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कहानीः फटा जूता

सारा सामान रख लिया, कुछ रह तो नहीं गया! सोलंकी ने एक दृष्टि जमीन पर बिछी बोरी पर डाली। हां, सब कुछ रख लिया, मन ही मन आश्वस्त होते हुए उसने अपनी छोटी-सी बकसिया बंद की।

नीरजा हेमेंद्र

सारा सामान रख लिया, कुछ रह तो नहीं गया! सोलंकी ने एक दृष्टि जमीन पर बिछी बोरी पर डाली। हां, सब कुछ रख लिया, मन ही मन आश्वस्त होते हुए उसने अपनी छोटी-सी बकसिया बंद की। जमीन पर बिछी बोरी को लपेट कर सिर पर रखा। बकसिया को सिर पर रखी बोरी पर रख संतुष्ट होते हुए घर की ओर चल पड़ा। वह खुश था कि आज इतनी कमाई हो गई थी कि घर में सभी के भोजन का इंतजाम हो जाएगा। वरना कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि शाम के भोजन की सामग्री लाने भर की कमाई नहीं होती, ऐसे में बनिए की दुकान से उधार सामान लाना पड़ता है। लगभग दस मिनट पैदल चलने के बाद वह घर पहुंच गया।

घर में एक कोने में बकसिया रख कर वह चारपाई पर बैठ गया। उसकी पत्नी केवली कमरे के कोने में बने चूल्हे के पास बैठी कुछ कर रही थी। शायद शाम का भोजन बनाने की तैयारी करना चाहती होगी, पर आटा-दाल न होने के कारण कुछ कर नहीं पा रही होगी। सोलंकी जानता है कि वह चूल्हे के पास बैठी उसी की प्रतीक्षा कर रही है कि कब वह आए और आटा-दाल लाए तो भोजन बने। यह रोज का काम है जब केवली शाम को सोलंकी के आने की प्रतीक्षा इसी प्रकार करती है। सोलंकी झोंपड़ी के बाहर निकल अपने छोटे लड़के को ढूंढ़ने लगा। उसे घर के लिए सौदा मंगाना था। वह सामने एक पान की दुकान पर बैठा दिखाई दिया।

‘नरेन… ओ नरेन।’ उसने लड़के को आवाज लगाई। ‘बोलो बाबू…।’ लड़के ने वहीं से ऊंची आवाज में कहा। ‘हियां आ, अम्मा से पूछ कर बनिए की दुकान से रसोई का सामान ले आ।’ सोलंकी ने कहा। ‘हां, ध्यान रखियो, पैसे इतने ही हैं। सारा सामान संभाल कर ले अइयो।’ सोलंकी ने दस-दस के कुछ नोट और कुछ सिक्के नरेन के हाथ पर रखते हुए कहा। पैसे लेकर नरेन कमरे के भीतर अम्मा के पास सामान पूछने चला गया। सोलंकी सड़क पर लगे नल पर हाथ मुंह धोने चला गया। इस शहर के फुटपाथ के एक कोने में सोलंकी अपनी दुकान लगाता है। उसे ठीक-ठीक कुछ याद नहीं कब से, पर इतना याद है कि बचपन से। रोज सामान सजा कर बैठना और शाम का धुंधलका घिरते ही सामान समेट कर टिन की छोटी बकसिया में रख कर घर को चल देना यही उसकी दिनचर्या है।
आज सुबह के नौ बजे सोलंकी बोरी बिछा कर अपनी दुकान लगा रहा था। अभी वह कुछ चीजें ही बोरी से निकाल पाया था कि- ‘अबे, ये जूते सिल कर ठीक से पॉलिश लगा दे…।’ एक पुरुष स्वर सुनते ही हाथ में पकड़े धागे की रील को वहीं रख उसने गर्दन उठाई। सामने पैंट-कमीज पहने, आंखों पर महंगा नजर का चश्मा चढ़ाए एक भद्र व्यक्ति खड़ा था।

