था के तहत काम करती है और इससे किसान काफी खुश बताए जाते हैं। दूसरी है एग्रीकल्चरल प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी की सर्टिफिकेशन व्यवस्था, जो विशुद्ध रूप से विदेश भेजे जाने वाले उत्पादों की जांच करती है। दोनों ही प्रोसेस आधारित जांच की व्यवस्थाएं हैं जिसमें बाजार में मौजूद ऑर्गेनिक उत्पादों में रह गए रासायनिक कीटनाशक आदि की जांच नहीं होती है।

एक समस्या यह भी है कि सर्टिफिकेशन की इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच आपस में कोई संबंध नहीं है। मिसाल के तौर पर, निर्यातक पीजीएस वाली व्यवस्था की कोई मदद नहीं ले सकते, क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश इसके मानकीकरण को स्वीकार नहीं करते हैं। यही नहीं, जागरूक संस्थाएं और लोग स्वत: प्रमाणीकरण वाले इस इंतजाम को सही नहीं मानते। पर तथ्य यह है कि बाजार की कुछ ताकतों की इसकी ज्यादा फिक्र नहीं है। ऑनलाइन फल-सब्जी बेचने वाले एक प्लेटफॉर्म ने कर्नाटक में मैसूरु और गोकक में सौ पीजीएस-सर्टिफाइड किसानों से ऑर्गेनिक चावल, दालें आदि लेने का करार कर रखा है। सवाल है कि क्या वह अपने ग्राहकों को आश्वस्त कर सकता है, जो उसके जरिए बेचे गए उत्पाद सच में ऑर्गेनिक हैं।

उधर 2015 में देश का पहला पूर्ण ऑर्गेनिक राज्य घोषित किए गए सिक्किम में प्रमाणीकरण की थर्ड पार्टी व्यवस्था है। इसमें आमतौर पर पांच सौ किसानों का एक समूह होता है, जिसमें एक समूह के पैंतीस से पैंतालीस किसानों के खेतों की जांच की जाती है। ऑर्गेनिक खेती का प्रमाणीकरण करने वाली एक संस्था वनसर्ट एशिया के मुताबिक किसी किसान के ऑर्गेनिक खेत की सालाना जांच पर शुरुआती खर्च डेढ़ सौ से पांच सौ रुपए प्रति वर्ष है, लेकिन इसमें अगर इंटरनल ऑडिट और डॉक्यूमेंटेशन के खर्च को जोड़ा जाए तो फीस प्रति किसान ढाई हजार रुपए बैठती है। जबकि पीजीएस के तहत पहले तीन साल के लिए प्रति किसान प्रमाणीकरण की फीस एक हजार रुपए है, जो बाद वाले वर्षों में एक दहाई रह जाती है। प्रमाणीकरण की इन व्यवस्थाओं की एक समस्या यह है कि दो से पांच एकड़ की जमीन में खेती करने वाले किसान हर साल इसका खर्च नहीं उठा सकते।

मोटे तौर पर ऑर्गेनिक खेती का नियम यह है कि जिस खेत में रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल होता रहा है, उसमें कम से कम तीन साल तक सिर्फ गोबर की खाद या इसी किस्म की जैविक खाद का प्रयोग हो। साथ ही, कीटनाशकों के रूप में नीम या गोमूत्र से बने पेस्टीसाइड प्रयोग में लाए जाएं। पीजीएस के सर्टिफिकेशन वाली व्यवस्था में इन नियमों के पालन के बाद कोई बड़ा खेत पीजीएस-इंडिया ऑर्गेनिक चिह्न पाने योग्य हो जाता है। मगर सवाल है कि क्या इतने भर से कोई खेत ऑर्गेनिक कहलाने योग्य हो जाता है? अगर उस खेत के करीब रासायनिक खादों और कीटनाशकों का धुआंधार प्रयोग हो रहा है, तो हवा और रिसते हुए पानी के साथ वे रासायनिक ऑर्गेनिक खेत तक भी पहुंच सकते हैं। दूध के मामले में अगर मवेशी रसायन-युक्त चारा खाते हैं, तो उनका दूध और उससे बनने वाला पनीर कैसे ऑर्गेनिक हो सकता है। यही नहीं, ऐसे पशुओं के गोबर से बनी खाद भी ऑर्गेनिक नहीं रह जाती, लेकिन प्राय: बिना जांच के ऐसी गोबर-खाद का इस्तेमाल ऑर्गेनिक खेतों में होता है।

