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कविताएं : चैत

एक गैल थी, जिसे बिल्ली काट गई, कल पता चला, उसके ठीक दाहिने कोने

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 3:54 AM
ये संक्रांति में घर आए थे, कुछ दिन के लिए, वक्त की पैरोल पर थे

एक गैल थी

जिसे बिल्ली काट गई
कल पता चला
उसके ठीक दाहिने कोने
खड़ा एक
उम्रदराज गुलमोहर
इस चैत के आते ही चला गया
जीवन संगीत
किसी जोगी की झांझ की तरह
बज रहा था
हर बात में मिट्टी की कसम
खाने वाले
किसना आखिरकार मिट्टी
में ही मिल रहे थे
भांड थे मिरासी थे
सूअर थे भेड़िए थे
कवि थे किर्तनिए थे
सबसे तेज गाड़ी में बैठने के
इंतजार में प्रेमिकाएं थीं
हां, उनकी आंखों में अपने ठहरे सहमे
प्रेमियों का दर्द भी था
ये चैत की एक जंग लगी कटार
भीतर तक भुकी हुई ।

पैरोल

ये संक्रांति में घर आए थे
कुछ दिन के लिए
वक्त की पैरोल पर थे
अब लौट चुके हैं ये
ये कुछ दिनों के लिए आते हैं
और लौट जाते है
परदेसियों की तरह
इन खाली गांवों में
कौन बचा है बूढ़े और बीमारों के सिवा
जर्जर घर की
खुली खिड़की से
झांकती दो झुर्रीदार आंखें
ये अपने बुरे दिनों की इतनी जिंदा
कविता आखिर इसे कैसे छोड़ कर
गए होंगे वे ।

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