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कहानीः नुक्कड़ नाटक

सड़क के दार्इं तरफ देखते ही पिंकी की सांस की नली में डाट-सा लग गया। इससे पहले उस युवा स्त्री का दिल इतना तेज कभी नहीं धड़का। न मुहब्बत में और न संकट में।

कहानीः नुक्कड़ नाटक

सड़क के दार्इं तरफ देखते ही पिंकी की सांस की नली में डाट-सा लग गया। इससे पहले उस युवा स्त्री का दिल इतना तेज कभी नहीं धड़का। न मुहब्बत में और न संकट में। वह जोर से चिल्लाई और रिक्शेवाले से रिक्शा किनारे लगाने को कहा। उस अस्तव्यस्त और खूबसूरत महिला के बगल में दो-ढाई साल की एक बच्ची बैठी थी, जिसे उसने थाम रखा था। सब्जी का थैला उसने रिक्शे की सीट के ठीक नीचे पैरों के पास रखा था और उसे दोनों पैरों के बीच दबाए हुए थी। उसने साधारण सूती सूट पहन रखा था, जो मामूली मुचड़ा हुआ था। लेकिन इससे उसके आबताब में कोई कमी नहीं आ रही थी।

अनमने-से रिक्शावाले ने रिक्शा किनारे लगा दिया। उसने सवारी (पिंकी) से जल्दी आने को कहा और दबे स्वर में सलाह दी कि वह बेकार ही उतर रही है। पता नहीं क्या लफड़ा है। लेकिन पिंकी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। वह बच्ची को गोद में उठाए हुए बदहवास-सी भीड़ की ओर भागने लगी। भीड़ ने तमाशबीनों की तरह वृत्ताकार गोला बना रखा था। कभी-कभी ‘हे ऽऽ’ की मिलीजुली आवाजें एक लहर की तरह उठतीं। लहरों के बीच में एक अकेली और कमजोर चीख तैरती और डूब जाती। वृत्त एक झटके में फैल जाता। लोग एक-दूसरे पर लगभग झुक पड़ते। अगले कुछ क्षणों में वृत्त फिर से सिकुड़ कर उसी आकार का हो जाता। उस अस्तव्यस्त और सुंदर महिला से सब्र नहीं हो रहा था। उसे सड़क के उस पार जाना था। यह दूरी साठ गज से ज्यादा नहीं होगी। इसे पार करने में उसकी सांसें थमने लगी थीं।

उसका पति संजू किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है। वह इसी रास्ते से आता-जाता है। बाइक से। इस छोटे-से कस्बे में ज्यादा दफ्तर नहीं हैं। कुछ सरकारी हैं और कुछेक निजी। बाकी सारे खटारा धंधे हैं। यही खटारा धंधे कस्बे की धमनियां हैं। कस्बे के सीने पर खिंची सड़क हाइवे तो नहीं है, लेकिन आगे चल कर हाईवे से मिल जाती है। सड़क पर वाहनों की आवाजाही बहुत नहीं रहती। साइकिलें खूब हैं। रिक्शे भी इफरात। फिर हैं मोटरसाइकिलें। इक्का-दुक्का कारें भी हैं। इक्का-दुक्का से कुछ ज्यादा ही होंगी। ट्रक इस सड़क पर खूब चलते हैं। पता नहीं कहां से आते हैं और धूल उड़ाते कहां चले जाते हैं। आवारा-से। जाहिर है इस सड़क पर कभी-कभार दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं।

आज सुबह उन दोनों का झगड़ा हुआ था। संजू ने उसे बदतमीज औरत ठहराते हुए ऐलान कर दिया कि वह उससे आजिज आ गया। पिंकी ने गुस्से में कह दिया, ‘तो मर क्यों नहीं जाते? दोनों को छुटकारा मिलेगा।’ वह मर जाता तो बेहतर था। संजू भुनभुनाया। आकाश की ओर हाथ उठा कर बोला, ‘हे ऊपर वाले, मुझे उठा लेना। नहीं उठाया तो आज से तुझे भगवान नहीं कहूंगा। एक बार भी जो कह दिया न, तो ऊपर से मेरे मुंह पर थूक देना।’ यह सुनते ही पिंकी का मुंह उतर गया। संजू को तसल्ली मिली। बोला, ‘आज कोई ट्रक मुझे कुचल दे। तभी इसके कलेजे में ठंडक पड़ेगी।’

