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कहानीः खटबुनाई

मोहनदास नैमिशराय की कहानी - खटबुनाई

Author October 14, 2018 6:28 AM
प्रतीकात्मक चित्र

मोहनदास नैमिशराय

बेटे ने शाम को देखा। झिंगोला खाट बरामदे में वैसी ही पड़ी थी जैसी वह सुबह आफिस जाते हुए छोड़ गया था। उसे अजीब-सा लगा। बाहर का दरवाजा खोल कर वह भीतर गया तो पत्नी को लेटे हुए पाया। अलबत्ता दोनों बच्चे होमवर्क कर रहे थे। सरोज ने आहट सुनी तो उठते हुए बोली, ‘पानी दूं।’‘नहीं मैं खुद ले लूंगा।’ उसकी आवाज में तुर्शी थी। पत्नी ने महसूस किया। वह तुरंत बिस्तर से उठी और इससे पहले कि फ्रिज से स्वयं उसके पति पानी लें, उसने नजदीक रखी प्लास्टिक की बोतल से गिलास में ठंडा पानी उंडेल कर दे दिया। गर्मी का मौसम था। किशोर ने गटागट पानी पीकर गिलास मेज पर पटक दिया। गिलास पटकने की तीखी आवाज हुई। दोनों बच्चों का ध्यान बंटा। बड़ा बेटा पांच बरस का था और छोटी बेटी चार की।

‘पापा हमारे लिए क्या लाए?’ दोनों का स्वर उभरा था। पति-पत्नी ने एक दूसरे की तरफ देखा। उनमें से बोला कोई नहीं। दोनों बच्चों ने बारी-बारी से पहले पापा की ओर देखा फिर मम्मी की तरफ। सरोज ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया। बच्चे भी अपनी फरमाइश भूल कर फिर से होमवर्क में लग गए। तभी किशोर का स्वर उभरा, ‘यह झिंगोला चारपाई सुबह से यहीं पड़ी है।’ पत्नी के होंठो से संक्षिप्त जवाब निकला, ‘हां।’ सुन कर उसे अजीब-सा लगा। ‘हां माने…।’ किशोर का स्वर फिर उभरा। ‘अरे भई हां माने हां।’ अब तक सरोज का स्वर भी थोड़ा ऊंचा हो गया था।

‘मेरे कहने का मतलब था कि बरामदे में यह झिंगोला चारपाई मरी हुई गाय की तरह कब तक पड़ी रहेगी?’ तत्काल जवाब दिया सरोज ने, ‘यह तो अपने पिताजी से पूछो।’ किशोर पुन: नाराजगी में बोला, ‘मैंने तो तुमसे कहा था कि किसी कामवाली को दे देती।’ ‘तुम्हारे पिताजी किसी को देने दें तब ना।’ पूछा किशोर ने, ‘क्या कहते हैं पिताजी?’ ‘कहते हैं मुझे बान से बुनी हुई खाट पर ही नींद आती है।’ ‘यह तो मैं कई बार सुन चुका हूं उनके मुंह से। जबकि भीतर के कमरे में डबल बेड भी पड़ा है।’ इस बार सरोज भी तुर्शी में बोली, ‘और क्या नया जवाब सुनना चाहते हैं आप मेरे मुंह से?’

कुछ पल परिवेश में चुप्पी रही। जिसे तोड़ा था किशोर ने, ‘खटबुना तो मिलने से रहा अब नई बुनाई करने के लिए।’ जवाब में बोली वह, ‘पिछली बार तो आया था।’ सुन कर किशोर ने कहा, ‘हां पिछले बरस आया था। इस बरस आए या न आए।’ बात पूरी की सरोज ने, ‘अब शहरों में खटबुने कहां मिलते हैं। सुई ढूंढने पर मिल सकती है, लेकिन खटबुने नहीं।’ उनकी बात अभी खत्म ही हुई थी कि पहले चिंतू ने नकल करते हुए पुकारा, ‘खटबुने।’ फिर मोना बोली, ‘खटबुने।’ पति-पत्नी ने फिर से एक-दूसरे की ओर देखा। फिर पूछा किशोर ने, ‘पिताजी कहां हैं?’

