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कहानीः सन्नाटा

रेवती को कितनी जल्दबाजी लगी रहती है! सुबह-सुबह आराम से किया कर काम रेवती, सर्दी के मौसम में धूप निकलने दिया कर, फिर काम की कोई जल्दी भी तो नहीं है, कौन से बच्चों को स्कूल भेजना है अब!

सुबोध बड़े घर का बेटा था, सुबोध के लिए रेवती के घर की व्यवस्था या उसके परिवार के काम धंधे का कोई महत्त्व नहीं था।

रेवती को कितनी जल्दबाजी लगी रहती है! सुबह-सुबह आराम से किया कर काम रेवती, सर्दी के मौसम में धूप निकलने दिया कर, फिर काम की कोई जल्दी भी तो नहीं है, कौन से बच्चों को स्कूल भेजना है अब! बच्चों का काम तो तूने रखा ही नहींं।

– सासूजी, अब यह तो भगवान के हाथ की बात है, आप मुझे रोज-रोज ऐसा क्यों कहती हो… आप कहें तो मैं किसी सड़क से बच्चा उठा लाऊं…!

– रेवती यह सब तुम्हारे घर परिवार में होता है, हमारे घर में फिरती लाने की परंपरा नहींं है। हां और आइंदा इस तरह की बात मेरे घर में की या जबान लड़ाई तो खींच लूंगी जुबान…! इसलिए सुबोध से कहती थी कि हमारे बराबर वालों से शादी करनी चाहिए, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी…! सेठजी की लड़की से शादी करता तो आज समाज में न तो नीचा देखना पड़ता और न ही मेरी बहू बांझ बन कर रहती।

– अरे कहां हो मम्मी, कहां हो रेवती? कितनी तेज भूख लगी है मुझे…! सुबोध अपनी टाई उतार कर फेंकता, जूते खोलता, साथ ही कोट कुर्सी पर रखता ऊंचे स्वर में बोलता जा रहा था।

रेवती सुबोध की आवाज सुन कर भी चुपचाप रसोई में काम करती रही।

– अरे, कोई घर में है, या यह घर अकेला ही है!

– हां बोलो! आपकी रेवती यहीं है…!

– तो बोलती क्यों नहीं? खाना परोसो!

– अभी तो तैयार नहीं है खाना, जोरदार भूख लगी है, तो खुद बना लो…!

– अरे, मैं आता हूं रसोई में!

सुबोध रसोई की तरफ जाने लगा। रसोई के बाहर ही महक आने लगी…

अंदर रसोई में रेवती खाना बना रही थी। सुबोध ने रेवती को देखा तो बांहों में भर लिया।

अरे रेवती… रेवती! कस कर कहता सुबोध स्मृतियों में खो गया। पहले दिन शादी से पहले कॉलेज के बहाने रेवती के घर जब कोई नहीं था, रेवती और सुबोध ही थे!

रेवती सुबोध के लिए चाय बनाने लगी!

सुबोध से रहा नहीं गया… और रेवती के घर की रसोई में सुबोध ने उसे कस कर पकड़ लिया था…! सुबोध ने अपने जीवन में पहली बार किसी लड़की को स्पर्श किया था और वह भी अपने कॉलेज की मिस कॉलेज चुनी गई रेवती को! जिस पर कॉलेज के बहुत लड़कों की निगाह रहा करती है। हालांकि रेवती के घर का रसोईघर न तो आधुनिक था और न ही व्यवस्थित, पर रेवती इतनी व्यवस्थित गठीली, आकर्षक दिखने के साथ-साथ किसी विदेशी पुष्प की प्रजाति की तरह मुस्कुराते चेहरे से सज्जित रहती।

सुबोध बड़े घर का बेटा था, सुबोध के लिए रेवती के घर की व्यवस्था या उसके परिवार के काम धंधे का कोई महत्त्व नहीं था। वह तो केवल शहर की सर्वोत्तम अनुशासित और सुंदर संस्कारित रेवती महत्त्वपूर्ण थी, जो सुबोध की बांहों में थी… रेवती ने भी पहले पहले कहा और हल्का विरोध किया कि इस हाल में उसे कोई देख लेगा, कोई आ जाएगा तो क्या कहेगा, लेकिन सुबोध के प्यार और पहले मर्द के स्पर्श में वह भी डूब चुकी थी! सुबोध को तो मानो नशा चढ़ गया था और घंटों तक रसोई से आंगन और रेवती के घर के कमरे में लेकर जैसे चुंबक की तरह चिपका रहा। जब सुबोध आगे बढ़ने लगा, तो रेवती ने स्पष्ट लेकिन आग्रह के साथ संभलते हुए कह दिया- सुबोध यह काम किसी और समय के लिए सुरक्षित है…! इतना होने के बावजूद सुबोध अनुशासित और भविष्य को समझते हुए मान गया था।

– अरे छोड़ो मुझे, मम्मी आ जाएंगी…! यह रसोईघर है हमारा बेडरूम नहीं, क्या कर रहे हो…! ओहो, मेरी भूख पहले स्पर्श की तरह पता नहीं कहां खो गई।

– रेवती, तुमने मुझे पांच वर्ष पहले की याद दिला दी…!

