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कहानीः चिट्ठी जो लिखी नहीं गई

समंदर हमेशा की तरह उदास है। या यह उसका मन है! सालों से देखती आई है वह, आकाश का रंग कैसा भी हो, मौसम चमकीली लिली-सा खुशगवार या धूप के उजले-सुनहरे पंख पर तैरता दिन, समंदर यों ही उदास रहता है।

Author September 2, 2018 6:18 AM
समंदर हमेशा की तरह उदास है। या यह उसका मन है! सालों से देखती आई है वह, आकाश का रंग कैसा भी हो, मौसम चमकीली लिली-सा खुशगवार या धूप के उजले-सुनहरे पंख पर तैरता दिन, समंदर यों ही उदास रहता है।

जयश्री रॉय

समंदर हमेशा की तरह उदास है। या यह उसका मन है! सालों से देखती आई है वह, आकाश का रंग कैसा भी हो, मौसम चमकीली लिली-सा खुशगवार या धूप के उजले-सुनहरे पंख पर तैरता दिन, समंदर यों ही उदास रहता है। सतह पर प्रतिबिंबित आकाश के फिरोजी-नील के नीचे उसका स्थायी रंग मटमैला-धूसर है। झिर-झिर बहती हवा के संगीत से परे वह जाने कब से सुनती आई है समुद्री पंछियों की करुण चीख, किनारे पर वैधव्य के विलाप-सी अनवरत बिखरती-टूटती फेनिल लहरें… वह जानती है, समुद्र की देह-भाषा, तमाम कोलाहल के बीच वह अपने अगाध मौन का निर्जन टापू है।

… इसी निर्जनता से उसका संवाद है। अपने वर्जित प्रेम का कन्फेशन वह अपने प्रभु के सामने भी नहीं कर सकती। तो उन्हें समंदर के इन्हीं अराजक लहरों को चुपचाप सौंप जाती है- किसी नाजायज शिशु की तरह! इस प्रार्थना के साथ कि यह अभिमानी समंदर इसे अपने हृदय की गहराइयों में छिपा ले, कभी लहरों के हाथ किनारे को लौटा न जाय। इन किनारों पर मनुष्यों की एक बहुत बड़ी दुनिया है, जो प्रेम के लिए कभी अनुकूल नहीं रही। यहां जो बार-बार सूली पर चढ़ा, वह प्रेम ही था! मंदिर तो पत्थरों के लिए बना!
कितना समय गुजर गया, शायद कई युग! वह उंगलियों पर अब गिन नहीं पाती। शायक खाल की अनगिन झुर्रियों पर वह दर्ज हो! जो समय दिल पर गुजरता है, उसका हिसाब सहज कब होता है! इलिएना- सिस्टर इलिएना तब जवान थी, बारिश में जन्मी किसी पहाड़ी नदी की तरह ही उफनती हुई, चंचल! अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी। प्लेग की चपेट में आकर जब पुराना गोवा लगभग वीरान हो गया था, अपने पति और चार बच्चों को खोकर उसकी मां किसी तरह उसे लेकर उत्तर गोवा भाग आई थी। पोंडा के रास्ते में उसने बम जीसस चर्च के सामने से गुजरते हुए मन्नत मांगी थी, अगर इलिएना बच गई, वह उसे आजीवन प्रभु यीसू की सेवा में सौंप देगी। तबसे इलिएना एक ईसाई नन बन कर अपने प्रभु की सेवा में है।

उसकी देह पर सफेद गाउन चढ़ा दिया गया, मगर हृदय का रंग लाल ही रहा। लाल और आकांक्षाओं के मृदुल कंपन से भरा! तबसे एक मन को बांधने, वश में करने के सारे प्रयत्न व्यर्थ गए। अलस्सुबह पंछियों के जागने से पहले चर्च के घंटे के साथ सेमीनरी में उसके दिन शुरू होते। अपने सामने पवित्र ग्रंथ खोले नींद भरी आंखों से जम्हाई दबाते हुए वह कोरस में ईश्वर की करुणा के गीत गाती, मगर अबाध्य मन ठीक उसी समय समंदर किनारे रंग-बिरंगी शंख-सीपी इकट्ठा करते नंगे पांव भागता फिरता। प्राचीन चर्च की ऊंची दीवारों के बीच बसंत की रातों के वर्जित सपनों में देह खारा पानी, नमकीन हवा में सीझ-पक कर सबके अलक्ष्य काजू के फल-सा मीठा, मदिर होता गया था। उन दिनों मदर सुपीरियर कतार में खड़ी कर उसके यूनीफॉर्म, नाखून का मुआयना करते हुए अक्सर नाक सिकोड़ कर कहती थी, उसकी देह से मछली की गंध आ रही। वह सचमुच मत्स्यगंधा बनी हुई थी उन दिनों। रग-रग में समुद्र का उद्दाम ज्वार चढ़ा था।