‘जी साब, अभी कर देता हूं।’ कह कर सोलंकी ने तीव्र गति से हाथ का सामान वहीं रख उस पुरुष के पैरों के पास से जूता उठा लिया और उसे घुमा-घुमा कर देखने लगा कि कहां से मरम्मत करनी है। एक स्थान पर जूते का मुंह जरा-सा खुला दिखाई दिया। उसने उसे बड़े अच्छे से सिल दिया। जूता महंगा दिख रहा था, तभी तो वे इतनी बड़े साहब, इतनी बड़ी गाड़ी से उतर कर उससे जूते सिलवाने आए हैं। सोलंकी ने जूते में पॉलिश लगा कर बढ़िया से चमका कर साहब के पैरों में पहना दिया। वह मन ही मन खुश था कि आज उसकी अच्छी बोहनी हो जाएगी। अगर बोहनी अच्छी हो जाए तो पूरे दिन अच्छी कमाई हो जाती है। ‘ये लो पैसे।’ कह कर साहब ने जेब से सिक्का निकाल कर सोलंकी के सामने बोरी पर उछाल दिया।

पांच रुपए का सिक्का सामने देख कर सोलंकी उम्मीद से साहब की ओर देखने लगा। शायद साहब एक-दो और सिक्के जेब से निकाल कर उसकी ओर उछाल दें, पर वे पलट कर गाड़ी में बैठ चुके थे। सिक्का उंगली में फंसाए सोलंकी सोच रहा था कि इस महंगाई के जमाने में पांच रुपए! धागे और अच्छी पॉलिश के पैसे ही दस रुपए से अधिक के गए। ऊपर से इतनी देर तक पॉलिश कर जूते को चमकाता रहा, उस परिश्रम की कोई कीमत ही नहीं। वह बड़ी देर तक सिक्के को उलटता-पुलटता रहा। साहब की गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ गई थी। ‘मुझे साहब से और कुछ पैसे मांगने चाहिए थे।’ सोलंकी मन ही मन बुदबुदाया। ‘मैं यही गलती कर जाता हूं। जो साहब लोग हैं उनसे पैसे नहीं मांग पाता। जब पैसे देकर चले जाते हैं, तब ध्यान आता है कि मजूरी कम मिली।’ सोलंकी मन ही मन बुदबुदाता और दुकान सजाता रहा।

सड़क पर धीरे-धीरे आवाजाही बढ़ रही थी। यही समय है लोगों के दफ्तर जाने का। इसी समय किसी की चप्पल टूटती है, तो किसी के जूते खुल जाते हैं। इसी समय सोलंकी दो-चार पैसे कमा लेता है। ‘बाबा… ओ बाबा। मेरी सैंडिल टूट गई है टांक दो।’ एक युवक के स्वर से सोलंकी की तंद्रा भंग हो गई। सामने एक युवक सैंडल उतार कर खड़ा था। देखने में विद्यार्थी लग रहा था। सैंडल पुरानी थी। पहले एक बार और टांकी जा चुकी थी। सोलंकी ने मजबूती से उसकी सैंडल टांक कर उसे दे दी। ‘कितने पैसे हुए बाबा?’ कहते हुए जेब में हाथ डाल कर वह सोलंकी की ओर देखने लगा।

‘दस रुपए।’ युवक ने जेब से दस का नोट निकाल कर सोलंकी की ओर बढ़ाया। सोलंकी ने दोनों हाथों से नोट पकड़ लिया। युवक तेजी से चला गया। उसने तो युवक की सैंडल में बस टांके लगाए थे, फिर भी उसने दस रुपए दिए। एक वे पैसे वाले साहब थे जिन्होंने अपनी इच्छा से उसकी मजूरी तय कर दी थी। ‘वाह रे दुनिया…’ वह फिर बड़बड़ा उठा। लगभग चालीस वर्ष से सोलंकी यहीं बैठ कर जूते-चप्पल मरम्मत की दुकान लगाता है। तब यह शहर इतना बड़ा नहीं था। इस पुल का, जिसके नीचे आज सोलंकी बैठता है, नामोनिशान नहीं था। यह सड़क तो थी, पर इतनी चिकनी नहीं, कुछ-कुछ पथरीली-सी उबड़-खाबड़ थी। यहां इस कोने पर एक पेड़ हुआ करता था, जिसकी छांव में सोलंकी अपनी दुकान लगाया करता था। अब वह पेड़ भी नहीं रहा। पुल बनने के साथ उसे काट दिया गया। पहले सोलंकी देर तक दुकान लगाता था। तब सोलंकी युवा था। अब शाम का धुंधलका होने से पूर्व दुकान उठा लेता है। उसे अब सुई में धागा दिखता नहीं है। ढिबरी जलाने के बावजूद वह ठीक से सिलाई नहीं कर पाता। इसीलिए शाम ढलने से पहले ही दुकान समेट लेता है।

