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रविवारीः समलैंगिकता अपराध या अधिकार!

समलैंगिक संबंधों को लेकर दुनिया भर में बहस होती रही है। कई देश इसे कानूनी मान्यता दे चुके हैं। भारत में भी इसे निजी अधिकार बता कर समलैंगिकता को वैधता प्रदान करने की मांग उठती रही है। पर अड़चन यह है कि यहां की सामाजिक बनावट में ऐसे रिश्तों को सहज रूप से स्वीकार कर पाना बहुत सारे लोगों को लिए कठिन है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर सुनवाई की स्वीकृति दी है। समलैंगिकता को लेकर देश और दुनिया में चल रही बहसों की पड़ताल कर रहे हैं श्रीशचंद्र मिश्र।

Author September 2, 2018 7:23 AM
यह पहला मौका नहीं है जब समलैंगिकता का सवाल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पर पहले की तुलना में सुप्रीम कोर्ट की राय स्पष्ट दिखी है। पहले इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका खासी ढुलमुल रही।

श्रीशचंद्र मिश्र

यह पहला मौका नहीं है जब समलैंगिकता का सवाल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पर पहले की तुलना में सुप्रीम कोर्ट की राय स्पष्ट दिखी है। पहले इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका खासी ढुलमुल रही। 11 दिसंबर, 2013 को दिल्ली हाईकोर्ट ने दो बालिगों द्वारा आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया, तो सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को खारिज कर दिया था, लेकिन 2016 में धारा 377 के खिलाफ आठ सुधार याचिकाओं की सुनवाई करते हुए मामले को उसने संवैधानिक पीठ के हवाले कर दिया। इसके लिए पांच जजों की पीठ बननी थी। ऐसा न हो पाने की वजह से मामला लटक गया। धारा 377 करीब डेढ़ सौ साल से अस्तित्व में है। 1861 में जब लार्ड मैकाले ने आईपीसी का प्रारूप तैयार किया, तो इस अपराध को धारा 377 में कैद कर दिया। अब सारी बहस इसी धारा के समलैंगिकता को अपराध मानने वाले प्रावधान को खत्म करने पर छिड़ी हुई है। खासकर कुछ यूरोपीय देशों में समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता मिलने के बाद से भारत में वैसी ही व्यवस्था के पक्ष में अभियान तेज हो गया है। जो रिश्ते अभी तक संकोच और आशंका के परदे में छिपे थे अब उन्हें खुल कर स्वीकार करने की हिम्मत दिखाई जा रही है।

बड़े शहरों में हर साल समलैंगिक उत्सव मनाते हुए सड़कों पर निकलते हैं। हवा छोटे शहरों और कस्बों को भी अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। इसी के साथ यह बहस तेज हो गई है कि यौन आजादी को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में रखा जाए या नहीं? इसके पक्ष-विपक्ष में तरह-तरह की दलीलें सामने आई हैं। विरोधी इसे अप्राकृतिक और मानसिक बीमारी मानते हैं। उनका तर्क है कि समलैंगिकता की प्रवृत्ति को अगर बढ़ावा दिया गया तो इससे सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। समलैंगिकता का समर्थन करने वाले मुट्ठी भर लोग मानते हैं कि हर व्यक्ति को इस बात का अधिकार मिलना चाहिए कि वह किससे प्यार करे। इसमें समाज या सरकार का कोई दखल न हो। ऐसे लोग इस तरह के रिश्तों को विज्ञान सम्मत मानते हैं।

हाल में हुई कुछ घटनाएं बताती हैं कि देश में इस तरह के रिश्तों के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ा है। आमिर खान के टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ में समलिंगी रिश्तों की वकालत करने वाले हरीश अय्यर की मां ने अखबार में बाकायदा विज्ञापन देकर अपने बेटे के लिए सुयोग्य वर की मांग कर यह संकेत तो दे दिया कि कम ही सही, लेकिन समलैंगिक रिश्तों को लेकर पारिवारिक मानसिकता बदल रही है। हालांकि इसे पूरी तरह समाज की सोच में आए बदलाव के रूप में नहीं देखा जा सकता। स्त्री-पुरुष के रिश्तों को मान्यता देने वाला समाज अगर उदारवादी होता, तो सहारनपुर की दो सहेलियों को शादी करने पर जात-बिरादरी से बहिष्कृत न कर दिया जाता और न ही इसी साल जून में अमदाबाद में समलैंगिक विवाह कर चुकी दो महिलाओं को आत्महत्या करनी पड़ती।

