ताज़ा खबर
 

उड़त अबीर गुलाल

रंगों के उत्सव होली की परंपरा बहुत पुरानी है। देश के अलग-अलग हिस्सों और समयों में इसके अलग-अलग रंग रहे हैं। लोक से लेकर शास्त्रीय परंपरा तक होरी गायन की अलग-अलग शैलियां हैं, पर सबमें मूल तत्त्व एक है। प्राचीन काल से लेकर अब तक देश के विभिन्न हिस्सों में होरी गायन की परंपरा कैसे आगे बढ़ती आ रही है, साहित्य से लेकर विभिन्न कलाओं में होली की कैसी-कैसी छवियां अंकित हैं, बता रहे हैं रघुवीर सिंह।

Author February 25, 2018 1:46 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

छम-छम नाचत आई बहार, पात-पात ने ली अंगड़ाई, झूम रही है डार-डार।’ कुदरत ने मौसम में रंग भर दिए हैं और फागुन बौरा गया है। रंगों की बौछार में नर्तकों का तन-मन नृत्य करने को मचल उठा है। लय और ताल के साथ पैरों को रोकना मुश्किल हो गया है। कहीं चित्रकार अपने चित्रों में रंग भरने लगे हैं, तो कहीं कवियों के मन में उमंग जाग उठी है। गवैयों ने तान की तरंग छेड़ दी है और वे फाग के राग गाने लगे हैं। पूरी संस्कृति गा उठी है। रंग अपना असर बता रहे हैं, तो सुर और ताल अपनी धुन में सबको डुबोए चले जा रहे हैं।

होली के सतरंगी रंगों के साथ भारतीय संगीत के सात सुरों का अनोखा रिश्ता है। तभी तो ब्रज के होरी और रसिया लोकगीतों ने शास्त्रीय संगीत की धमार और ध्रुपद का रूप ले लिया। धमार संगीत सम्राट बैजू बावरा के स्वर-ज्ञान के गर्भ से निकली तो ठुमरी नवाब वाजिद अली शाह के कला-प्रेम की तरंगों से और आज तक दोनों फागुनी रंग में मस्ती भरती हैं। कहीं धमार की गूंज सुनाई देती है- ‘आज पिया होरी खेलन आए…’, तो कहीं ध्रुपद की बंदिश ‘खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी’ फिजा में होली के रंग घोल देती है। बनारस की सुबह छन्नूलाल मिश्र की ठुमरी से होती है- ‘दिगंबर खेलें मसाने में होरी…’ और अवध की शाम भी ‘खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी’ से। बीच में शोभा गुर्टू ब्रज में लोक रंग बिखेर देती हैं- ‘आज बिरज में होरी रे रसिया…’, यानी हर प्रदेश और हर बोली में होली के वर्णन सुनाई देते हैं, जिनमें उस जगह का इतिहास और धार्मिक महत्त्व भी छुपा है। होली के गीत बसंत, बहार, हिंडोल, काफी, खमाज, ललित आदि रागों और दीपचंदी ताल में गाए जाते हैं। उपशास्त्रीय संगीत में दादरा और चैती में भी होली खूब चलती है। गिरिजा देवी का वह दादरा याद कीजिए- ‘उड़त अबीर-गुलाल लाली छाई है’। रंग और संगीत चोली-दामन की तरह एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। काफी की धुन ‘आज खेलो शाम संग होरी, पिचकारी रंग भरी सोहत री’ फागुनी मस्ती में खो जाती है और होली, धमार, ठुमरी पर नर्तकों का मन-मयूर कथक कर उठता है- ‘चलो गुइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर…।’

