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नन्ही दुनियाः कहानीः आने वाले कल की दुनिया

स्कूल बस से उतर कर मयंक अपने घर के सामने पहुंचा ही था कि घर का दरवाजा अपने आप खुल गया। वह घर के अंदर आ गया तो दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

Author July 8, 2018 7:03 AM
कहानी

हरीश कुमार ‘अमित’

स्कूल बस से उतर कर मयंक अपने घर के सामने पहुंचा ही था कि घर का दरवाजा अपने आप खुल गया। वह घर के अंदर आ गया तो दरवाजा अपने आप बंद हो गया। मयंक अपने कमरे की ओर बढ़ने लगा। उसका स्कूल बैग फर्श पर रेंगता हुआ उसके पीछे-पीछे चल रहा था। तभी मयंक को सामने से मिक्की-612 आता हुआ दिखाई दिया, जो उससे पूछ रहा था, ‘आ गए मयंक भैया! बताओ, दोपहर के खाने में क्या खाओगे?’

मिक्की-612 बोलने वाला रोबोट था, जिसे पापा एक साल पहले खरीद कर लाए थे। वह घर के सारे काम बिना थके कर दिया करता था। बस सुबह और शाम दस-दस मिनट के लिए उसकी बैटरी चार्ज करनी पड़ती थी।
‘आज तो मेरा कढ़ी-चावल खाने का मन है।’ मयंक ने उत्तर दिया।

‘ठीक है, मयंक भैया। तुम मुंह-हाथ धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठो। मैं अभी लाता हूं।’ मिक्की ने कहा और रसोई की तरफ चला गया।

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मुंह-हाथ धोकर मयंक डाइनिंग टेबल पर आकर बैठा ही था कि मिक्की एक ट्रे लिए हुए आ गया। उसने ट्रे में से दो कटोरियां और एक चम्मच उठा कर मयंक के आगे रख दीं। हर कटोरी में पांच-पांच गोलियां थीं। एक कटोरी में सफेद रंग की गोलियां थीं और दूसरी में पीले रंग की।

मयंक ने चम्मच की मदद से दोनों कटोरियों में से एक-एक गोली उठाई और मुंह में डाल लिया। गोलियों को चूसने पर उसे कढ़ी-चावल का स्वाद आने लगा। गोलियां बड़ी धीरे-धीरे खत्म हो रही थीं। इसके साथ ही मयंक का पेट भी भरता जा रहा था।
करीब पंद्रह मिनट बाद वह डाइनिंग टेबल से उठा और बाथरूम में जाकर वाशबेसिन के सामने खड़ा हो गया। वाशबेसिन के बार्इं ओर लगा बटन दबाया तो पानी की एक पतली धार फव्वारे की तरह उसके मुंह की ओर आने लगी। मयंक ने पानी का कुल्ला किया और वाशबेसिन के दार्इं ओर लगा बटन दबा दिया। दीवार पर टंगा छोटा तौलिया अपने आप आगे बढ़ा और मयंक का मुंह अच्छी तरह पोंछ कर पीछे हट गया।

उसके बाद मयंक अपने कमरे में आ गया। कमरे की दीवार पर टीवी की तरह एक स्क्रीन लगी हुई थी। मयंक ने मेज पर रखा रिमोट उठाया और स्क्रीन की तरफ करके एक बटन दबा दिया। स्क्रीन पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘बिजी इन वर्क’ (काम में व्यस्त) लिखा हुआ आ गया।

‘पापा तो बिजी हैं काम में, मम्मी से बात करता हूं।’ सोचते हुए मयंक ने रिमोट का एक और बटन दबा दिया। स्क्रीन पर मम्मी की शक्ल दिखाई देने लगी। वे अपने दफ्तर में कुर्सी पर बैठी हुई थीं।

‘कैसा रहा आज का स्कूल, बेटू?’ मम्मी ने बड़े प्यार से पूछा।

‘बढ़िया मम्मी, बहुत बढ़िया!’ मयंक ने चहकते हुए उत्तर दिया।

‘खाना खा लिया न?’ मम्मी ने पूछा।

‘जी, मम्मी! कढ़ी-चावल खाए हैं।’

‘हां, वो मैंने देख लिया था सीसीटीवी कैमरे में। अच्छा, कल साइंस का वीकली टेस्ट है न तुम्हारा। थोड़ा आराम करके तैयारी कर लेना अच्छी तरह! मैं तो कुछ देर से घर पहुंच पाऊंगी। कोई जरूरी काम है ऑफिस में।’