सरोज का जवाब उभरा, ‘सो रहे हैं।’ ‘और माता जी…?’ ‘वह भी।’ जवाब देकर सरोज रसोई में चाय बनाने चली गई। तभी दोनों बच्चे पिछले कमरे में दादा-दादी के पास चले गए। दादा जी नींद में थे। चिंतू ने उनका हाथ हिलाते हुए दादा जी दादा जी को पुकारा, तो उनकी आंखें खुल गई। नाराजगी में वे बोले, ‘हट सोने दे।’ पहले चिंतू ने नकल की, ‘हट…।’ फिर मोना बोली, ‘हट।’ होमवर्क छोड़ कर वे दोनों एक-दूसरे के पीछे यही दोहराते हुए भागने लगे। पहले चिंतू कहता, ‘हट।’ फिर मोना दोहराती, ‘हट।’ तभी सरोज चाय बना कर ले आई। पति-पत्नी दोनों ने मिल कर चाय पी। कुछ देर के लिए ही सही, उनके बीच खटास दूर हो गई। थोड़ी देर बाद बच्चों ने आकर जानकारी दी। दादाजी जाग गए। सरोज वहां से उठ कर फिर से रसोई में चली गई। दादा दादीजी के लिए चाय बनानी थी उसे। और किशोर पिछले कमरे में चला गया। जाते ही उसने सवाल ठोक दिया, ‘पिताजी वह झिंगोला चारपाई ठीक नहीं कराई।’

सुन कर सुखवंत बोले, ‘खटबुना मिले तब न।’ पूछा किशोर ने, ‘कब मिलेगा खटबुना?’ ‘कभी तो मिलेगा ही। मुझे खुद परेशानी होती है।’ इस बार कहा किशोर ने, ‘वैसे ही तो कितनी पुरानी हो गई है चारपाई। फेंक क्यों नहीं देते?’ कुछ पल कोई नहीं बोला। अनायास सुखवंत का नाराजगी से भरा स्वर उभरा, ‘मैं भी तो पुराना हो गया हूं…।’ कह कर उन्होंने बेटे की ओर देखा। अब तक दादीजी भी जाग कर उठ बैठी थी। इस बीच सरोज चाय के दो प्याले साथ में रस के दो पीस प्लेट में रख चली गई थी। तभी किशोर का उखड़ा हुआ-सा स्वर उभरा, ‘ओफ्फो, पिताजी जब भी मैं घर के किसी पुराने समान की बात करता हूं, आप वह अपने ऊपर ले जाते हो।’ कह कर पल भर वह ठहरा फिर बोला, ‘मेरा मतलब तो सिर्फ यह था कि जो चीज खराब हो जाए या प्रयोग में न हो उसने फेंकने में आखिर क्या बुराई है। प्लास्टिक की चारपाई भी तो घरों में इस्तेमाल करते हैं लोग।’

तत्काल जवाब दिया सुखवंत ने, ‘घबरा मत, इंतजार कर। कुछ बरस बाद प्लास्टिक के आदमी भी मिलने लगेंगे।’ किशोर का स्वर नाराजगी में उभरा, ‘ओफ्फो, पिताजी, आप भी बस।’ भुनभुनाते हुए वह पिछले कमरे से बाहर निकल आया। अपने कमरे में गया तो सरोज पूछ बैठी, ‘क्या हुआ?’ ‘तुम तो जानती ही हो। वही पुराना राग।’ तत्काल कह उठी वह, ‘मैं तो और भी बहुत कुछ जानती हूं।’ किशोर कुछ कहना चाहता था, लेकिन कहा नहीं। इस बीच दोनों बच्चे झिंगोला चारपाई से खेलते रहे। जहां पिता के लिए झिंगोला चारपाई समस्या हो गई थी, वहीं बच्चों के लिए खेल का साधन बन गई। कभी चिंतू टूटे हुए बान के बीच में टांगे डाल कर अपने-आप को फंसा लेता तो मोना उसके चारों तरफ घूमते हुए उसे पकड़ने की कोशिश करती।