यह कहना गलत होगा कि समलैंगिकता पश्चिमी देशों की नकल पर एक फैशन की तरह बढ़ा है। समलिंगी आकर्षण की प्रवृत्ति हमेशा से रही है। चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अचानक पैदा हुई आदत या विकृति नहीं है। यह आकर्षण जन्मजात होता है। बारहवीं सदी में वराह मिहिर ने अपने ग्रंथ ‘बृहत जातक’ में कहा था कि समलैंगिकता पैदाइशी होती है और इस आदत को बदला नहीं जा सकता। इस सिलसिले में एक वैश्विक अध्ययन भी हुआ, जिसमें पाया गया कि 28 फीसद महिलाएं और 50 फीसद पुरुष अपने जीवन में कभी न कभी समान सेक्स की तरफ आकर्षित होते हैं। यह अलग बात है कि इनमें से बहुत कम ऐसे रिश्तों के प्रति लगातार गंभीर हो पाते हैं।

पिछले कुछ सालों में समलैंगिकता के पक्ष में कुछ ज्यादा ही आवाज उठी है। करन जौहर की फिल्म ‘दोस्ताना’ में इस तरह के रिश्ते को स्वीकार्यता दी गई। दीपा मेहता की ‘फायर’ में पतियों से उपेक्षित दो महिलाओं के आकर्षण को प्राकृतिक बताने की कोशिश की गई। टीवी पर अपराध केंद्रित कार्यक्रम में ऐसे रिश्तों की अलग-अलग तरह से पड़ताल हुई है। कुछ कहानियों में दिखाया गया कि पारिवारिक दबाव में समलैंगिक सामान्य शादी तो कर लेता है, लेकिन उसके अपनी पत्नी के साथ संबंध कभी सहज नहीं हो पाते। अभिनेत्री किरण खेर ने कुछ समय पहले बयान दिया था कि फिल्म इंडस्ट्री में समलैंगिकता का काफी चलन है। कई हस्तियां समलैगिंक हैं, लेकिन संकोच और छवि बिगड़ जाने के डर से वे इसे स्वीकार नहीं करतीं। सामाजिक या पारिवारिक दबाव की वजह से अपनी समलैगिंक प्रवृत्ति को दबा कर रखने की जो बाध्यता थी वह अब टूट रही है।

भारत में समलैंगिकता को लेकर सामाजिक प्रतिबद्धता कायम है। समाज या परिवार ऐसे रिश्तों को स्वीकार करने के लिए अभी उदार नहीं हुए हैं। ऐसे रिश्ते वितृष्णा की तरह देखे जाते हैं। इसीलिए समलैंगिकता न सिर्फ अपराधबोध पैदा करती है, बल्कि अपराध का कारण भी बनती है। एक तर्क यह है कि समलैंगिक संबंध प्राकृतिक रूप से विकसित नहीं होते, बल्कि विपरीत सेक्स उपलब्ध न होने की कुंठा में पनपते हैं। इसमें उम्र का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसीलिए ऐसे रिश्ते यौन अपराध की शक्ल ले लेते हैं। कुछ नया और अलग करने की चाहत ऐसे अपराधों को हमेशा बढावा देती रही है। कम उम्र के बच्चे इस लिप्सा का अक्सर शिकार होते है। विभिन्न जेलों से समय-समय पर आने वाली रिपोर्टों से पता चलता है कि अक्सर कम उम्र के कैदी शातिर अपराधियों के यौन शोषण का निशाना बनते हैं। यह सीधे-सीधे दमन का मामला है और इस आधार पर समलैगिंकता को व्यक्तिगत पसंद मानने की वकालत नहीं की जा सकती।

स्त्री-पुरुष के पारंपरिक रूप से स्वीकार्य संबंध समाज और परिवार की बुनियाद का मूल अंग है। समलैगिंकता को स्वीकार किए जाने से उस बुनियाद पर तो चोट लगेगी ही। रिवाज बदल रहे हैं, आदतें बदल रही हैं। ऐसे में कई नई व्यवस्था बनाने को आतुर लोगों की इस दलील को माना जा सकता है कि प्यार करना जुर्म नहीं है। कोई पुरुष पुरुष के साथ या महिला महिला के साथ रहना पसंद करे और ऐसे रिश्ते से किसी को नुकसान न हो, तो उसमें सरकार या समाज को कोई आपत्ति क्यों हो? सामाजिक स्तर पर यह मुद्दा बड़ी बहस का कारण नहीं बन पाया है। पारंपरिक सोच को बदलना आसान नहीं होता। कुछ संगठन समलैंगिकता के पक्ष में अभियान चला रहे हैं, तो कुछ परंपराओं का हवाला देकर इसका विरोध कर रहे हैं।