कहते हैं, ‘सब जग होरी, ब्रज को होरा।’ बरसाने तथा नंदगांव की लट्ठमार होली और बलराम के गांव बलदेव के हुरंगा का अलग ही रंग है। ब्रजवासियों में मौसम की मस्ती का यह नशा माघ पूर्णिमा से चढ़ कर चालीस दिन तक छाया रहता है और रंगपंचमी यानी फागुन कृष्णपंचमी को रंगों की फुहारों के साथ ही उतरता है। तब तक रसिया गायन में शृंगार रस में भक्ति और अध्यात्म की चर्चा चलती है। ब्रज और अवध से सटे उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड की होली का रंग भी निराला है, जहां अवधी और ब्रज मिश्रित स्थानीय भाषा में ‘अरी भागो री भागो री गोरी भागो, रंग लायो नंद को लाल’ गाने वाले आपको आसानी से मिल जाएंगे। रुहेलखंड का बरेली इकलौता ऐसा शहर है, जहां होली के दौरान रामलीला का मंचन होता है और रामबरात निकलती है, जिसमें रामचरित मानस की आधार-भूमि और राधेश्याम कथावाचक के बोल शामिल रहते हैं। इस परंपरा का जन्म 1861 में हुआ और अब यह विश्व धरोहर बन चुकी है। ब्रिटिशकाल में इसको रोकने की कोशिश की गई, लेकिन मुस्तिम संत आला हजरत इमाम अहमद खान की गवाही के बाद इस अनूठी रामलीला को सरकारी मान्यता मिल गई।

उत्तराखंड के कुमाऊं में तो होली पूरे तीन महीने चलती है। तबला और हुड़के की थाप, मंजीरे की खनखन और हारमोनियम के मधुर सुरों पर जब ‘ऐसे चटक रंग डारो कन्हैया’ गाया जाता है, तो सभी झूम उठते हैं। तिहाई पूरी होते ही लगता है कि राग विहाग की खूबसूरत बंदिश खत्म हो गई, लेकिन तभी होल्यारों के मुखड़ा पकड़ लेने से तबले पर चांचर का ठेका शुरू होने से पहले ही ‘होली’ फिर शबाब पर पहुंच जाती है। कुमाऊंनी होली के दो रूप हैं- बैठकी होली और खड़ी होली। बैठकी होली का आगाज अधिकतर राग श्याम कल्याण से होता है और समापन भैरवी से। दिन के वक्त पीलू, भीमपलासी या सारंग में तानें छेड़ी जाती हैं और शाम को कल्याण और यमन के स्वर गूंजते हैं। शुरुआत किसी मंदिर के आंगन से पौष माह में होती है। फाल्गुन एकादशी को देव मंदिर में चीन बंधन के बाद खड़ी होली की शुरुआत होती है, जिसमें होल्यार ढोलक और मंजीरे की लय पर नाचते-गाते कुमाऊं की सड़कों पर वृत्ताकार घूम-घूम कर गांव के हर घर के आंगन में होली गायन करते हैं। होली की ये बैठकें खत्म होती हैं आशीर्वाद के साथ और अंत में गाई जाती है ठुमरी- ‘मुबारक हो मंजरी फूलों भरी, ऐसी होली खेलें जनाब अली।’ पुरुषों की बैठकी होली में ठुमरी और खयाल गाए जाते हैं, तो महिलाओं का रुझान लोकगीतों की ओर रहता है। वे स्वांग भी रचती हैं और स्वर-लहरियों के साथ संस्कृति की इस विशिष्टता में दिलकश रंग भरती हैं। उनके ज्यादातर गीत देवर-भाभी की हंसी-मजाक पर आधारित होते हैं- ‘फागुन में बुढ़वा देवर लागे।’ प्रसिद्ध जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ ने एक बार बताया था- ‘यहां की होली में अवध से लेकर दरभंगा तक की छाप है। राजे-रजवाड़ों का संदर्भ देखें तो जो राजकुमारियां यहां ब्याह कर आर्इं, वे वहां के रीति-रिवाज भी अपने साथ लार्इं। यह परंपरा वहां भले ही खत्म हो गई, लेकिन यहां आज भी कायम है।’