बहुत देर तक बच्चे शोर मचाते हुए चारपाई के चारों तरफ भागादौड़ी करते हुए खेलते रहे। रात हो गई, तो सभी सो गए। सुबह हुई। किशोर जल्दी-जल्दी तैयार होकर आफिस चला गया। आज बच्चों की छुट्टी थी। फिर से उन्होंने उसी झिंगोला चारपाई के आसपास जाकर खेलना शुरू कर दिया। तभी पड़ोस से गुप्ता जी आए और दादा जी के बारे में पूछा। दोनों बच्चों ने भीतर जाकर खबर की। सुखवंत धोती संभालते हुए आ गए। दुआ-सलाम के बाद दादाजी ने खटबुने की बात की। पलट कर जवाब दिया गुप्ताजी ने, ‘सुखवंत जी आजकल कहां खटबुने मिलते हैं। आपको तो पता है पहले वे गली-गली, बस्ती-बस्ती आवाज लगाते थे। खटबुनाई करा लो, खटबुनाई करा लो। अब तो ढूंढने से भी नहीं मिलता कोई।’

सुखवंत ने भी उत्तर में कहां, ‘आपकी बात ठीक है गुप्ताजी। पर खटबुने भी क्या करें बिचारे?’ कह कर वे दो-चार पल रुके। फिर बोले, ‘घर-घर में फ्लास्टिक की चारपाई का चलन शुरू हो गया है।’ इस बार गुप्ताजी बोले, ‘जमाना बदल रहा है सुखवंत जी। कुछ मत पूछो।’ जैसे पीड़ा से स्वर उभरा सुखवंत का, ‘कुछ मत बोलो। सिर्फ सुनो।’ गुप्ताजी ने सुखवंत के स्वर से बाहर आती पीड़ा को महसूस किया था। वस्तुस्थिति यही थी। इसके आगे वे कहे भी तो क्या? आगे बात बढ़ाई सुखवंत ने, ‘गुप्ताजी आप तो जानते ही हैं। जीवन-भर मैं बान की बुनी हुई चारपाई पर ही सोया हूं।’ सुन कर गुप्ताजी ने हां में हां मिलाई। थोड़ी देर बाद वे चले गए। सुखवंत अकेले रह गए। तभी बच्चे फिर आ गए और झिंगोला चारपाई के पास भागते हुए खेलने लगे। उनका पोता कहता, ‘खटबुनाई।’ सुन कर पोती जोड़ देती, ‘कहां से लाऊं सलाई?’

खेल-खेल में बच्चों की बातें सुन कर दादाजी को अच्छा लगा। दादीजी तो भीतर के कमरे में थीं। तभी दादाजी बोले, ‘अरे पगले सलाई से खाट नहीं बुनी जाती।’ तत्काल उनका पोता पूछ बैठा, ‘और काए से बुना जाती है चारपाई दादाजी?’ दादाजी जवाब में बोले, ‘आदमी बुनता है चारपाई।’ इस बार पूछा उनकी पोती ने, ‘आदमी कैसे बुनता है चारपाई दादाजी?’ दादाजी ने जवाब दिया, ‘बान से।’ अब उन दोनों बच्चों ने एक साथ पुकारा, ‘बान से।’ दादाजी का भी स्वर उभरा, ‘हां भई बान से।’ चिंतू और मोना फिर एक साथ बोले, ‘हां भई बान से।’

कहते हुए वे दादी के पास चले गए। बच्चे गए तो सुखवंत लोहे का दरवाजा खोल कर बाहर आ गए। नजदीक ही वर्मा जी रहते थे। यह सोचते हुए कि उनसे ही किसी खटबुने के बारे में पूछेंगे, वे वर्मा जी के घर तक जा पहुंचे। मालूम करने पर अंदर से नौकर ने बताया वर्मा जी बाहर गए हैं। रात में लौटेंगे। सुन कर उल्टे पांव लौट आए वे। अब उन्हें कोई अन्य नाम याद नहीं आ रहा था, जिससे वे खटबुने की बात करते। यही सोच कर भीतर के कमरे में आ गए, जहां साठ वर्षीय उनकी पत्नी बिस्तर पर लेटी हुई थी। उन्हें देखकर वह पूछ बैठी, ‘मिल गया खटबुना?’