सांवले, छोटे कद का युवा सोलंकी आज साठ-पैंसठ वर्ष का बूढ़ा हो गया। उम्र के थपेड़ों ने उसका कद और छोटा कर दिया है। तब से आज तक जूते-चप्पल पहनने वालों के साथ-साथ जूते चप्पलों की डिजाइन, फैशन और नमूने भी बदल गए। तब अधिकतर पुरुष काले चमड़े के पंप जूते या फीते वाले जूते पहनते थे। जूते फटते रहते थे, लोग सिलवाते रहते थे। एक जूता कई-कई महीनों तक चलता था। कभी-कभी वर्षों तक। तब एक मोहल्ले में कई मोचियों की दुकानें होती थीं। जूते चप्पलें सिलने, टांकने का काम खूब मिलता था। अब समय बदल गया। लोगों के पास फैशन के हिसाब से कई जोड़ी जूते-चप्पलें होतीं हैं। इसलिए टूटती कम हैं। जिस हिसाब से पिछले पंद्रह वर्षों में इस शहर का दायरा बढ़ा है, उसी अनुपात में शहर में अमीरों की संख्या भी बढ़ी है। देखते-देखते पूरा शहर जैसे अमीरों का शहर हो गया है। ऐसा लगता है कि निर्धनता मात्र मलिन बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रह गई है। अब टूटी चप्पलें बनवाता कौन है! जूते-चप्पलें टूट जाने पर लोग दूसरी नई ले आते हैं। मोची की दुकानें टूटती जा रही हैं। पहले की तरह अधिक दुकानें अब नहीं रह गई हैं। जो थोड़ी बहुत रह गई हैं, वे भी अब चलती नहीं हैं। इस कारण जीविका चलाना कठिन होता जा रहा है। महंगाई बढ़ गई है, पर मजूरी कमोबेश वही रह गई है।

सोलंकी शहर के बीच बसी एक मलिन बस्ती में रहता है। पहले यह बस्ती शहर के किनारे बसी थी। आबादी बढ़ती गई और शहर का विस्तार चारों ओर होता गया। धीरे-धीरे यह बस्ती किनारे से शहर के बीच में आ गई। अब इस बस्ती में दलित जातियों के अलावा कुछ अन्य जातियों के लोग भी रहने लगे हैं। शहर में सुख-सुविधाएं विकसित हो गई हैं। पर यह मलिन बस्ती कमोबेश आज भी वैसी है, जैसी वर्षों पहले थी। सोलंकी के घर में उसकी बूढ़ी पत्नी और दो बेटे हैं। बेटों को तरक्की करते, आधुनिक होते बढ़ते शहर की हवा लग गई है। वे यह पुश्तैनी काम नहीं करना चाहते हैं। पहले सोलंकी सोचता कि अगर वे जूते-चप्पलें सिलने का पुश्तैनी काम नहीं करेंगे तो क्या करेंगे? वे अधिक पढ़े-लिखे भी नहीं हैं। अपनी रोजी-रोटी कैसे चलाएंगे? सोलंकी चिंतित हो उठता। पर पैसों की आवश्यकता कभी-कभी मनुष्य को अक्ल भी देती है। घर में पैसों की तंगी देखते हुए दोनों बेटों ने अंतत: अपने-अपने योग्य रोजगार ढूंढ़ लिया। एक ने होटल में बैरा की नौकरी कर ली, दूसरे ने बैंड बाजे के ग्रुप के साथ शादी-ब्याह में बाजा बजाने का काम तलाश लिया। सोलंकी भी खुश है कि बेटे बाहर का काम करेंगे, तो जान-पहचान वाले उन्हें हिकारत और ओछी दृष्टि से तो नहीं देखेंगे। उनका अपमान तो नहीं करेंगे। उसके लड़के छोटी जाति के होने की जलालत से बच जाएंगे।

उसके बड़े बेटे जुगनू को होटल में नौकरी करते हुए छह महीने हो गए थे। वह होटल का काम समझ गया था और मन लगा कर काम करने लगा था। ‘बाबू, अब हम होटल की रसोई में शेफ की मदद भी करते हैं। धीरे-धीरे हमें भोजन बनाना भी आ जाएगा। मालिक ने कहा है कि जब हमें ठीक से भोजन बनाना आ जाएगा तब वह हमारा प्रमोशन कर देंगे। तनखाह बढ़ा देंगे।’ बेटे की बात सुन कर सोलंकी मुस्करा पड़ा। आसमान की ओर देख कर दोनों हाथ जोड़ दिए। ‘बाबू, अपने मोहल्ले से कऊनो जाकर होटल के मालिक से हमार जात बता आवा है।’ एक शाम सोलंकी दुकान उठा कर घर पहुंचा तो उसके बेटे ने उससे कहा। बेटे की बात सुनते ही सोलंकी सन्न रह गया।