इतना कह लेने के बाद उसने बाइक स्टार्ट की और दनदनाता हुआ दफ्तर के लिए निकल गया। गुस्से में टिफिन भी छोड़ गया था। पिंकी की घबराहट इतनी बढ़ गई कि उसके हाथ-पैर कांपने लगे। सांस रुंध गई। घेरे के पास पहुंची तो उसे चीख-पुकार सुनाई देने लगी। कई सारे क्रोधित स्वर एक साथ गूंज रहे थे। जिनमें एक कातर-सी आवाज घुली हुई थी। वह कुछ समझने की स्थिति में नहीं थी। उसने अनुमान लगाया कि वह कराह दुर्घनाग्रस्त व्यक्ति की होगी। हुंकार उस भीड़ की होगी जो दुर्घटना करने वाले वाहन चालक पर बरस रही होगी। यह सोचते-सोचते वह भीड़ के घेरे को कुहनियों से ठेलने लगी। ताज्जुब की बात यह थी कि सामने का दृश्य बेहद हौलअंगेज होने के बावजूद, पिंकी ने जब वह सब देखा, तो उसकी सांस में सांस आ गई। एक तरह से उसे तसल्ली हुई। उसने मन ही मन ईश्वर को याद किया और उसका आभार जताया।

शाम का झुटपुटा अभी नहीं हुआ था। लोगों के दफ्तर से लौटने का वक्त था। कामधंधे वाले तो और देर से लौटेंगे। जो घट रहा था उसे ‘दिनदहाड़े’ कहना गलत नहीं होगा। घेरे के बीच में बीस-पच्चीस लोग एक अकेले और साधारण-से युवक को दौड़ा-दौड़ा कर मार रहे थे। यानी घेरे के भीतर भी एक भीड़ थी, जो अपनी आक्रामता के कारण घेरे में खड़ी भीड़ से अलग थी। सिल की तरह सपाट और पाषाण युगीन चेहरे वाली। भीतरी भीड़ का भी एक घेरा था, जिसके बीच में एक फड़फड़ाता-सा मनुष्य था। जब दयनीय मनुष्य खड़ा होता तो वे उसे रगेद-रगेद कर मारते और नीचे गिरा देते। जब वह सड़क पर गिर पड़ता तो वे एक साथ उस पर टूट पड़ते। वे विजयी सैनिकों की तरह चिल्लाते। जितनी जोर से चिल्लाते, उतनी ही दर्दनाक उसकी चीख होती। जैसे किसी सूअर को घेर कर बरछी घोंपी जा रही हो।

पिंकी ने बच्ची को नीचे उतार कर उसका हाथ थाम लिया। वहां खड़े बहुत सारे लोग इस दृश्य को अपने-अपने मोबाइल फोन में कैद कर रहे थे। भीड़ में खड़े लोगों के फोन सिर के ऊपर उठे हुए थे। इन उठे हुए हाथों की संख्या उन लोगों से ज्यादा थी, जो उस साधारण और लगभग फटीचर युवक का कचूमर निकाल रहे थे। वह मामूली दर्जे का कामकाजी लगता था। कोई उसे पहचान नहीं रहा था, तो संभव है वह बाहरी हो या आसपास के किसी गांव-कस्बे का। उसने फुटपाथों पर बिकने वाली सस्ती जींस पहन रखी थी। ऊपरी बदन पर धारीदार टी-शर्ट थी। वह काफी मैली थी और मिट्टी में लिथड़ने से उसकी रही-सही रंगत भी चली गई थी। बाहरी घेरे की भीड़ में ज्यादातर चेहरे सहमे हुए थे।

पिंकी ने फोन सिर के ऊपर उठाए एक युवक से पूछा, ‘क्या किया इसने ?’

