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नन्ही दुनिया: कहानी: खामोशी तोड़ता पत्र

विप्रम की कहानी - खामोशी तोड़ता पत्र

Author October 14, 2018 7:31 AM
प्रतीकात्मक चित्र

विप्रम

हिंदी के अध्यापक विद्याधर शुक्ल छात्रों की कॉपियां जांच रहे थे। कल उन्होंने पत्र-लेखन के विषय में जानकारी दी थी। गृहकार्य में छात्रों से पत्र लिख कर लाने को कहा था। छात्र अपने-अपने ढंग से कॉपियों में पत्र लिख कर लाए थे। जांच करते हुए एकाएक शुक्ल सर चौंक गए। कॉपी दीपक की थी। दीपक अपनी कक्षा में अच्छे छात्रों में जाना जाता था। शुक्ल सर ने कॉपी पढ़ते ही पुकारा- ‘दीपक, यह क्या लिख लाए? इतना लंबा पत्र!’ दीपक सबसे आगे बैठता था। अपना सिर खुजलाते हुए वह तुरंत खड़ा हो गया। उसके मुंह से बस इतना ही निकला- ‘सर!’

‘यह किस विधायक जी को पत्र लिख लाया?’ अपने चश्मे से झांकते हुए उन्होंने पूछा। फिर मंद-मंद मुस्कराते हुए बोले- ‘इधर आओ। पूरी क्लास को अपना लिखा पत्र पढ़ कर सुनाओ।’ दीपक पत्र पढ़ने लगा- ‘सेवा में, विधायक जी, प्रणाम। मैं अपने परिवार के साथ दरियापुर में रहता हूं। मैंने सुना है कि आप हमारे एरिया में दौरा करने आ रहे हैं। इसलिए सर, आपसे प्रार्थना है कि आप अभी इस इलाके में न आएं। बारिश का मौसम है। गलियां पानी में डूबी हुई हैं। नालियां सारी पटी पड़ी हैं। मेन-रोड पर बड़े-बड़े गड््ढे हो गए हैं। उनमें बरसात का पानी भरा हुआ है। आए दिन इन गड्ढों में कोई न कोई गिर जाता है। किसी की बाइक फंस जाती है, तो तिपहिए उलट जाते हैं। आप आएंगे तो आपकी कार फंस सकती है।…’ दीपक चुप हो गया।

‘हां आगे’- शुक्ल सर बोले। – ‘जब आप आ ही रहे हैं, तो इतना ध्यान रखिए कि यहां का पानी न पीएं। यहां सरकारी नल सुबह-शाम एक घंटा आता है। सब हैंड-पंप का पानी इस्तेमाल करते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। आप भूल कर भी यहां का पानी न पीएं। आप पानी की बोतल, बोतल क्या जार ला सकते हैं। आपकी गाड़ी में वह आराम से आ जाएगी।…’ दीपक फिर रुक गया था। तभी मॉनिटर सुरेंद्र कुमार फुसफुसाया- ‘शाबाश दीपक, तुम अपना पत्र पढ़ते रहो। अच्छा लग रहा है।’ ‘हां, पढ़ते रहो।’ यह शुक्ल सर का स्वर था।

दीपक मुस्कराया। सुरेंद्र कुमार की बात उसे और उत्साहित कर गई। अब उसकी आवाज में तेज था। वह स्फूर्ति से पढ़ने लगा- ‘विधायक जी, आप आएंगे तो आपके सफेद कुर्ता-पाजामा खराब हो जाएंगे। अगर आना ही है तो आप मक्खनपुर फ्लैट्स की तरफ से आएं। यह आपको थोड़ा दूर जरूर पड़ेगा, लेकिन वह इलाका साफ-सुथरा है। वहां की सड़कें पक्की और सुंदर भी हैं। श्रीमान, एक बात का खयाल अवश्य रखें। जब कभी आएं तो दिन में ही आएं। शाम या रात को आएंगे तो यहां बिजली नहीं मिलेगी। यहां अकसर बिजली गायब रहती है।…’ दीपक फिर चुप हो गया। कक्षा के कुछ और छात्र एक साथ बोल पड़े- ‘तुम रुक क्यों जाते हो। तुम बोलते रहो, दीपक!’