जहां तक कानून की बात है, भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिकता अपराध है। जिस तरह ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान बने बहुतेरे कानूनों को आज भी ढोया जा रहा है उसी तरह लॉर्ड मैकाले ने भारतीय दंड संहिता का ड्राफ्ट बनाते समय उसमें समलैंगिकता को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध मानने वाली धारा 377 का प्रावधान किया था, भारत में उसी पर अमल हो रहा है। 2001 में एनजीओ ‘नाज फांउडेशन’ ने दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर मांग की कि अगर दो वयस्क रजामंदी से अकेले में संबध बनाते हैं, तो उन पर धारा 377 लागू न हो। जुलाई, 2009 में अदालत ने समलैंगिकता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ दिया, लेकिन 11 दिसंबर, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की व्यवस्था को बदल दिया और कहा कि धारा 377 को हटाने या संशोधित करने पर संसद फैसला करे।

कई देशों में मान्यता

समलैंगिक रिश्तों को लेकर बरसों तक जो सामाजिक संकोच बना रहा, वह पिछले डेढ़ दशक में दुनिया के कई देशों में तेजी से टूट रहा है। इसके लिए आंदोलन हुए। कुछ देशों में जनमत संग्रह का सहारा लिया गया, तो कुछ देशों में ऐसे रिश्तों पर कानूनी मुहर लग गई। अप्रैल, 2001 में पहली बार नीदरलैंड में समलैंगिक जोड़ों को शादी करने और बच्चे गोद लेने की इजाजत दी गई। उसके बाद से अमेरिका समेत करीब बीस देशों में समलैंगिकों की शादी को वैध मान लिया गया। क्रोएशिया और स्लोवेनिया में इस सवाल पर छह साल पहले लोगों की राय ली गई। क्रोएशिया में तो इस तरह की व्यवस्था को जनमत संग्रह में खारिज कर दिया गया। स्लोवेनिया में हुए जनमत संग्रह में भी समलैंगिकता के खिलाफ वोट पड़े, लेकिन मार्च 2015 में वहां की संसद ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का प्रस्ताव पास कर दिया।

यूरोपीय देशों में समलैंगिकता को ज्यादा गर्मजोशी के साथ स्वीकार किया गया है। मई, 2015 के आखिरी हफ्ते में आयरलैंड दुनिया का पहला देश बना, जिसने विवाह में लिंग का भेद खत्म करने को संवैधानिक अधिकार घोषित किया। नीदरलैंड में 2001 में हुई पहल के बाद कई देशों ने इस दिशा में कदम बढ़ाए। जून, 2003 में बेल्जियम में कुछ बंदिशों के साथ समलैंगिक शादी को स्वीकार किया गया। ऐसे जोड़ों को बच्चा गोद लेने की इजाजत नहीं दी गई। 2006 में यह बंदिश भी हटा ली गई। समलैंगिक रिश्ते या शादी को मान्यता देने के बाद कुछ देशों में यह हिचक बनी रही कि क्या ऐसे जोड़ों को बच्चे गोद लेने की इजाजत मिलनी चाहिए। स्पेन की सोशलिस्ट सरकार ने जुलाई 2005 में इसका समाधान निकाला। लिंग भेद तोड़ कर होने वाली शादी को कानूनी जामा पहनाने के साथ यह फैसला भी किया गया कि समलैंगिक जोड़ों ने शादी भले न की हो, अगर वे चाहें तो बच्चा गोद ले सकते हैं।