‘पता नहीं। मैं भी अभी आया हूं। शायद जेब काटी हो।… या कुछ और काटा हो।’

पिंकी को दया आ गई। बेचारा। जेब काटने वाले को इतना कौन मारता है? उसकी बात पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। जिससे यह पता नहीं चल पाया कि जेबकतरों को लोग कौन-सी सजा देना पसंद करते होंगे। फोटो खींच रहे युवक का जवाब सुन कर एक अधेड़ पिंकी की ओर मुखातिब हुआ, ‘जेबकतरा नहीं लगता। वरना अब तक छुड़ा लिया गया होता।’

‘तो?’-एक हट्टे-कट्टे आदमी ने जिज्ञासा व्यक्त की। अधेड़ की नजरें अस्तव्यस्त और खूबसूरत पिंकी पर टिकी थीं। उसने एक विडियो का हवाला देते हुए कहा, ‘बच्चा चोर गिरोह का हो सकता है।’

पिंकी ने झटपट बच्ची को गोद में उठा लिया और थैला पैरों के बीच में रख दिया। पांच मिनट के अंदर ही रिक्शेवाला भी भीड़ को चीरता हुआ उसके पास आ पहुंचा और जल्दी चलने का आग्रह करते-करते फौरन पैसे देने की जिद पर अड़ गया। पिंकी ने आश्चर्य जताया कि उसे इतना भी सब्र नहीं। रिक्शेवाले ने बताया कि सब्र की बात नहीं है। ऐसे झंझटों में वह नहीं फंसना चाहता। सवारियों का क्या है, पुलिस के आते ही गायब हो जाती हैं। पुलिस वालों से कहो कि कुछ नहीं देखा, तो डंडे और गालियों में बात करते हैं। भूतनी के, आंख बंद करके रिक्शा चलाता है?

पिंकी के घर की दूरी इस जगह से आधा किलोमीटर रह गई थी। उसने बिना हील-हुज्जत के रिक्शेवाले को पंद्रह रुपए दे दिए। रिक्शेवाले ने उसे समझाने की गरज से कहा, ‘चलना है तो चलिए। छोड़ देता हूं। पांच रुपए और दे देना।… यहां कुछ बड़ा कांड होगा।’
पिंकी ‘बड़ा कांड’ का सही-सही मतलब नहीं समझी। उसने रिक्शेवाले की ओर सवालिया निगाहों से देखा। रिक्शा वाला खुद भी नहीं जानता था कि क्या होगा। बोला, ‘लोग वीडियो दिखा रहे हैं। इस आदमी को कसाई-उसाई बताते हैं।’

महिला को समझ में नहीं आया कि उसे कैसी प्रतिक्रिया करनी चाहिए। उसने पिट रहे युवक के चेहरे को देखा। फिर उन पीट रहे युवकों में से कइयों के चेहरे देखे। वह कसाई चेहरे को ढूंढ रही थी। रिक्शेवाला जा चुका था। पिंकी का ध्यान भीड़ को चीर कर गोले के अंदर दाखिल हो रहे एक मीडियाकर्मी की ओर चला गया था, जो अपना कैमरा निकालने में बुरी तरह हड़बड़ाया हुआ लग रहा था। पिट रहा युवक लगातार मिन्नतें कर रहा था। वह उत्तेजित लोगों के पैरों में गिरता और वे उसे ठोकर मार देते। वह कातर स्वर में चीखता। कभी-कभी, जब उसकी पसलियों या पेट में ठोकर पड़ती तो वह जिबह हो रहे बकरे की तरह चीत्कार करता। वह चीख इतनी मर्मांतक होती कि बरमे की तरह हृदय में घुस कर पेट के निचले हिस्से तक मथती-छेदती चली जाती। इस चीत्कार में किसी गर्भवती का हमल गिरा देने की सामर्थ्य थी। पिंकी की बेटी बुरी तरह डर गई थी।

एक पुलिस वाला डंडा लेकर भीड़ के पीछे मौजूद था। एक आदमी ने पुलिस वाले की ओर इशारा करते हुए दूसरे आदमी से कहा, ‘ये देखो इन्हें, यहां खड़े हैं।’

पुलिस वाले ने उसे घूर कर देखा। पर कोई जवाब नहीं दिया। जरूरी है कि ड्यूटी पर हों? घर का राशन लेने आए होंगे। दूसरे आदमी ने सवाल पूछ रहे व्यक्ति को संबोधित करते हुए सफाई-सी दी। व्यंग्य समझ में आ रहा था। इसीलिए पुलिस वाले ने सफाई देने वाले को तिरछी नजर से देखा। सवाल करने और जवाब देने वालों ने भी एक-दूसरे को देखा। दोनों को मुस्कराने के लिए यह जगह उपयुक्त नहीं लगी। पुलिस वाला थोड़ा कसमसाया और चुपचाप भीड़ से निकल कर सड़क पार कर गया। उसके जाने के बाद एक तमाशबीन दुकानदार ने, जिसकी एक नजर बराबर अपनी दुकान पर थी, एक बुजुर्ग को बताया कि पुलिस वाला ड्यूटी पर है। इसकी ड्यूटी यहीं रहती है। चुपचाप सोचते रहने और कम बोलने वाले उस बुजुर्ग ने गहरी सांस छोड़ी। शायद वह सोचता हो कि उसकी उम्र सार्वजिनक स्थल पर टिप्पणी करने की नहीं रही।