इलिएना की चमकीली खाल पर चढ़े बसंत से परे वह समय गोवा में तनाव और राजनीतिक उथल-पुथल का था। हिंदुस्तान आजाद हो गया था और गोवा को आजाद कराने की कोशिश भीतर ही भीतर तेज हो गई थी। आमतौर पर गीत-संगीत और फेनी के नशे में डूबे गोवा के अलमस्त नौजवानों में देशप्रेम और स्वाभिमान की भावना आंच देने लगी थी। लोग छिप कर रेडियो पर लोहिया के ओजपूर्ण भाषण सुनते और क्रांति के गीत गुनगुनाते। हसुवे-कुल्हाड़ी पर शान दिए जाने लगे थे, मछली की ढेरियों में गोली-बंदूक छिपाए जाने लगे थे। अब बसंत की हवा में भट्टियों पर चढ़ी शराब की नहीं, बारूद की गंध थी। इस गंध ने आजादी के दीवानों को पागल कर रखा था।

और एक सुबह तोप के भीषण गर्जन से इलिएना की नींद टूटी थी। चारों तरफ चीख-पुकार, भगदड़ मची हुई थी। आकाश धुएं से काला था। किसी ने भागते हुए उससे कहा था, हिंदुस्तान की सेना आ गई। और फिर देखते ही देखते वह पुर्तगाली और हिन्दुस्तानी सेनाओं से घिर गई थी। भय से अवश यीसू के आल्टर से चिपकी वह विस्फारित आंखों से देखती रही थी वह भीषण युद्ध- संगीनों से छ्लनी होता सीना, कट कर गिरते सिर, खून के फब्बारे, आर्तनाद… गोली से एक पुर्तगाली सिपाही के सिर के परखच्चे उसके सामने उड़ गए थे और वह बिना सिर का धड़ पीछे की ओर त्योरा कर उस पर आ गिरा था। एक चीख के साथ वह उठ कर भागी थी और सामने से आते हुए एक फौजी की बांहों में गिर कर बेहोश हो गई थी।

जब आंख खुली थी, किसी की पसीने से भीगी पीठ से खुद को लगी पाया था। प्यास से गला सूख रहा था। जाने वह कहां थे! शाम गिर रही थी। नारियल-सुपारी के घने पेड़ों के पार झांकते संझाते आकाश पर मौसम का नया चांद था, हल्के धुएं में डूबा। हवा में अब भी जले बारूद की गंध थी। उसके कराहने पर वह फौजी मुड़ा और पहली बार उसने उसे देखा था, कुछ-कुछ आतंक और विस्मय से। सोचती है तो उस क्षण की सनसनी इलिएना आज भी अपनी त्वचा पर महसूस कर सकती है- दो गहरी भूरी आंखें, जो सीधे उसकी आंखों से गुजरते हुए दिल में उतर गई थीं, वह आज भी वही जज्ब है, कभी लौटी नहीं! कितना तो जतन किया!

युद्ध के भीषण तनाव के बीच दो दिन वे एक अधजले खंडहर के बीच छिपे रहे थे। फौजी खुद ज?मी था और उसका हथियार भी खो गया था। आसपास पुर्तगाली सैनिक फैले थे और लड़ाई लगातार चल रही थी। इलिएना के बाहर निकलने से फौजी के पकड़े जाने का डर था, मगर फिर भी उसने इलिएना से कहा था वह चली जाए। उस अनजान हिंदुस्तानी के यकीन ने इलिएना को बांध लिया था। उसने उसे इस हालत में छोड़ कर जाने से इंकार कर दिया था। आल्टर के सामने पड़ी अगरबत्ती की राख उसके ज?मों पर डाल कर अपने लंबे गाउन का कोना फाड़ कर उसने उन्हें स?ती से बांध दिया था।