दीपक पढ़ने लगा- ‘यहां अकसर बिजली गायब रहती है। रिपोर्ट करते हैं तो कोई सुनवाई नहीं होती। कहते हैं- लाईट पीछे से नहीं आ रही। ऐसे में हम विद्यार्थियों को बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। हमारा होमवर्क अधिकतर अधूरा रह जाता है। इस पर हमें अपने अध्यापकों से डांट खानी पड़ती है। हमारे गणित के सर तो पिटाई भी कर देते हैं। यह तो अच्छा है कि मैं मेहनती हूं। मेरी आज तक पिटाई नहीं हुई। वैसे।…’ दीपक ने रुक कर इधर-उधर देखा था। सभी विद्यार्थी मंत्र मुग्ध थे। दीपक को खामोश देख शुक्ल सर बोले- ‘क्या पत्र समाप्त हो गया?’

‘नहीं सर, थोड़ा और बाकी है।’ दीपक ने झट से कहा था।‘तो, चुप क्यों हो गए तुम। पढ़ते रहो।’ शुक्ल सर कड़के। दीपक पुन: पढ़ने लगा- ‘विधायक जी, हमने स्कूल में पौधे लगाए हैं। हमारे प्रिंसिपल सर कहते हैं कि पेड़ तो दुनिया लगाती है, लेकिन पेड़ों की देख-भाल कोई नहीं करता। इसलिए हम दोस्तों ने सोच लिया है कि जब तक बारहवीं पास नहीं कर लेते, अपने लगाए पौधों की खुद देखभाल करेंगे। उनको पेड़ बना कर ही छोड़ेंगे। दो साल में पौधा क्या पेड़ नहीं बन सकता। देखा जाए तो श्रीमान हम बच्चों को हमारे अध्यापक पौधों की तरह देखते हैं। हमें संवारते हैं। और एक अच्छे-से पेड़ में बदल देते हैं। विधायक जी, लिखने को बहुत है। लेकिन आपके पास इतना समय कहां होगा कि मुझ जैसे लड़के का पत्र पूरा पढ़ लें। इसलिए मैं अपना पत्र ज्यादा लंबा न लिख कर यहीं समाप्त करता हूं। कहीं कुछ त्रुटि हुई हो तो मुझे बच्चा समझ कर क्षमा कर देना। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपका आज्ञाकारी दीपक, कक्षा दसवीं-ए।’

कक्षा में सन्नाटा था। जैसे ही दीपक का पत्र समाप्त हुआ विद्यार्थियों में फुसफुसाहट होने लगी। शुक्ल सर ‘खामोश! खामोश!’ कह कर खड़े हो गए थे। फिर बोले- ‘तो बच्चो, तुमने दीपक का लिखा पत्र सुना। बड़ा ही भावुकता में लिखा पत्र है। कल जो मैंने समझाया था, उस पर दीपक कुछ भटक गया है। खैर, दीपक के पत्र से ऐसा लगता है कि वह अपने भावों को, मन की बातों को अच्छे ढंग से लिख सकता है। तुम सब भी लिख सकते हो। पर ध्यान रहे कि पत्र किसको लिख रहे हो? क्यों लिख रहे हो? किस लिए लिख रहे हो? इन बातों से तुम अपने आप समझ जाओगे कि लिखना क्या है? कैसे लिखना है और कितना लिखना है?’

तभी घंटी टनटना उठी। शुक्ल सर ने एक बार दरवाजे की ओर देखा फिर विद्यार्थियों की ओर। चलते हुए वे बोले- ‘अच्छा तो, बच्चो! मैं चाहूंगा कि तुम हर दिन एक पत्र लिखा करो। आपस में लिखा करो, ताकि जो बात सामने नहीं कह सकते, उसे पत्र द्वारा शब्दों में कह सको। इससे मित्रता में घनिष्ठता बढ़ती है, एक गहराई मिलती है। जाते-जाते शुक्ल सर ने दीपक की पीठ पर एक धौल जमाई थी। फिर मुस्करा कर बोले- ‘शाबाश, अच्छा लगा खामोशी तोड़ता, तुम्हारा पत्र।

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