इसी बीच एक अधेड़ महिला भीड़ में घुसी और पिंकी को देख कर उसके बगल में खड़ी हो गई। बताते हैं, इसने एक बच्ची के साथ कुकर्म किया। अधेड़ औरत ने पिंकी के कान के पास मुंह लगा कर कहा। पिंकी ने चौंक कर उसकी और देखा और अपनी बेटी को कस कर कांख में दबोच लिया। पिट रहा युवक अब रुक-रुक कर चीख रहा था। जैसे पस्त हो गया हो। बीच-बीच में वह दर्शक-भीड़ पर दयनीय दृष्टि डालता। उसकी आंखों में जितनी गहरी याचना होती, उतनी ही तीव्र वेदना। जिस-जिस की ओर उसने देखा उसी की आंख में ख़ौफ की तस्वीर छप गई।

‘उधर कुछ लोग खड़े हैं। बता रहे हैं, रंगे हाथ पकड़ा गया।’ उस अधेड़ स्त्री ने इस बार जोर से कहा। उसके होंठों के दोनों किनारों से फेन-सा निकलने लगा। पता नहीं क्रोध का फेन था कि भय का। बुजुर्ग ने आसमान की ओर देखा। उमस बहुत थी। लेकिन आकाश में बादल का एक भी टुकड़ा नजर नहीं आ रहा था। उसने बची-खुची उम्मीद के साथ युवाओं से भरी भीड़ को देखा। उनके चेहरे मोबाइल फोन के स्क्रीन जैसे नजर आ रहे थे।

पिंकी और कुछ दूसरे लोग जब अधेड़ औरत के बताए झुंड के करीब पहुंचे तो वे लोग वाट्सऐप पर देखे गए दो अलग-अलग विडियो पर चर्चा कर रहे थे। एक विडियो में पिट रहे युवक जैसा ही एक व्यक्ति गाय की गर्दन सहला रहा था। दूसरे विडियो में वैसा ही एक लड़का किसी रोती हुई लड़की को खाने के लिए टॉफी दे रहा था। वे लोग कह रहे थे कि यह घेरा गया युवक दोनों में से कोई एक तो अवश्य है। कुछ लोगों का तर्क था कि संभव है वह दोनों में कोई न हो। क्योंकि दोनों का ही चेहरा बहुत स्पष्ट नहीं है। गाय की गरदन सहलाने का एक ही नतीजा निकाला जा रहा था। जबकि दूसरे विडियो को लड़की को फुसलाने वाला माना जा रहा है।

लेकिन आशंकाएं दो तरह की जताई जा रही थीं। कि या तो वह बच्चा चुराने वाला था या उसका इरादा लड़की के साथ दुष्कर्म करना था। हालांकि कुछ लोगों का कहना था कि बच्ची वाला विडियो तो उत्तर भारत का है ही नहीं। झुंड में इसी पर गंभीर बहस चल रही थी। तभी एक कातर चीख फिर से उभरी और काफी लंबी खिंचने के बाद डूब-सी गई। एक काले भुजंग ने शिकार को फुटबाल की तरह ठोकर मारी थी। उसके मुंह से खून का परनाला बहने लगा था। एक बार उसके हाथ-पैर हिले और स्थिर हो गए। लोगों के मुंह से ‘च्च-च्च’ भी नहीं निकला। मानो यह प्रतिबंधित शब्द हो। पीटने वालों की भीड़ में से एक लड़के ने सड़क पर बिछ गए युवक की गरदन पर दो उंगलियां रखीं। फिर एक झटके में बाकी सारे लोगों को गदरदन हिला कर निकल चलने का इशारा किया। इशारा मिलते ही बाहरी घेरे के अंदर खड़ी भीड़ इस तरह दृश्य से गायब हुई जैसे उनकी भूमिका खत्म हो गई हो।