अन्य देशों ने ‘उदारवादी’ कदम उठाने के बाद भी बच्चा गोद लेने का अधिकार समलैंगिक जोड़ों को देने में थोड़ा समय लगाया। आयरलैंड अपवाद रहा। वहां 2006 में समलैंगिक जोड़ों को बच्चा गोद लेने का अधिकार तो मिल गया, लेकिन उनकी शादी को जून, 2010 में वैध माना गया। यही स्वीडन में भी हुआ। सेक्स को लेकर तमाम तरह की वर्जनाएं तोड़ने में पहल करने वाले इस देश में बच्चा गोद लेने की इजाजत 2003 में ही दे दी गई, पर समलैंगिक शादी को मई, 2009 में स्वीकार किया गया। पुर्तगाल में उसी दौरान समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता दे दी गई। लेकिन वहां ऐसे जोड़ों को बच्चा गोद लेने की इजाजत नहीं है। नार्वे में जनवरी 2009 में लिंग के आधार पर सभी तरह के भेदभाव खत्म कर दिए गए। वहां पहले जुलाई 2005 में कनाडा की सरकार ने हर व्यक्ति को अपनी इच्छाओं से कैसी भी जीवनशैली अपनाने का अधिकार देने वाला कानून लागू कर दिया था। नवंबर 2006 में दक्षिण अफ्रीका इसी तरह की व्यवस्था को लागू करने वाला पहला अफ्रीकी देश बना।

लैटिन अमेरिकी देशों में पहली बार मैक्सिको में 2009 में समलैंगिक शादी पर कानूनी मुहर लगी। एक साल बाद जुलाई 2010 में अर्जेंटीना भी इस कतार में जुड़ गया। उरुग्वे में समलैंगिक जोड़ों को बच्चे गोद लेने का अधिकार तो दे दिया गया, लेकिन ऐसे शादियों को अप्रैल 2013 में ही कानूनी मान्यता मिल पाई। ब्राजील में 14 मई, 2013 को पुरुष-पुरुष या महिला-महिला की शादी को राष्ट्रीय न्याय परिषद के निर्देश पर मान्य करार दे दिया गया और ऐसी शादियों को पंजीकृत करने का कानून वहां की संसद ने बना दिया। बदलती जीवन शैली में कुछ नया कर दिखाने की ललक में पारंपारिक मानसिकता आड़े जरूर आई, लेकिन वह ज्यादा समय टिक नहीं पाई। न्यूजीलैंड में सताईस साल तक समलैंगिक रिश्तों को अपराध माना गया। लेकिन तेजी से आ रहे बदलाव की वजह से 2013 में वहां भी समलैंगिक शादियों पर कानून का ठप्पा लग गया।

इंग्लैंड और वेल्स में जुलाई 2013 में स्काटलैंड में फरवरी 2014 में ऐसा कानून बना। फ्रांस मई 2013 में और लक्जमबर्ग जून 2014 में इस कतार में जुड़े। फिनलैंड में समलैंगिक शादी को 2014 में हुए जनमत संग्रह मे लोगों के मंजूरी तो मिल गई है लेकिन इसके लिए कानून 2017 में ही बन पाया। इन ज्यादातर देशों में पारिवारिक समारोहों की तरह शादी करने की छूट मिली हुई है। डेनमार्क और स्वीडन में तो ऐसी शादियों को चर्च में कराने की भी इजाजत है। अमेरिका में जून 2013 में समलैंगिक शादी को वैध मानने की प्रक्रिया शुरू हुई। वांशिगंटन समेट सैंतीस राज्यों में यह फैसला अमल में भी आ गया। तब सुप्रीम कोर्ट की राय थी कि समलैंगिक जोड़ों को भी सामान्य जोड़ों की तरह अधिकार और संरक्षण मिलना चाहिए। इसके लिए अरसे से मांग हो रही थी। इसी साल जून में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को पूरे देश के लिए कानूनी मान्यता दे दी। हालांकि यह फैसला आम राय से नहीं हुआ। पांच जज इसके समर्थन में थे तो चार ने इसका विरोध भी किया। राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बॉबी जिंदल ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पर ही निशाना साधा। उनका कहना था ‘महिला और पुरुष की शादी ईश्वर ने तय की है। इस व्यवस्था को कोई अदालत नहीं बदल सकती।’

हस्तियों ने बढ़ाया फैशन

पिछले करीब डेढ़ दशक में समलैंगिक रिश्तों को मिली सामाजिक और कानूनी स्वीकार्यता के पीछे उन हस्तियों का ज्यादा योगदान है, जिन्होंने ऐसे रिश्तों को अपनाया और उनकी वकालत करने को निजी स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ दिया। अमेरिका में समलैंगिकों को समान अधिकार देने का आंदोलन दशकों तक चला। इसे हॉलीवुड की नामी-गिरामी हस्तियों के साथ कई अन्य दिग्गजों का भी समर्थन मिला। समलैंगिक रिशतों को जायज ठहराने वाली कुछ फिल्में भी हॉलीवुड में बनीं। इस उन्मुक्तता ने फैशन का रूप तब ले लिया जब कुछ हस्तियों ने सार्वजनिक रूप से ऐसे विशेष रिश्तों को स्वीकार किया। 1997 में एलेन डेगेनेरेस ने टीवी पर ऑपरा विन्फ्री शो में खुद को समलैंगिक बता कर पेश किया। अपनी मित्र पोर्टिया द रोसी से चार साल तक डेटिंग करने के बाद 2008 में उन्होंने उससे शादी कर ली।