– तुमको किस लेखमाता ने लिख कर भेजा है मेरे लिए!

– रेवती, तुममें में बिल्कुल बदलाव नहीं आया…! कुछ अधिक ही आकर्षक लग रही हो…!

– बेकार की बातें छोड़ो! खाना खाओ! चलो काम पर…! मैं किसी काम की औरत नहीं हूं। मैं तो केवल घर में पड़ी भैंस की तरह हूं…! अगला वाक्य रेवती पूरा नहीं कर पाई।

– रेवती, तुम्हें आज क्या हो गया है, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है या नहीं! कैसे बोले जा रही हो? आज से पहले तो…!

– तुम छोड़ो! मैंने कहा न, खाना खाओ…!

– नहीं-नहीं! रेवती मुझे नहीं खाना! पहले बताओ हुआ क्या है?

रेवती सुबोध की बांहे पकड़ कर डाइनिंग टेबल पर बिठाते हुए बोली- शाम को बात करेंगे, अभी तो तुम खाना खाओ…! जल्दी से ऑफिस जाओ! काम करना है!

सुबोध के पिताजी की पिछले वर्ष एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई थी। सुबोध की शादी पिताजी ने सुबोध की इच्छा से तो खुद आगे बढ़ कर अपने कार ड्राइवर की बेटी रेवती से की थी।

सुबोध की मां के विरोध करने के बावजूद इकलौती संतान की शादी हुई थी। जब तक सुबोध के पिताजी सेठ चांदरतन जिंदा थे, तब तक रेवती को सुबोध की मां कुछ भी नहीं कह सकती थी। एक दो बार कहने की हिम्मत हुई, लेकिन सुबोध के पिताजी के विरोध के बाद शांत होना पड़ा।

पिछले एक वर्ष से सुबोध की मां ज्यादा मुखर होकर रेवती को प्रताड़ित करती है और वह भी बच्चा न होने के कारण। हाथ धोकर मां के कमरे में सुबोध ने जाकर मां को बताया- मम्मी जी अपनी और रेवती की सभी जांच रिपोर्ट मैं ले आया हूं…!

– बता बेटा, डॉक्टर साहब ने क्या बताया! सुबोध को अपने स्तर पर सभी जानकारी थी कि मम्मीजी रेवती से बहुत लड़ती है। इसलिए उसने मम्मीजी को साथ ले जाकर जांच करवाई थी।

– मम्मीजी, डॉक्टर की रिपोर्ट आप और रेवती सुन नहीं पाओगी…!

– बता सुबोध, जरूर रेवती की रिपोर्ट खराब होगी…! जैसे लोग होते हैं…!

– मम्मीजी, ऐसा मत कहो…। रेवती को चाहने वालों की इस शहर में आज भी कोई कमी नहीं…! शायद मुझे अब कौन मिले…!

– तुम छोड़ सुबोध, चली जाए रेवती…! कहां जाएगी? कौन ले जाता है अब इसको?

सारी बातें रेवती रसोईघर में खड़ी सुन रही थी।

– मम्मीजी, आप कहें तो रेवती को और आपको रिपोर्ट पढ़वा दूं!

– मैं तो पढ़ी नहीं…! रेवती… रेवती…! हां हां आई मम्मीजी! बोलो हुक्म…।

सुबोध ने रिपोर्ट निकाल कर रेवती को पकड़ाते हुए कहा, दोनों रिपोटर्स मम्मीजी को पढ़ कर सुना देना… मैं चलता हूं!

– बेटा सुन… बैठ तो सही…! मुझे बता पहले!

– लो सुनो मम्मीजी, सुबोध ने रिपोर्ट लेते हुए सुनाई। रेवती की रिपोर्ट एकदम नॉरमल है, रेवती बच्चे पैदा कर सकती है। मेरी रिपोर्ट में लिखा है कि मैं बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं हूं…।

कमरे की दीवारें तक, जिनमें सोना, चांदी, हीरा, जवाहरात जड़ा हुआ था, बोलने की इच्छा के बावजूद उदास हो गर्इं।

– बोलो मम्मीजी, अब रेवती को घर से निकालोगी या मुझे…!

जैसे कमरे में सन्नाटा छा गया हो।

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