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कविताएंः ‘शब्द हुए सूख के अदौरी’, ‘दर्पण-एक’ और ‘दर्पण-दो’

महेश आलोक की कविताएं

Author May 20, 2018 5:12 AM
शब्द हुए सूख के अदौरी

महेश आलोक
शब्द हुए सूख के अदौरी

शब्द हुए सूख के अदौरी
काम नहीं आती हैं मिन्नतें चिरौरी
पांवों के तले बिछे धूप के गलीचे प्यासे हैं।
सूरज की सांसों में मछली की लाशें हैं
नदियों की पायल में कल-कल के कोड़े हैं
पौधों ने पांवों को घुटने तक मोड़े हैं
जल सरका कुएं का और अधिक नीचे
सड़कों पर निकल गई फूट के घमौरी
परदे के भीतर से झांक रहीं
आंखें बिल्लौरी

सूखे कुल कपड़े जो अभी-अभी फींचे
पत्तों के कपड़ों को चिड़ियों ने पहने
सूरज ने लपक लिया पान की गिलौरी
शब्द हुए सूख के अदौरी।

दर्पण-एक

मेरी मां का बचपन इस दर्पण में नहीं है

उन्हें कैसे पता था कि वे हैं
दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की

क्या वे पानी को बना लेती थीं दर्पण
तब तो उस नदी की तलहटी में जरूर अटकी होंगी
उनकी शरारतें
उनकी चोटी से लटका सूरज
कितना बेबस लगता होगा
उस समय

उन्हें कैसे पता था कि नानी नर्क में नहीं स्वर्ग में हैं
क्या नदी में नहाते समय मछलियों की आंखों में
दिखता था पूरा स्वर्ग
नानी को तो बहुत प्रिय था मछलियों को
चारा खिलाना

मेरी मां का बचपन इस दर्पण में नहीं है

वे कब जवान हुर्इं इसका पता भी
दर्पण से नहीं चलता
किसी ने बताया ही नहीं
नदी ने भी नहीं
वह तो दीया सिराते वक्त
चंद्रमा ऐसे टूट कर बिखरा कि नदी को
हंसी आ गई

और तारे मोतियों की तरह चमकने लगे
मां के वक्षस्थल पर।

दर्पण-दो

पिता तलाशते हैं अपने दर्पण में मां का
पारदर्शी जीवन
क्या दर्पण की नींद में प्रवेश कर सकते हैं वे

नहीं ऐसा संभव नहीं है
मां को देख कर
दर्पण की नींद में जा ही नहीं सकते पिता
खासकर उस समय जब वे
सिंदूर लगातीं थीं

मां का अपना कोई दर्पण नहीं था
वे पिता के दर्पण में वहां तक जा सकतीं थीं जहां प्रेम
दादा और दादी की आंखों से
शहद टपकाता था

हालांकि मेरी आंखों को दर्पण कहतीं थीं मां
और देख लेती थीं पूरा ब्रह्मांड

और मैं दर्पण में प्रवेश करता हूं
और चकित हूं कि मां तमाम वर्षों से वहीं हैं
घर के दरवाजे पर
कुंडी सी लटकती हुई।

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