अभिनेत्री जोड़ी फोस्टर ने 2013 के गोल्डन ग्लोब्स पुरस्कार समारोह में घोषित किया कि वे समलैंगिक हैं। उन्होंने अप्रैल 2014 में अपनी मित्र एलेक्जांद्रा हेडिसन से शादी कर ली। अभिनेता नील पैट्रिक हैरिस ने फिल्म ‘हाउ आई मैट योर मदर’ के साथी कलाकार डेविड बर्तका से 2014 में शादी कर ली थी। 2015 में आॅस्कर पुरस्कार समारोह का संचालन करने वाले पहले समलैंगिक व्यक्ति होने का मौका भी उन्हें मिल गया। कई साल पहले लान टेनिस स्टार मार्टिना नवरातिलोवा की इस स्वीकारोक्ति ने खेल जगत में तहलका मचा दिया था कि उनकी महिलाओं में रुचि है। मार्टिना उम्र के पचासवें साल के करीब होने तक प्रतिस्पर्धात्मक खेल में सक्रिय रहीं। कोई ऐसा वैश्विक खिताब नहीं बचा, जो उन्होंने जीता न हो। दिसंबर 2014 में मार्टिना ने लंबे समय तक अपनी प्रेमिका रहीं ब्यूटी क्वीन जूलिया लेमीगोवा से शादी कर ली।

ब्रिटिश संगीतज्ञ एल्टन जॉन 2005 से अपने पुरुष मित्र डेविड फर्निश के साथ रह रहे थे। जुलाई 2013 में इंग्लैंड और वेल्स में एक ही लिंग में शादी को व्यक्ति का निजी अधिकार मानने का कानून बन जाने के बाद दोनों ने शादी कर ली। इस तरह के रिश्ते जोड़ने में सिर्फ ग्लैमर की दुनिया के लोगों ने ही उत्सुकता नहीं दिखाई, राजनेताओं ने भी खासा उत्साह दिखाया है। जून 2014 में लक्जमबर्ग में संसद ने समलैंगिक शादी को मंजूरी दी। एक साल बाद मई 2015 में वहां के प्रधानमंत्री जेवियर बेटेल ने अपने पुरुष मित्र से शादी कर ली। सत्ता में रहते हुए समलैंगिक शादी करने वाले वे यूरोपीय संघ के पहले राज्य प्रमुख थे।

आयरलैंड में समलैंगिकता को मान्यता क्या मिली कि उसी दिन टीवी पर सीनेटर कैथरीन जप्पोन ने सालों से अपनी प्रेमी एन लुइस गिलीगन के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। कैथरीन मूल रूप से अमेरिका की हैं। आयरिश संसद की वे सदस्य हैं। वैसे लियो वराद कर आयरलैंड के पहले समलैंगिक केबिनेट मंत्री हैं। राजनीतिक स्तर पर भी समलैंगिक रिश्तों को मान्यता दिलाने की पहल हुई है। 2010 में अगले कार्यकाल के लिए चुनावी जमीन तैयार करने के मकसद से राष्ट्रपति बराक ओबाम ने अमेरिकी सेना में समलैंगिक सैनिकों की भर्ती के लिए कानून बना दिया था।

2013 में उन्हीं की पहल पर अदालत ने 1996 के उस कानून को असंवैधानिक करार दिया था जिसमें व्यवस्था थी कि पुरुष और महिला की शादी होने की स्थिति में ही उन्हें सरकारी सुविधाएं मिलेंगी। समलैंगिक जोड़ों में ज्यादा समझ और घनिष्ठता होती है, इस धारणा को कुछ सेलिब्रिटी के रिश्तों में आए अलगाव ने गलत भी साबित किया है। मशहूर गायक रिकी मार्टिन और कार्लोस गोजांलेस का चार साल का साथ 2014 में टूट गया। जार्ज माइकल तो 1996 से केनी गॉस के प्रेमी रहे। उनके आदर्श रिश्ते की मिसाल दी जाती थी। 2011 में माइकल ने गॉस से नाता तोड़ने का एलान कर सबकों चौंका दिया।

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