‘मम्मी, आज तो हमारी सोसायटी की टीम का रॉयल सोसायटी की टीम के साथ टी-टेन क्रिकेट मैच है न, इसलिए मैच के बाद ही करूंगा तैयारी टेस्ट की।’ मयंक बोला।

‘ठीक है, आल द बेस्ट! सेंचुरी बनाना आज!’ मम्मी ने अपने दाएं हाथ का अंगूठा दिखाते हुए मयंक को शुभकामनाएं दीं।

इसके साथ ही स्क्रीन पर मम्मी की शक्ल दिखनी बंद हो गई।

तभी मिक्की मयंक के कमरे में आया और कहने लगा, ‘मयंक भैया, आज तो आप लोगों का क्रिकेट मैच है न, रॉयल वालों के साथ!’

‘हां, अभी तीन बजे से है।’

‘मुझे भी अपनी टीम में रख लो न! मुझे बहुत अच्छी बैटिंग करनी आती है!’ मिक्की बोला।

‘भई, इसके लिए तो बात करनी पड़ेगी बाकी लोगों से।’ मयंक ने कहा।

‘आप बात कर लेना भैया। मुझे क्रिकेट खेलना बहुत अच्छा लगता है।’ मिक्की कहने लगा।

‘क्रिकेट मैच तो बाद में खेलना, अभी तो हम लोगों का मैच देखो।’ मयंक ने रिमोट का मुंह दीवार पर लगी स्क्रीन की तरफ करते हुए कहा।

‘ठीक है।’ कहते हुए मिक्की वहां रखी एक कुर्सी पर बैठ गया।

मयंक ने रिमोट का बटन दबाया तो स्क्रीन पर क्रिकेट का मैदान उभर आया। फिर कुछ देर बाद उसी स्क्रीन पर मैच शुरू हो गया। इस मैच की विशेषता यह थी कि मैच खेलने वाले सभी खिलाड़ी और मैच के रेफरी वगैरह मैदान पर मौजूद न होकर अपने-अपने घर में या कहीं और थे।

स्क्रीन पर खिलाड़ियों की शक्ल वाले पुतले मौजूद थे और असली खिलाड़ी रिमोट के बटन दबा-दबा कर बैटिंग, बॉलिंग, फील्डिंग आदि कर रहे थे।

चौथे ओवर की पहली गेंद पर बैटिंग करने के लिए मयंक की बारी आई, तो उसने एक जोरदार छक्का जड़ दिया। छक्का इतना जबर्दस्त था कि गेंद मैदान की सीमारेखा से काफी आगे जाकर गिरी। मयंक जोर से चिल्ला उठा, ‘याहू!’ और फिर खुशी के मारे उसने मिक्की को पकड़ कर उठा लिया।

तभी मयंक के कानों में आवाज आई, ‘मयंक, यह तकिया पकड़ कर क्यों बिस्तर पर खड़े हो? जल्दी से तैयार हो जाओ, स्कूल जाना है।’

पापा की आवाज सुन कर मयंक की नींद पूरी तरह खुल गई। उसने झेंपते हुए तकिए को बिस्तर पर रख दिया और पलंग से नीचे उतर आया।

‘कोई सपना देख रहे थे क्या?’ पापा ने पूछा। मयंक के विचित्र सपने देखने के बारे में उन्हें पता था।

‘पापा, आज का सपना तो बड़ा विचित्र और मजेदार था! ऐसा लग रहा था जैसे पचास साल बाद के समय में पहुंच गए हों।’ फिर उसने जल्दी-जल्दी सब बातें कह सुनार्इं।

‘बेटा, हो सकता है आज से पचास साल बाद तक इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक आविष्कार हो चुके हों।’ पापा बोले।

‘पापा, ऐसा कोई आविष्कार हो जाता न कि बूट का बटन दबाओ और झट-से एक से दूसरी जगह पहुंच जाओ।’ मयंक कहने लगा।

‘बेटा, ऐसा कोई आविष्कार तुम्हीं करना, पर अभी तो तुम्हें जाना है स्कूल, इसलिए तैयार हो जाओ जल्दी से!’ पापा ने मुस्कुराते हुए कहा और प्यार से उसे बाथरूम की ओर धकेल दिया।

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