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कविताएं: किरकिरा रही है आत्मा धरती की

जितेंद्र श्रीवास्तव की कविताएं

Author October 14, 2018 6:19 AM
प्रतीकात्मक चित्र

जितेंद्र श्रीवास्तव

किरकिरा रही है आत्मा धरती की

बरस कर लौट गए बादल क्षितिज की छांह में
यहां पसर गया नमक चहुंओर
तन मन नयन से रिस-रिस कर

अभी-अभी तो चढ़ा था वैशाख
उम्मीदें नाच रही थीं खेत से खलिहान तक

अब चारों ओर नमक ही नमक है
किरकिरा रही है आत्मा धरती की।

धोखा एक अदृश्य घुन है

असफलताएं तोड़ती हैं आदमी को कुछ समय के लिए
पर धोखे तोड़ देते हैं बाहर­ भीतर सब कुछ

असफलताओं से उबर जाता है आदमी
एक न एक दिन मिल ही जाती है
सफलता की कोई पुष्प वाटिका
पर धोखे का अंधेरा
गहरा होता है किसी भी अंधरे से
धोखा एक अदृश्य घुन है
जो पल­पल चाटता है विश्वास!

किसी दिन मलय समीर की तरह

कहां के लिए चले थे
कहां पहुंचे!
पलट कर देखा
दूर कहीं धुंधलके में खड़ा था इच्छा-मार्ग

तिश्नगी किस चीज की थी
बुझी किस चीज से!
जब सोचा
याद आए पानी के कई चेहरे
बदलते मौसमों के रंग
वे जरूरतें भी याद आर्इं जिन्हें लांघ न सका

यों ही चलते-गुजरते
जब-जब मिला कुछ
ठहर कर देखा-स्वीकारा उसे
याद आर्इं साथ-साथ
खेत-खलिहानों में छूट गर्इं कुछ विह्वल इच्छाएं

अजब-गजब है यह जीवन का जादू
कभी न रुकता चलता जाता
थाह नहीं इसका

जो छूट गया
आ न सका संग-साथ हमारे
नहीं रहेगा हरदम छूटा
उठेगा किसी दिन मलय समीर की तरह अपनी जगह से
और समा जाएगा किसी की पुतलियों में!

घर प्रतीक्षा करेगा

जो नहीं लौटे
घर उनकी प्रतीक्षा करेगा

यह सच बार-बार झांकेगा पुतलियों में
जो समा गए धरती में
जिन्हें पी लिया पानी ने
जो विलीन हो गए धूप और हवा में
वे लौटेंगे कैसे कहां से
फिर भी घर उनकी प्रतीक्षा करेगा

सृष्टि में किसी के पास नहीं
घर जैसी स्मृति

घर कुछ नहीं भूलता
लोग भूल जाते हैं घर।

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