Hindi short story for kids jansatta ravivari - नन्ही दुनियाः कहानी - चिड़िया का बच्चा - Jansatta
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नन्ही दुनियाः कहानी – चिड़िया का बच्चा

पिंकी स्कूल से घर लौटी थी। जैसे ही उसने घर में प्रवेश किया, उसे लगा कि बस्ते पर कोई चीज गिरी है। इसी बीच उसकी मम्मी दरवाजा बंद करके मुड़ी थी। उन्होंने जो देखा तो देखती रह गर्इं।

Author August 12, 2018 7:13 AM
कहानीः चिड़िया का बच्चा

पिंकी स्कूल से घर लौटी थी। जैसे ही उसने घर में प्रवेश किया, उसे लगा कि बस्ते पर कोई चीज गिरी है। इसी बीच उसकी मम्मी दरवाजा बंद करके मुड़ी थी। उन्होंने जो देखा तो देखती रह गर्इं। तुरंत चिल्लार्इं- ‘पिंकी, रुक। अपना बस्ता मत उतारना। देख, तेरे बस्ते पर चिड़िया का बच्चा गिरा है।’ पिंकी खड़ी की खड़ी रह गई। वह जानती थी कि जैसे ही वह बस्ते को उतारने के लिए कंधे उचकाएगी, नन्हा-सा वह बच्चा फर्श पर गिर सकता है। फौरन उसकी मम्मी ने बड़ी सावधानी से पहले उस बच्चे को अपने हाथों में उठाया और गौर से उसे देखने लगीं। फिर ऊपर छत के पंखे की ओर देखा, जहां चिड़िया का घोंसला था।

पिंकी उचक कर अब उस बच्चे को देख रही थी। गुलाबी रंग का वह नन्हा बच्चा बड़ा भला-सा लग रहा था। उसकी सफेद चोंच चमक रही थी। दोनों आंखें मुंदी हुई थीं। गदगद होते हुए पिंकी बोली- ‘मम्मी! मम्मी! इसको हम पालेंगे।’ ‘लेकिन पिंकी यह बहुत छोटा है। देख, इसके पंख भी नहीं निकले हैं।’ उसकी मम्मी ने समझाया था। इस पर पिंकी ने आतुरता में पूछा- ‘पर मम्मी, इसे घोंसले में दुबारा डालेंगे कैसे?’पिंकी की मम्मी सोच में पड़ गर्इं। पिंकी ठीक ही कह रही थी। फिर उन्होंने सुन रखा था कि घोंसले से अलग हुए बच्चों को चिड़े-चिड़िया स्वीकार नहीं करते। उनका लालन-पालन नहीं करते। इस नन्ही जान को इधर-उधर रखा, तो इसे चींटियां लग सकती हैं। कुछ नहीं तो बिल्ली उठा कर ले जा सकती है। फिर कुछ सोचती हुई वह बोलीं- ‘पिंकी बेटे, बाहर से कुछ सूखी घास ले आओ।’

थोड़ी देर में ही चिड़िया के बच्चे को रखने के लिए जूते के खाली डिब्बे में घास रख दी गई। झाडू की सींक से पके हुए चावलों का एक-एक दाना उसकी चोंच में डाला गया। मजे की बात यह रही कि वह नन्हा बच्चा बड़ी सहजता से दाना अपनी चोंच में ले रहा था। दो-चार दाने खाकर उसने अपनी चोंच फिर न खोली थी। जिसका अर्थ था, उसका पेट भर जाना। तब पिंकी की मम्मी ने जालीदार प्लास्टिक की एक टोकरी उस डिब्बे के ऊपर रख दी, ताकि वह बच्चा सुरक्षित रह सके। तीन दिनों के बाद उस चिड़िया के बच्चे के कुछ-कुछ पंख निकल आए थे। उसे जब भी भूख लगती वह चीं-चीं करता हुआ अपनी चोंच खोलने लगा था। पिंकी भी अब उसे दलिया या खिचड़ी के दाने खिलाने लगी थी। एक दिन पिंकी के पापा बाजार से एक पिंजरा खरीद लाए। तब उस बच्चे को पिंजरे में रख दिया गया।

एक दिन पिंकी ने देखा की एक चिड़िया चीं-चीं करती हुई कमरे में आ-जा रही है। कभी वह पिंजरे के पास फुदकती, तो कभी दूर खिड़की पर जा बैठती। यह देख पिंकी उसे भगाने के लिए दौड़ी। पिंकी की हिस्ट-हिस्ट आवाज सुन कर उसके दादाजी आ गए और पूछने लगे- ‘क्या बात है पिंकी बेटे, क्यों हिस्ट-हिस्ट कर रही है?’ तब पिंकी ने बताया- ‘दादू देखो न, यह चिड़िया बार-बार पिंजरे की ओर आ-जा रही है।’ ‘अच्छा, तो एक काम करो पिंकी, इस पिंजरे को आंगन में तख्त के ऊपर रख दो और हम दूर से देखते हैं कि यह चिड़िया करती क्या है।’ दादाजी ने सलाह दी। पिंकी ने ऐसा ही किया।

‘हैं! देखना दादू, यह चिड़िया तो पिंजरे में इस बच्चे को दाना खिला रही है। कहीं यह इसकी मां तो नहीं?’ अचंभित होते हुए पिंकी ने पूछा था। तब दादाजी मुस्कराते हुए बोले- ‘बेटा, तुम ठीक कह रही हो। यह जरूर इसकी मां होगी। पशु-पक्षी अपने परिवार की बहुत पहचान रखते हैं। एक पहचान का ही असर होता है, जिसके जरिए ये एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।उधर दरवाजे के पास पिंकी की मम्मी खड़ी सकुचा रही थीं। उनकी धारणा यहां गलत साबित हो रही थी। गलत थी उनकी सोच कि बिछुड़े हुए बच्चों को उनके माता-पिता स्वीकार नहीं करते। वह अब समझ नहीं पा रही थीं कि दादाजी से कुछ पूछें।

तभी दादाजी ने सुझाया- ‘पिंकी बेटे! जिस दिन इसके पंख पूरी तरह से निकल आएं। तब, बेटे इसे उड़ा देना। वैसे भी बेमतलब की कैद ठीक नहीं।’ कुछ दिनों के बाद पिंकी ने उस बच्चे को पिंजरे से आजाद कर दिया। बच्चा फुर्र करता हुआ उड़ा और रोशनदान पर जा बैठा। उधर जब पिंकी की मम्मी ने खाली पिंजरा देखा, तो हड़बड़ा कर बोलीं- ‘पिंकी! पिंकी! कहां गया बच्चा?’ ‘वो देखो, मम्मी, वो अब मुंडेर पर जा बैठा है। पहले यह इधर खिड़की पर बैठा था। मम्मी देखो, कैसे टुकुर-टुकुर मुझे देख रहा है।’ चहकते हुए पिंकी बता रही थी।

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