भोजपुरी प्रदेश में लोक गायन की विधा जोगीरा की धूम रहती है- ‘जोगीरा सा रा रा रा… जानी के जान न छूटे, ढोलक के ताल न टूटे… जोगीरा सा रा रा रा…।’ पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, झारखंड तक वृद्ध, युवा, बच्चे- सभी जोगीरा के योग में समा जाते हैं। होली गीत जोगीरा का साथ पाकर जवान हो जाता है। तिस पर लयकारी के बेमिसाल फनकार बंसरोपन सिंह के मधुर कंठ से जोगीरा के बोल निकलते हों, तब तो बच्चों का भी उनके साथ ‘जोगीरा सा रा रा रा…’ गाना लाजिमी है। भले उनका बालमन यह न समझे कि जोगीरा महज सा रा रा रा नहीं है, बल्कि उसमें तो गायन की सभी विधाएं समाहित हैं, सभी नौ रस विद्यमान हैं, हालांकि ज्यादा जोर शृंगार, वीर, हास्य और भक्ति रस पर रहता है। भोजपुरी के जानकार कुमार नरेंद्र सिंह से एक बार पूछा तो उन्होंने बताया, ‘जोगीरा मूल रूप से दोहा होता है, लेकिन इसमें झूमर, कजरी, आल्हा और अन्य लोक धुनों का समावेश रहता है। जोगीरा कई नामों से जाना जाता है, जैसे- चौताल, उलेरा, लेज, बैसवारा, रसिया, कबीरा आदि। चौताल भारतीय संगीत की एक ताल का नाम भी है, लेकिन जोगीरी में यह समाहित है।’ रसिकता से भरे जोगीरा के बोल मन को मोह लेते हैं और तन में तरुणाई छाने लगती है। इस जोगीरा को सुन कर किसकी देह न गनगना उठे- ‘चोली करे कसमस झूला बूटीदार, आंख के कजरा कनखी मारे आव पास हमार…।’ जब गायक झूला बूटीदार पर तान लेता है तो उसकी टोली के अन्य सदस्य उसके सुर में सुर मिलाते हुए दोहराते हैं- ‘चोली बूटीदार हो भइया चोली बूटीदार’ और फिर ‘जोगीरा सा रा रा रा…’ पर स्वर समवेत हो जाता है। स्वर-लय-ताल के उतार-चढ़ाव और लटके-झटके के बीच जब झपताल का आरोप होता है, उस वक्त यही अहसास होता है कि दुनिया में ताल और सुर के सिवा कुछ है ही नहीं।

चित्र-फलक पर होली के रंग
प्राचीन चित्रों, भित्ति-चित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी के सोलहवीं सदी के एक चित्र-फलक पर राजकुमार और राजकुमारियां दासियों संग रंग और पिचकारी से राज दंपति को रंग रही हैं। इसी सदी की अहमदनगर की एक चित्र आकृति का विषय भी बसंत रागिनी है, जिसमें राजपरिवार का एक दंपति बगीचे में झूला झूल रहा है और सेविकाएं नृत्य-गीत के साथ एक-दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रही हैं। सत्रहवीं शताब्दी की मेवाड़ की एक कला-कृति में महाराणा अपने दरबारियों संग लोगों को उपहार दे रहे हैं, नर्तकियां नृत्य कर रही हैं और इन सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी के एक लघुचित्र में राजा हाथीदांत के सिंहासन पर बैठा है, जिसके गालों पर महिलाएं गुलाल मल रही हैं।

ब्रज में खेले फाग कन्हाई, राधे संग सुहाई
फाग की मस्ती और होली की बहार में कवियों का मन भी मचल उठता है। आदिकालीन विद्यापति, चंद बरदाई से लेकर भक्तिकाल के सूर, रहीम, रसखान, जायसी, पद्माकर, मीराबाई, कबीर, तुलसीदास और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद से लेकर आधुनिक लोक कवि ईसुरी तक सबको बसंत, फागुन और होली प्रिय रहे हैं। महाकवि सूरदास ने बसंत और होली पर अठहत्तर पद लिखे हैं, तो मीराबाई भी खुद को कृष्ण के साथ होली खेलने से नहीं रोक पाई हैं- ‘रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री, होली खेल्यां स्याम संग रंगसूं भरी री।’ कवि रसखान ब्रज में ही हैं, लिहाजा वह होली का मनोहारी चित्रण करते हैं- ‘फागुन लाग्यौ सखि जब तें तब तें ब्रजमंडल में धूम मच्यौ है/ नारि नवेली बचै नाहिं एक बिसेख मरै सब प्रेम अच्यौ है/ सांझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलालन खेल मच्यौ है/ को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटु जिहिं मान बच्यौ है।’ बुंदेली के लोक कवि ईसुरी ब्रज में पहुंच जाते हैं- ‘ब्रज में खेले फाग कन्हाई, राधे संग सुहाई/ चलत अबीर रंग केसर को, नभ अरुनाई छाई।’ होली की बहार में भारतेंदु जी भी फगुनिया जाते हैं और गाते हैं- ‘गले मुझको लगा लो ऐ मेरे दिलदार होली में, बुझे दिल की लगी मेरी भी ऐ यार होली में।’ फाग के मस्ताने मौसम ने कहानीकारों की रचना-भूमि भी तैयार की है। आधुनिक हिंदी कहानियों में प्रेमचंद की ‘राजा हरदोल’, प्रभु जोशी की ‘अलग-अलग तीलियां’, तेजेंदर शर्मा की ‘एक बार फिर होली’, ओमप्रकाश अवस्थी की ‘होली मंगलमय हो’ और स्वदेश राणा की ‘हो ली’ में होली के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।

