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कविताएंः ‘धरती का मन’ और ‘बोली’

रामप्रकाश कुशवाहा की कविताएं

कविताएंः ‘धरती का मन’ और ‘बोली’

धरती का मन

जब भी मैं
बहुत अच्छी कल्पना करना चाहता हूं
घुमड़ते हुए बादलों से
ऊंची उड़ान नहीं भर पाता

बारिश में धरती का चेहरा भी
अपने शिशुओं को दूध पिलाती
मांओं जैसा सुंदर मुझे लगता है
और मनुष्य का चेहरा
अपनी मां को लगातार लात मारते
किसी नटखट शरारती बच्चे-सा

सुख की कल्पना मैं
नींद उड़ा देने वाली भूख के बाद
मिलने वाले भोजन के स्वाद-सी करता हूं
या फिर पसीने से नहाई हुई देह पर
लगने वाली ठंडी हवाओं के झोंके

जिंदगी की सबसे अच्छी नींद मुझे मिली थी
अठहत्तर किलोमीटर लगातार
साइकिल चलाने के बाद
जिस दिन मेरे भी दोनों पैर
हनुमान जी के पैरों की तरह
धक-फूल कर दिखने लगे थे

उस दिन सारी आंधियां
थक कर सो गई थीं
हवा चुप हो गई थी और आसमान बिल्कुल स्वच्छ
जागने पर सबसे पहले
मां को देखना भी अच्छा लगा था

मैं मां से अच्छी और सुंदर
धरती की भी कल्पना नहीं कर पाता
मां के इस दुनिया से बीत जाने के बाद ही
मैं इस रहस्य को जान पाया कि
मेरी मां साक्षात धरती ही थीं
न कि कोई प्रतिनिधि प्रतिनियुक्त!

हम सभी अपने भीतर
एक और बारिश का इंतजार
कर रहे होते हैं
जब धरती कल्पनालोक में बदल जाती है
और हम सब रोमांचित
छू, जी और महसूस कर पाते हैं
धरती का मन!

बोली

तुम्हारी भाषा
मेरी भाषा से श्रेष्ठ है
कम रहस्यमय नहीं है तुम्हारा जीन
जो अपने नथुने फड़का कर
पहुंचने से पहले ही
मेरे शर्तिया आने की
विजयिनी घोषणा कर देता है

तुम्हारे पास अब भी बचा हुआ है
जीवन का आदिम पाठ
खुशी से लहराने वाली जीवन की पताकाएं
और घ्राणेंद्रियों में
धरती का अनावृत बहुविध गंध संसार

एक बार फिर ले गए हो मुझे
प्रकृति की अबूझ पाठशाला में
पढ़ाने जीवन का पाठ!

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