‘फिर का हुआ तुम्हरे काम का…?’ सोलंकी ने चिंतित होते हुए पूछा।

‘कुछ नहीं बाबा… काम पर रखते समय मालिक ने हमसे जात नाहीं पूछा, तो हम नाहीं बताए रहे। मालिक कहने लगे कि हम जाति-धर्म नहीं, साफ-सफाई, अच्छा काम देखते हैं।’ बेटे की बात सुन कर सोलंकी को तसल्ली हुई। वह सोचने लगा कि सचमुच यह शहर विकसित और बड़ा हो गया है। लोगों के पहनावे में ही नहीं सोच में भी बदलाव आया है।

आज सोलंकी दुकान पर खाली बैठा था। सुबह से कोई ग्राहक नहीं आया था। वह व्याकुलता से किसी ग्राहक के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी ‘अबकी बार… की सरकार…। मोहर लगेगी… निशान पर।’ नारों की आवाज पुल की ओर आती सुनाई दी। पैदल भीड़ के साथ बड़ी-बड़ी गाड़ियों का काफिला आगे बढ़ता जा रहा था। काफिला उन सबके पास आकर रुक गया। आगे वाली गाड़ी से चार-पांच व्यक्ति उतरे। उनमें से एक व्यक्ति जो सफेद कुर्ता-पायजामा पहने हुआ था, दोनों हाथ जोड़े हुए उनकी ओर बढ़ा। लग रहा था कि वही व्यक्ति चुनाव लड़ रहा है। फल वालों की ओर मुखातिब होते हुए उनमें से एक ने उस व्यक्ति की ओर संकेत करते हुए कहा कि अबकी बार… भइया के चुनाव चिह्न… पर मोहर लगा कर विजयी बनाना है। जो व्यक्ति चुनाव में खड़ा था, वह हाथ जोड़े उनकी ओर देख कर मुस्करा रहा था। वे सब अब सोलंकी की ओर बढ़ रहे थे। ‘अबकी भाई को वोट देना है। तुम सबकी बस्ती में पक्की नाली बनवाई जाएगी, साफ पानी के लिए हैंडपंप लगेगा और समय-समय पर साफ-सफाई होगी और गलियां भी पक्की कराई जाएंगी। अपनी बस्ती में सबको कहना कि… पर मोहर लगा कर …भइया को जिताना है।’ उनकी बात सुन कर सोलंकी भी उनकी ओर देख कर दोनों हाथ जोड़ कर मुस्करा पड़ा।

वे चले गए। सोलंकी सोचता रहा कि यहां बैठे-बैठे उसने अनेक चुनाव देखे हैं। देखते-देखते शहर की सूरत बदल गई। नहीं बदली तो नेताओं की बात। पहले के चुनाव में नेता सोलंकी की बिरादरी वालों से जो बात कहते थे, आज भी वही बात कहते हैं। बस्ती वालों को कुछ नहीं मिल पाया? सुना है, दुनिया आगे बढ़ रही है, सब ओर तरक्की हो रही है। तो शहर के बीच स्थित उसकी मलिन बस्ती में विकास की रोशनी क्यों नहीं पहुंची? क्यों सोलंकी आज तक उसी बोरी पर बैठा रह गया, जिस पर आज से पैंसठ वर्ष पहले बैठा था? बोरियां फटती रहीं, बदलती रहीं, मगर उस पर बैठने वाले की स्थिति वही रही, जो आज से पैंसठ वर्ष पूर्व थी! सोलंकी मुस्करा पड़ा, नेताजी पर… इस शहर पर… स्वंय पर या अपनी जाति पर… न जाने किस पर, नहीं जानता। बस मुस्करा पड़ा। इस शहर की मानसिकता कभी-कभी उसे उस फटे जूते के समान लगती है, जिसे बार-बार सिलने के बाद वह उसी स्थान से फटता है, जहां उसकी सिलाई की गई होती है।