आज न छोड़ेंगे बस हमजोली…
भारतीय फिल्मकार भी फाग की फुहार और होली की बौछार में भीगे नजर आते हैं। शशि कपूर की ‘उत्सव’, यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’, वी शांताराम की ‘झनक झनक पायल बाजे’ और ‘नवरंग’ ऐसी ही फिल्में हैं। ठुमरी अंग में ‘नवरंग’ का ‘अरे जा रे हट नटखट, ना छेड़ मेरा घूंघट’ गीत तो नींव का पत्थर है, जिसे सी. रामचंद्र ने राग पहाड़ी में रचा और बोल लिखे भरत व्यास ने। इस गीत को गाया था स्वयं सी. रामचंद्र, आशा भोंसले और महेंद्र कपूर ने। भारतीय रागों की छाया से निकले इसी फिल्म के ‘आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार’ और ‘सिलसिला’ के ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे’ को भी बिसराया नहीं जा सकता। ‘मदर इंडिया’ के ‘होली आई रे कन्हाई, होली आई रे’ और ‘कोहिनूर’ के ‘तन रंग लो जी अजी मन रंग लो, तन रंग लो’ को भी लोग भूल नहीं पाए हैं। हर साल होली आते ही ‘कटी पतंग’ का ‘आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली’, ‘शोले’ का ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं’ और ‘बागवान’ का ‘होली खेले रघुवीरा अवध में, होली खेले रघुवीरा’ फिजा में गूंजने लगते हैं।

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

होली के रंगों ने सूफी-संतों और मुसलिम कवियों को भी खूब रंगा है। अलबरूनी का ‘सफरनामा’ बताता है कि अकबर, जोधाबाई और जहांगीर, नूरजहां संग होली खेलते थे। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहांगीर होली खेलते नजर आते हैं। शाहजहां के दौर में होली ने ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) का रूप ले लिया था। कहते हैं कि लखनऊ में एक बार होली, मुहर्रम के महीने में पड़ गई, तो वाजिद अली शाह ने मुहर्रम में भी होली खेली। यह भी कहा जाता है कि अमीर खुसरो होली के दिन ही निजामुद्दीन औलिया के मुरीद बने थे और उन्होंने दिल्ली के कालकाजी मंदिर से सूफी परंपरा में बसंत तथा होली मनाने का रिवाज शुरू किया। खैर, अजमेर में तो ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर होली के रंग बिखरते ही हैं- ‘हजरत ख्वाजा संग खेलिए धमाल, बाइस ख्वाजा मिल बन-बन आयो, तामें हजरत रसूल साहब जमाल।’ सूफी शाह नियाज ने तो अपने कलाम में हजरत अली और उनके बेटों हसन और हुसैन तक का जिक्र किया है- ‘होली होय रही है अहमद जियो के द्वार, हजरत अली का रंग बनो है, हसन-हुसैन खिलार’, जिसे आबिदा परवीन ने गाया है। बाबा बुल्ले शाह अपनी होली रचना की बिस्मिल्लाह यों करते हैं- ‘होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह/ नाम नबी की रतन चढ़ी, बूंद पड़ी इल्लल्लाह’, तो बहादुर शाह जफर का कलाम आज भी गाया जाता है- ‘क्यों मो पे रंग की मारी पिचकारी, देखो कुंवरजी दूंगी मैं गारी…।’ हसरत मोहानी को कृष्ण छेड़ रहे हैं- ‘मोसे छेड़ करत नंदलाल, लिए ठाड़े अबीर गुलाल, ढीठ भई जिनकी बरजोरी, औरन पर रंग डाल डाल’, तो जोश मलीहाबादी होली में गोकुल पहुंच गए हैं- ‘गोकुल बन में बरसा रंग, बाजा हर घर में मिरदंग, खुद से खुला हर इक जूड़ा, हर इक गोपी मुस्काई, हिरदै में बदरी छाई।’

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App