सिक्किम का करिश्मा

सिक्किम देश का पहला पूर्ण ऑर्गेनिक राज्य है। इसे यह पदवी 2015 में मिली। सिक्किम के इस करिश्मे का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने 2015 में अपने एक भाषण में कहा था कि अगर सिक्किम जैसा छोटा राज्य यह कमाल कर सकता है, तो सभी पूर्वोत्तर राज्यों को मिला कर संपूर्ण ऑर्गेनिक क्षेत्र क्यों नहीं बनाया जा सकता। सिक्किम में यह सपना काफी पहले, 2003 में देखा गया था और इसके लिए विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके बाद 2010 में सिक्किम ऑर्गेनिक मिशन की शुरुआत की गई। वर्ष 2010 में शुरू इस मिशन में राज्य की पचास हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार करने का अभियान शुरू किया गया। वर्ष 2015 में सिक्किम की चौहत्तर हजार तीन सौ तेरह हेक्टेयर कृषि भूमि को ऑर्गेनिक प्रमाणपत्र मिल गया था। वहां भी किसान पहले खेतों में रासायनिक खादों और रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन 2010 में इसे बिल्कुल रोक दिया गया। इसका असर उत्पादन पर पड़ा। वहां संतरे की मशहूर किस्म सिक्किम मंदारिन ऑरेंज का जो पेड़ पहले साल में दो हजार फल देता था, ऑर्गेनिक खेती शुरू होने पर सिर्फ पांच सौ फल प्रतिवर्ष दे पा रहा है।

सिर्फ दिमागी खलल

तथ्यों के मुताबिक, वर्ष 1939 में पहली बार कृषि विज्ञानी लॉर्ड नॉर्थबाउरेन ने अपनी किताब ‘लुक टु द लैंड’ में ऑर्गेनिक फार्मिंग शब्द का उल्लेख केमिकल फार्मिंग के उलट यह कहते हुए किया था कि यह प्रकृति के साथ संतुलन बनाने वाली खेती है। इसके बाद दुनिया में ऑर्गेनिक खेती का चलन रासायनिक खादों-कीटनाशकों के दुष्प्रभावों वाले दौर में धीरे-धीरे शुरू हुआ और एक फैशन बन गया। लेकिन इस बारे में अमेरिका तक में हुए अध्ययन बताते हैं कि जिन ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए न्यूनतम पचास फीसद ज्यादा कीमत चुकाई जाती है, वह हमें सिर्फ मानसिक सुकून देती है, इसके सिवा कुछ नहीं।

अमेरिका में हुए शोधों में पाया गया कि एक साथ रखने और खाने के लिए परोसे गए उत्पादों को लेकर ज्यादातर लोग इसका फर्क नहीं कर पाए कि उनमें से ऑर्गेनिक कौन-सा है और सामान्य खेतों में उगाया गया कौन-सा है। अमेरिकी संस्था- यूएसडीए ने वर्ष 2017 में बाजारों से उठाए गए ऑर्गेनिक उत्पादों के 571 नमूनों में 43 फीसद में प्रतिबंधित कीटनाशकों के अवशेष पाए थे और दावा किया था कि उनमें से कई उत्पादों पर ऑर्गेनिक की चिप्पी भले लगी थी, पर वे ऑर्गेनिक नहीं थे। असल में, सारा खेल लेबलिंग और प्रचार का है। हमें ऑर्गेनिक की चिप्पी एक दिमागी सुकून देती है कि हम इसके नाम पर जो खा रहे हैं, वह हमारी सेहत के लिए फायदेमंद है। यही नहीं, अब जिस तरह से शहरों में जीवन-शैली बदलने लगी है, लोग इस ऑर्गेनिक लेबल के पार जाकर देखने और इसकी जांच-परख की कोशिश भी नहीं कर पा रहे हैं कि वह कितना सही है।

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