डरी हुई बच्ची ने मां के कान में कहा कि उसे सू-सू लगी है। मां ने उसे अपने कूल्हे पर ठीक से टिका लिया और थैला उठा कर सड़क पार करने लगी। उस पार पहुंच कर वह बीस-पच्चीस कदम आगे तक पैदल चलती रही। वहां दुकानें खत्म हो जाती थीं। उसने बच्ची को उतारा। उसका कच्छा सरकाया और सड़क किनारे बैठा दिया। फिर पलट कर उस ओर देखा, जहां वारदात को अंजाम दिया जा रहा था।

लेकिन अब तक दृश्य बदल गया था। एक पुलिस जीप रांग साइड पर खड़ी दिखाई दे रही थी। घटनास्थल पर पुलिस अवतरित हो चुकी थी। उनमें वह पुलिस वाला भी शामिल था जो कुछ देर पहले वहां मंडरा रहा था। भीड़ छंटने लगी थी। बाहरी वृत्त छितरा गया था। पुलिस वालों ने सड़क पर गिरे युवक को उलट-पलट कर देखा। वे आपस में बातचीत करने लगे। शायद उन्हें भरोसा हो गया था कि वह मर चुका है। बच्ची सू-सू कर चुकी थी। पिंकी ने उसका कच्छा ऊपर और फ्रॉक नीचे कर दी। उसने मौका-ए-वारदात को एक बार फिर पलट कर देखा। अब तक बचे-खुचे लोग भी खिसक लिए थे। कुछ लोग दुकानों के अंदर घुस कर दूर से देखने लगे। आमने-सामने के दुकानदार नजरें चुरा रहे थे या अपने काम में व्यस्त होने का अभिनय कर रहे थे। पुलिस मौके पर की जाने वाली औपचारिकताएं पूरी कर रही थी। फटीचर युवक की अस्पताल के लिए रवानगी अभी नहीं हुई थी। उसके हाथ-पैर अभी तक गरम थे।

आश्यर्चजनक बात थी। नाटक के पटाक्षेप से पहले ही दर्शक गायब हो गए थे। केवल एक बूढ़ा बचा था। वही, बेवजह सोचने वाला बूढ़ा। अस्तव्यस्त और खूबसूरत पिंकी अपनी बच्ची को गोद में लिए पैदल चली जा रही थी। अचानक उसके करीब आकर कोई बाइक रुकी। उसने पलट कर देखा। उसका पति था। दोनों एक-दूसरे से कुछ नहीं बोले। पिंकी उसके कंधे का सहारा लेकर बाइक पर सवार हो गई। बच्ची को उसने गोद में बैठा लिया। पलक झपकते ही उसने दोनों हाथों से संजू को कस कर पकड़ लिया और उसकी पीठ पर सिर धंसा दिया।

मुर्दा ठंडा होते ही पुलिस वाले उसे लेकर दृश्य से ओझल हो गए। वह बुजुर्ग सिर झुकाए सड़क पार कर रहा था। चूंकि वह इस उम्र में सीने पर ज्यादा बोझ नहीं ढो सकता था, इसलिए अपने आप को समझा रहा था कि वह नुक्कड़ नाटक देख कर लौट रहा है। वे रंगबाज नहीं, बल्कि रंगकर्मी थे। वे काफी कुशल थे। उन्होंने किसी न किसी नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण अवश्य लिया होगा। इस खयाल के आते ही वह सड़क के बींचोबीच ठिठक गया। जैसे कुछ कौंध गया हो। फिर तो कोई इस नाटक का निर्देशक भी होगा? और पटकथा भी किसी ने लिखी होगी?

पिंकी पति के सीने पर अपनी बाहें अजगर की तरह कसती जा रही थी और रोती जा रही थी। संजू एक अजीब-सी गुगगुदी महसूस कर रहा था। पिंकी ने इस दौरान उस युवक के बारे में बड़ी शिद्दत से और भारी मन से सोचा। अगर वह शादीशुदा हुआ, तो उसकी पत्नी अब किसे कस कर पकड़ेगी?

हकीकत को नाटक मान लेने की तमाम कोशिशों के बावजूद, पता नहीं क्यों, सड़क पार कर चुके बूढ़े के सीने का बोझ कम होने के बजाय बढ़ने लगा था।

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