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नन्ही दुनिया: कहानी: दाग अच्छे हैं

गुल्लू का घर मुख्य सड़क के पीछे एक गली में था। आसपास उसके स्कूल के दूसरे बच्चे भी रहते थे और वे सब मिल कर अक्सर पास के पार्क में खेलने जाया करते थे। वर्षा ऋतु अपने पूरे जोर पर थी।

Author Published on: September 9, 2018 6:01 AM
गुल्लू का जन्मदिन भी तभी आया और उसके पिताजी ने उसे लाल रंग की साइकिल उपहार स्वरूप दी। जैसे ही वर्षा थमी, वह उसे सड़क पर लेकर निकल गया।

रोचिका शर्मा

गुल्लू का घर मुख्य सड़क के पीछे एक गली में था। आसपास उसके स्कूल के दूसरे बच्चे भी रहते थे और वे सब मिल कर अक्सर पास के पार्क में खेलने जाया करते थे। वर्षा ऋतु अपने पूरे जोर पर थी। जगह-जगह पानी जमा हो गया था। वैसे तो बच्चों को यह मौसम बड़ा सुहाना और लुभावना लगता है, बारिश में भीगने का अपना ही मजा है, पर उनके खेलने के लिए अब कोई जगह सूखी न बची। पास के पार्क में भी लंबी-लंबी घास उग आई थी और जो जगह ऊबड़-खाबड़ थी उसमें पानी भर गया था। पार्क की बेंचें भी अक्सर गीली ही रहतीं।

जब बारिश थमती, सभी बच्चे अपने घरों के बाहर बनी सड़क पर ही खेलने लगते। गुल्लू का जन्मदिन भी तभी आया और उसके पिताजी ने उसे लाल रंग की साइकिल उपहार स्वरूप दी। जैसे ही वर्षा थमी, वह उसे सड़क पर लेकर निकल गया। बाहर सभी बच्चे सड़क पर खेल रहे थे और गुल्लू इतराते हुई अपनी साइकिल चला रहा था। सड़क पर बारिश के कारण गड्ढे बन गए थे और उनमें पानी जमा था। गुल्लू जानबूझ कर उन गड्ढों में अपनी साइकिल लेकर जाता। जैसे ही उसकी साइकिल का पहिया गड्ढे में जाता… पानी ‘छपाक’ से बाहर उछलता।

ऐसा करने में उसे बहुत आनंद आ रहा था। लेकिन इससे दूसरे बच्चों को परेशानी हो रही थी। बारिश का जमा पानी उनके ऊपर भी उछल रहा था, जिससे उनके कपड़े गंदे हो जाते। करीब तीन-चार बार एक-एक कर सभी दोस्तों ने उससे कहा ‘देखो गुल्लू तुम इस तरह बारिश का गंदा पानी हम पर न उछालो… हमारे कपड़े गंदे हो जाते हैं और यह गंदा पानी शरीर पर लगने से फोड़े-फुंसियां भी हो जाती हैं।’ ‘दाग अच्छे हैं!’ गुल्लू ने सभी दोस्तों को चिढ़ाते हुए मुंह बना कर कहता और पहले से भी ज्यादा जोर से साइकिल चला कर लाता और गड्ढे में अचानक ब्रेक लगाता।

सभी दोस्तों को बहुत बुरा लगा। उन्होंने मिल कर उसे सबक सिखाने के लिए एक योजना बनाई। अगले दिन भी वह साइकिल लेकर सड़क पर आया। तभी रोहन ने उसको रोकते हुए कहा, ‘अरे गुल्लू, मेरे पिताजी मेरे लिए एक नया बोर्ड गेम लाए हैं, तुम मेरे घर चलो मैं तुम्हें दिखाना चाहता हूं… ये सारे दोस्त तो पहले ही मेरे घर आकर खेल कर गए।’ ‘हां-हां क्यों नहीं…’ गुल्लू ने साइकिल को स्टैंड पर खड़ी करते हुए कहा। वह रोहन के साथ उसके घर के अंदर गया और बोर्ड गेम खेलने लगा। करीब दस मिनट खेल कर रोहन बोला, ‘चलो गुल्लू अब फिर बाहर चलते हैं, सभी दोस्त मेरी राह देख रहे होंगे।’

गुल्लू का बोर्ड गेम खेलने का मन था किंतु रोहन के बार-बार कहने पर उसे बाहर आना ही पड़ा। बाहर आकर जैसे ही उसने अपनी साइकिल स्टैंड से हटाई और चलाने के लिए हैंडल पकड़ कर सीट पर बैठा, उसे हाथ पर कुछ चिपचिपा-सा लगा। वह झट से साइकिल से उतरा और अपने हाथ देखने लगा। पीछे से जोर-जोर से ठहाकों की आवाज आई। उसके दूसरे दोस्त तालियां बजा-बजा कर उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे। रोहन भी अचरज से बोला, ‘क्या हुआ गुल्लू, ये तुम्हारे हाथों में लाल रंग क्या है… और तुम्हारी पैंट भी… देखो, इस पर तो साइकिल की सीट ही छप गई है।’

हां… रोहन न जाने क्या लगा है, साइकिल के हैंडल और सीट पर… गुल्लू पीछे मुड़ कर अपनी पैंट पर छपी सीट को देखने की कोशिश कर रहा था। हल्के सलेटी रंग की पैंट पर साइकिल की सीट साफ दिखाई दे रही थी। रोहन भी ठहाका लगा कर हंसने लगा था और बोला, ‘छपाक… छपाक।’ फिर पीछे से सभी बच्चों के मिले-जुले स्वर में आवाज आई ‘दाग अच्छे हैं’ और सभी उसे देख तरह-तरह की भंगिमाएं बना कर उसे चिढ़ा-चिढ़ा कर गाने लगे ‘दाग अच्छे हैं… दाग अच्छे हैं।’ गुल्लू रूआंसा-सा हो, अपनी साइकिल लेकर वहां से चला गया।

तभी रोहन ने अपने दोस्तों से पूछा, ‘तुम लोगों ने क्या लगाया था उसकी साइकिल की हैंडल और सीट पर?’ विनय बोला, ‘लाल दवा में स्टेशनरी का गोंद मिला कर लगाया, दरअसल डॉक्टर ने बारिश से हुए फोड़े-फुंसी पर लगाने के लिए यह दवा दी थी… हम सबने मिल कर उसमें गोंद भी मिला दिया।’ गुल्लू को सबक सिखाना बहुत जरूरी था। गुल्लू की मां को जब सब पता चला, तो उन्होंने गुल्लू को समझाया, ‘बेटा अपने मित्रों से कभी दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए।’ सभी दोस्तों ने घर आकर उसकी मां से माफी मांगी, ‘माफ कीजिए आंटी, आपको हमारी वजह से परेशानी होगी… उसकी पैंट के दाग साफ करने पड़ेंगे।’ वे सभी फिर से साथ खेलने लगे थे।

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