इसके बाद के दिन प्रार्थनाओं में बीते थे उसके। जिस प्रभु के चरणों से चंचल मन हिरणी-सा बार-बार भाग उठता था वही वह लगातार पड़ा रहा याचक बन कर, बस एक ही दुआ के साथ- फौजी की जान बच जाय! कैसी विडंबना है कि जिस हवा में धुआं, चीखें तैर रही थीं, जो जमीन मानव मन की आदिम हिंसा और असीमित घृणा से लाल थी, उसी पर प्रेम का वह शाश्वत फूल खिला- मरियम की स्नेह-विगलित आंखों-सा, यीसू के करुणा भरे हृदय-सा कोमल, लाल… जो पल यातना, भय और गहन पीड़ा के थे, उन्हीं पलों में मौन ने अनुराग का सबसे सुंदर गीत गाया, देह ने चाहना का स्वाद और समर्पण का उल्लास जाना… यहां देना ही पाना था और पाना सर्वस्व खो देना। इस खोने ने इलिएना को हमेशा के लिए मुकम्मल कर दिया। उन सीमित पलों में जादू घटा और वह निस्संग किशोरी अभाव के ऐश्वर्य से अनायास भर गई।

तेज धूप में वह खंडहर जलता रहता और उसके एक कोने में इलिएना अपने बालों की छांव में फौजी को घेरे बैठी रहती। तोप की कर्णभेदी गूंज के बीच कहीं कोई कोयल अनायास कूक उठती, धुएं से गहराए आकाश में शाम का रंग बिखरता, बारूद की गंध को चीर काजू के फूल महक उठते। फौजी विस्मय से देखता, इस किशोर संन्यासिन के डर से नील पड़े चेहरे पर प्रेम की बासंती आभा, महसूसता उसके छुअन की बढ़ती हुई ऊष्मा को! प्रेम अपने होने का समय खुद चुनता है। कोई प्रतिकूल समय या परिस्थिति उसे पनपने से रोक नहीं सकती। उन दो दिनों के दौरान प्रार्थना में बैठे बिना इलिएना अपने ईश्वर के सबसे करीब रही। पहली बार उसने जाना, प्रेम में होना प्रार्थना में होना है, सनातन प्रार्थना में! दूर क्षितिज पर लहराते हुए भारत के तिरंगे को देख जब वे बाहर निकले थे, उनकी धरती पुर्तगाली शासन से आजाद हो चुकी थी। फौजी बुखार से बेसुध-सा था। सेना के लोग उसे ले गए थे। जाते हुए उसने इलिएना को एक नजर भर देखा था, बस! वह उनकी आखिरी मुलाकात थी।

उसके बाद इलिएना कभी अपने ईश्वर की ओर देख नहीं पाई। बार-बार कन्फेशन बॉ?स तक गई और लौट आई। जब भी प्रार्थना में आंख मूंदती, दो गहरी भूरी आंखें भीतर दिप उठतीं। उन दो आंखों की लौ से लौ लगाए वह बिना किसी प्रतिश्रुति के जाने किस प्रतीक्षा में जीए जा रही थी। उन्होंने सही अर्थों में उसका बपतिस्मा किया था। वह मन से संन्यासिन हुई थी। सच्चे अनुराग से जन्मा विराग! इसके पहले जो भी था वह एक पाखंड और विवशता के सिवा कुछ नहीं। और एक दिन वह चिट्ठी आई थी उसके पते पर, जाने कहां-कहां से घूमते हुए! भेजने वाले के पते पर नाम की जगह बस फौजी लिखा था। उन दो दिनों में उसने उसे फौजी ही बुलाया था। नाम पूछना रह गया था। उस हल्के नीले लिफाफे को हाथ में लिए इलिएना देर तक चुपचाप बैठी रही थी। तो वह जिंदा है! उसकी प्रार्थना कबूल हुई… इसके बाद उसने बिना खोले वह लिफाफा समुद्र की लहरों के हवाले कर दिया था- उसकी मां ने अपने प्रभु से एक मन्नत मांगी थी… रही उसकी अपनी प्रार्थना तो वह उसकी सनातन प्रतीक्षा में हमेशा जीवित रहेगी…

उधर सबकी पीड़ा के सलीब पर चढ़े प्रभु ने शायद हर एक की प्रार्थना पूरी की थी, किसी की सुन कर, किसी की ना सुन कर…इसके बाद बार-बार वह नीला लिफाफा इलिएना के नाम आता है और इलिएना आंसू और मुस्कराहट से भरी, बिना पढे उसे समुद्र की लहरों के हवाले कर आती है, यह जाने बिना कि उसका फौजी उस युद्ध में मिले जख्मों में जहर फैलने से एक सैनिक अस्पताल में उन्हीं दिनों मर गया था, अपने दोस्त से यह आग्रह कर कि एक निस्संग संन्यासिन समुंदर के किनारे उसकी प्रतीक्षा में उदास बैठी रहेगी, उसे फौजी के नाम से खत लिखना…

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