जवाब दिया सुखवंत ने, ‘नहीं।’ इस बार वह बोली, ‘मिलेगा भी नहीं।’ सुन कर उन्हें अजीब-सा लगा। वे पूछना चाहते थे। क्यों नहीं मिलेगा। लेकिन पूछा नहीं। वहीं बराबर में चुपचाप लेट गए। आंखें बंद की और अपने पुराने दिनों की याद में खो गए। जबकि महानगर पुरानी यादों को ध्वस्त करता है। इस बात से वे भलीभांति वाकिफ थे। छोटे शहर से बड़े शहर में आते ही इसका उन्हें ज्ञान हो गया था। पहले दिन बीते। फिर सप्ताह और बाद में पूरा एक पखवाड़ा भी बीत गया। झिंगोला चारपाई अभी वहीं पड़ी थी। जब भी किशोर आफिस से आता तो चारपाई को देखकर उसे अजीब-सा लगता। घर के भीतर और बाहर अन्य कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहां चारपाई को रख दिया जाता। घर में स्टोर था, लेकिन उतना बड़ा नहीं, जिसमें झिंगोला चारपाई आ सके।

एक दिन किशोर आफिस से लौटा। चारपाई अपनी जगह वैसे ही पड़ी थी। बच्चे वैसे ही होमवर्क कर रहे थे। दादा-दादी पिछले कमरे में थे और सरोज बच्चों के पास थी। कामवाली रसोई में बर्तन मांज रही थी। नाम था उसका कुसुम। किशोर आते ही सरोज से कह उठा, ‘कुसुम से कहो, यह झिंगोला चारपाई ले जाए। कब तक खटबुने का इंतजार करते रहेंगे।’ इससे पहले कि सरोज कोई जवाब दे, अचानक पीछे के कमरे से किशोर की मां की आवाज सुनाई दी। आवाज सुन वह भागा-भागा उस तरफ गया। उसने देखा तो देखता ही रह गया। सुखवंत बिना हिले डुले बिस्तर पर लेटे थे। उनकी आंखें खुली थीं। छत की ओर टकटकी लगा कर बिना पलकें झपकाए वे देख रहे थे। उसने सुना। उनकी मां रोते हुए कह रही थी, ‘मैं अकेली रह गई बिटवा।’

किशोर ने घबराते हुए उनका माथा छुआ। हाथ को स्पर्श किया। शरीर ठंडा था। कहीं लेशमात्रा ताप न था शरीर में। आंखों की पुतलियों को देखा। उनमें स्पंदन नहीं था। बदहवास-सा चिल्ला उठा वह, ‘पिताजी…।’ उसके पीछे थी सरोज, बच्चे और कुसुम। सभी हैरानी से सुखवंत को लेटे हुए देख रहे थे। बच्चे दादाजी-दादाजी पुकारने लगे थे, लेकिन दादाजी अब सुनने वाले नहीं रह गए थे। जीवन की अंतिम नींद में डूब गए थे वे, ऐसी नींद जहां से कोई जगता नहीं। शोर सुन कर पड़ोस से गुप्ताजी भी आ गए थे। बाद में वर्मा जी और उनकी पत्नी भी आ गई। कुछ दूरी पर बाजार था। बुधवार होने के कारण बाजार बंद था। न पुराने लोग, न पुरानी बस्ती। अजल-मजल तो करनी ही थी। तब तक कुसुम अपने घरवाले को भी नजदीक से बुला लाई थी। चार आदमी ही अभी तक जुट पाए थे। कुछ कम उम्र के लड़के आ गए थे शेष बूढ़े। बूढ़े ऐसे, जिन्हें चलते हुए अपना ही बोझ उठाना मुश्किल था, तो अर्थी को कैसे कंधा दे पाते।

बड़ी मुश्किल से कफन का इंतजाम हो सका। जैसा हुआ, ठीक ही हुआ। वक्त पर जो हो जाए। उन चारों ने मिल कर यही तय किया। फर्श पर कब से पड़ी झिंगोला चारपाई पर ही सुखवंत के शरीर को श्मशान ले जाया जाए। उनकी इच्छा भी थी फिर से चारपाई पर सोने की। जीते-जी इच्छा पूरी न हो सकी। मरने के बाद तो हो जाए।

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